वन्देमातरम पंच सष्टी:श्रृंखला
वन्देमातरम् और भोजपुरी समाज
(संवेदी निबंध)
वन्देमातरम् केवल एक गीत नहीं है, यह भारत की आत्मा का उच्चारण है। यह शब्द–समूह उस क्षण का साक्षी है जब मातृभूमि को पहली बार देवी के रूप में देखा गया, पूजा गया और उसके लिए सर्वस्व अर्पित करने का संकल्प लिया गया। जब यह स्वर उठता है—वन्दे मातरम्—तो इसमें केवल राष्ट्रभक्ति नहीं, बल्कि पीड़ा, संघर्ष, आशा और आत्मसम्मान का समूचा इतिहास गूँजता है। इसी गूँज को अगर किसी समाज ने अपने जीवन, भाषा और संस्कार में सहजता से आत्मसात किया है, तो वह है भोजपुरी समाज।भोजपुरी समाज की आत्मा मूलतः भावुक है। यह समाज दुख को गीत बनाता है, संघर्ष को लोककथा और त्याग को संस्कार। वन्देमातरम् की भावना इसी संवेदनशीलता से जुड़ती है। भोजपुरिया किसान जब खेत जोतते हुए धरती को “माई” कहकर प्रणाम करता है, तो वह अनजाने में ही उसी भाव को जी रहा होता है—मातृभूमि की वन्दना।
भोजपुरी समाज: मिट्टी से उपजा राष्ट्रबोध#भोजपुरी समाज की जड़ें गंगा, सरयू, घाघरा और सोन के तटों में फैली हुई हैं। यह वह भूभाग है जिसने भारत को सिर्फ अन्न नहीं दिया, बल्कि विद्रोह, भक्ति और बलिदान की परंपरा दी। 1857 की क्रांति में मंगल पांडेय की हुंकार हो या कुंवर सिंह का शौर्य—इन सबके मूल में वही चेतना थी, जिसे बाद में वन्देमातरम् ने शब्द दिए।भोजपुरी समाज के लिए राष्ट्र कोई अमूर्त विचार नहीं, बल्कि जीवित माँ है—जिसकी गोद में जन्म हुआ, जिसकी छाया में जीवन पला और जिसकी रक्षा के लिए मर मिटना भी सौभाग्य माना गया। इसलिए जब वन्देमातरम् गाया जाता है, तो यह यहाँ केवल सभा या मंच का नारा नहीं बनता, बल्कि घर-आँगन, खेत-खलिहान और मेले-ठेले तक उतर आता है।
भाषा, लोकगीत और वन्देमातरम् की आत्मा #भोजपुरी लोकगीतों में मातृभूमि का बिंब बार-बार उभरता है। “धरती माई”, “गंगा मइया”, “देहिया भारत के” जैसे शब्द केवल भावुक संबोधन नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र को माता मानने की परंपरा के प्रमाण हैं। वन्देमातरम् भी इसी परंपरा का शास्त्रीय और राष्ट्रीय विस्तार है।भोजपुरी समाज ने कभी राष्ट्रभक्ति को कठिन दर्शन नहीं बनाया। यहाँ देशप्रेम सहज है—माँ के प्रति प्रेम की तरह। जब कोई भोजपुरिया सैनिक सीमा पर जाता है, तो माँ के आँचल से बँधकर जाता है। उस आँचल में वन्देमातरम् की अनकही गूँज होती है।
स्वतंत्रता संग्राम और भोजपुरिया चेतना#स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वन्देमातरम् ब्रिटिश सत्ता के लिए सबसे बड़ा भय बन गया था। कारण स्पष्ट था—यह गीत भारतीयों को दास नहीं, पुत्र और योद्धा बना रहा था। भोजपुरी अंचल में यह चेतना और भी प्रखर थी। यहाँ के किसान, साधु, विद्यार्थी और स्त्रियाँ—सबने वन्देमातरम् को केवल गाया नहीं, जिया।ग्रामीण स्त्रियाँ जब चूल्हा जलाते समय धरती को प्रणाम करती थीं, तब उनके लिए वन्देमातरम् कोई विदेशी शब्द नहीं था। वह उनके जीवन का भाव था। यही कारण है कि भोजपुरी समाज में राष्ट्रद्रोह कभी स्वीकार्य नहीं रहा। यहाँ देशद्रोह केवल कानून का अपराध नहीं, संस्कार का पतन माना गया।विस्थापन, पीड़ा और मातृभूमि का स्मरण#भोजपुरी समाज का एक बड़ा हिस्सा रोज़गार के लिए देश-विदेश गया—कोलकाता, मुंबई, असम, फिजी, मॉरीशस, सूरीनाम तक। पर जहाँ भी गया, अपने साथ माँ की मिट्टी की स्मृति ले गया। प्रवासी भोजपुरिया जब परदेस में वन्देमातरम् सुनता है, तो उसकी आँखें भर आती हैं। यह आँसू राजनीतिक नहीं, भावनात्मक होते हैं।
परदेस में मजदूरी करते हुए भी वह अपने बच्चों को भारत माता की कथा सुनाता है। यही वह संवेदना है जो वन्देमातरम् को भोजपुरी समाज के हृदय में स्थायी स्थान देती है।आज के समय में वन्देमातरम् और भोजपुरिया समाज#आज जब वन्देमातरम् पर प्रश्नचिह्न लगाए जाते हैं, तब भोजपुरी समाज का मौन भी बहुत कुछ कहता है। यह समाज विवाद नहीं, संकल्प में विश्वास करता है। यहाँ वन्देमातरम् का विरोध समझ से परे है, क्योंकि यह गीत किसी मजहब या राजनीति का नहीं, बल्कि माँ का है।भोजपुरी समाज जानता है कि माँ की वन्दना से किसी का अपमान नहीं होता, बल्कि समाज का उत्थान होता है। इसलिए आज भी गाँवों के विद्यालयों में, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में और सामाजिक आयोजनों में वन्देमातरम् उसी श्रद्धा से गाया जाता है, जैसे आरती।
वन्देमातरम् भोजपुरिया आत्मा का स्वर#वन्देमातरम् और भोजपुरी समाज का संबंध औपचारिक नहीं, आत्मिक है। यह संबंध इतिहास से उपजा, संघर्ष में पला और संस्कार में ढला है। भोजपुरिया समाज ने वन्देमातरम् को न तो नारे की तरह इस्तेमाल किया, न ही विवाद का विषय बनाया—उसने इसे माँ की तरह स्वीकार किया।जब तक भोजपुरी समाज की भाषा में भाव, गीत में करुणा और जीवन में त्याग रहेगा, तब तक वन्देमातरम् जीवित रहेगा—न केवल शब्दों में, बल्कि संस्कारों में।
और शायद यही वन्देमातरम् की सबसे बड़ी विजय है—कि वह भोजपुरी समाज की धड़कन बन चुका है।
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