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बुधवार, 7 जनवरी 2026

मोदी जी “करदाता के पैसों से राष्ट्रद्रोह? जेएनयू की वैचारिक फैक्ट्री पर सवाल”

 



नफरत की प्रयोगशाला: जेएनयू — जहाँ राष्ट्रविरोध ‘अकादमिक स्वतंत्रता’ कहलाता है

जब भी देश किसी निर्णायक मोड़ पर खड़ा होता है—आतंक, कूटनीति, सेना, राष्ट्रगौरव या सांस्कृतिक पुनर्जागरण—तभी दिल्ली की एक पहाड़ी पर स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से एक परिचित शोर उठता है। यह शोर न शोध का होता है, न नवाचार का, न राष्ट्रनिर्माण का। यह शोर होता है—भारत के विरुद्ध खड़े होने का।ताज़ा घटनाएँ कोई अपवाद नहीं, बल्कि जेएनयू की वैचारिक डीएनए का ताज़ा संस्करण हैं। यहाँ “असहमति” के नाम पर राष्ट्रद्रोह का सौंदर्यीकरण, “संवाद” के नाम पर आतंक-समर्थन का सॉफ्ट लॉन्च, और “अकादमिक स्वतंत्रता” के नाम पर हिंदू-विरोध, सेना-विरोध और भारत-विरोध का खुला प्रदर्शन वर्षों से होता आया है।

त्वरित घटनाएँ: चिंगारी नहीं, लगातार जलती भट्ठी-हाल की घटनाओं में भारत की संप्रभुता, सुरक्षा बलों और संवैधानिक संस्थाओं पर हमले कोई अचानक फूट पड़ा उबाल नहीं हैं। ये उसी दीर्घकालिक प्रशिक्षण का परिणाम हैं, जिसमें छात्र को पहले “पीड़ित” बनाया जाता है, फिर “क्रांतिकारी”, और अंततः राष्ट्र-विरोधी पोस्टरबॉय।यहाँ प्रश्न पूछना नहीं सिखाया जाता—यहाँ संदेह बोया जाता है। यहाँ इतिहास नहीं पढ़ाया जाता—इतिहास को अभियुक्त बनाया जाता है। यहाँ विचार-विमर्श नहीं होता—विचारधारा का दंड-विधान चलता है।

पुरानी परम्परा: 1970 के दशक से 2020 तक-जेएनयू की वैचारिक धुरी दशकों से वही है—मार्क्सवादी-लेनिनवादी रोमांटिसिज़्म, जिसमें भारत एक “असफल राष्ट्र”, सेना एक “दमनकारी मशीन”, और बहुसंख्यक संस्कृति एक “खतरा” है।आपातकाल के दौर से लेकर कश्मीर पर झूठे नैरेटिव, नागरिकता कानून पर दुष्प्रचार, सर्जिकल स्ट्राइक पर संदेह और वैश्विक मंचों पर भारत की छवि धूमिल करने तक—एक सीधी रेखा खींची जा सकती है। यह रेखा संयोग नहीं, सिस्टमेटिक इंडोctrination है।

नफरत की प्रयोगशाला कैसे काम करती है-शब्दों की तोड़-मरोड़: राष्ट्रवाद = फासीवाद, संस्कृति = ब्राह्मणवाद, कानून = दमन-चयनात्मक नैतिकता: आतंक पर मौन, सेना पर उपहासवै-श्विक गैंग-अप: विदेशी एनजीओ, थिंक-टैंक और मीडिया को “सोर्स” बनाना -पीड़ित-कार्ड: हर कार्रवाई पर “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” का रोना

यह सब अकादमिक नहीं, एक्टिविस्ट प्रशिक्षण है—जिसका उद्देश्य डिग्री नहीं, डिसरप्शन है।राज्य का मौन और करदाता का अपमान-सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि करदाता के पैसे से चलने वाली संस्था भारत के विरुद्ध वैचारिक युद्ध का अड्डा कैसे बनी?

क्या विश्वविद्यालय का काम राष्ट्र की बुनियाद पर प्रश्नचिह्न लगाना है?क्या शिक्षा का उद्देश्य संविधान के प्रति निष्ठा तोड़ना है?जब कार्रवाई होती है, तो वही परिचित राग—“बुद्धिजीवियों पर हमला”—शुरू हो जाता है। परंतु बुद्धिजीवी वह होता है जो समाज को जोड़ता है, न कि वह जो उसे तोड़ने की थ्योरी गढ़े।समाधान: ताले नहीं, रीढ़ चाहिएयह स्पष्ट है—समस्या ताले लगाने से नहीं सुलझेगी, पर रीढ़ के बिना भी नहीं।फंडिंग की पारदर्शिता-पाठ्यक्रम की राष्ट्र-संवेदी समीक्षा-कादमिक और एक्टिविज़्म की स्पष्ट सीमा कानून का निष्पक्ष, निर्भीक पालन

यह सेंसरशिप नहीं, संस्थागत स्वच्छता है। विश्वविद्यालय या वैचारिक युद्ध-शिविर?जेएनयू को तय करना होगा—वह विश्वविद्यालय है या वैचारिक युद्ध-शिविर।भारत अब 1970 का भ्रमित राष्ट्र नहीं। यह 21वीं सदी का आत्मविश्वासी गणराज्य है, जो आलोचना सुनता है—पर आत्मघात नहीं।राष्ट्र आलोचना से नहीं टूटता,राष्ट्र भीतर से घृणा फैलाने वालों से टूटता है।और यदि शिक्षा के मंदिर ही नफरत की प्रयोगशाला बन जाएँ,तो चेतना का हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है।

— कौटिल्यीय दृष्टि से संपादकीय 


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