वन्देमातरम पञ्चपञ्चाशत् श्रृंखला 55
वन्देमातरम् और औपनिवेशिक कारागार
(राष्ट्रगान-चेतना बनाम साम्राज्य की कैदख़ाने-नीति : 55वीं श्रृंखला)
वन्देमातरम्—यह मात्र दो शब्दों का उद्घोष नहीं, बल्कि औपनिवेशिक भारत में आत्मा की वह पुकार है, जिसने गुलामी की जंजीरों को चुनौती दी। जब-जब यह गीत गूंजा, तब-तब ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिली। यही कारण था कि साम्राज्य ने केवल तलवार और कानून से नहीं, बल्कि कारागारों—खुले, बंद और द्वीपीय—के माध्यम से इस चेतना को कुचलने का सुनियोजित प्रयास किया। औपनिवेशिक कारागार, सत्ता के वे प्रयोगशाला-घर थे, जहाँ राष्ट्रवादी विचारों को “अपराध” और मातृभूमि-प्रेम को “राजद्रोह” घोषित किया गया।वन्देमातरम् : गीत से चेतना तक का गीत.बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का ‘आनन्दमठ’ और उसमें निहित ‘वन्देमातरम्’ ब्रिटिश सत्ता के लिए इसलिए असहनीय था क्योंकि यह किसी राजवंश का जयघोष नहीं, बल्कि मातृभूमि को देवी के रूप में प्रतिष्ठित करने वाला सांस्कृतिक-राजनीतिक घोष था। यह गीत व्यक्ति को प्रजा से नागरिक और नागरिक से स्वाधीनता-योद्धा बनाता था। यही रूपांतरण औपनिवेशिक सत्ता को भयभीत करता रहा।
औपनिवेशिक कारागार : दमन की संरचना,,ब्रिटिश शासन ने कारागारों को केवल अपराधियों के लिए नहीं, बल्कि विचारों के दमन के लिए गढ़ा। जेल मैनुअल, श्रम-नियम, एकांतवास, बेड़ियाँ, सेंसरशिप—सबका उद्देश्य था: विचार को थकाना, आत्मा को झुकाना।केंद्रीय जेलें: राजनीतिक बंदियों को कठोर श्रम, अनुशासन और अलगाव।खुले कारागार: निगरानी के साथ श्रम—दमन का “नरम” आवरण।द्वीपीय कारागार (सेल्युलर जेल, अंडमान): विचारों का निर्वासन—परिवार, समाज और मातृभूमि से पूर्ण विच्छेद।सेल्युलर जेल : मौन की साज़िश रही,अंडमान की सेल्युलर जेल औपनिवेशिक दमन का चरम प्रतीक थी। यहाँ कैदी को नाम नहीं, नंबर दिया जाता; संवाद नहीं, एकांत मिलता; और श्रम—नारियल का कोल्हू—मानव देह को यंत्र बना देता। पर paradox यही कि इसी मौन में वन्देमातरम् की प्रतिध्वनि भीतर और तेज़ हो उठी। बेड़ियों की खनक, गीत की ताल बन गई।
राजद्रोह का कानून और राष्ट्रगीत,,धारा 124A—राजद्रोह—ब्रिटिश सत्ता का वह कानूनी हथियार था, जिससे वन्देमातरम् जैसे गीतों को अपराध ठहराया गया। गीत गाने, छापने, पढ़ाने—सब पर मुक़दमे। अदालतों में यह तर्क दिया गया कि मातृभूमि को देवी कहना “राजा की निष्ठा” के विरुद्ध है। वस्तुतः यह संघर्ष सांस्कृतिक प्रभुसत्ता बनाम साम्राज्यवादी प्रभुसत्ता का था।
कारागारो में जन्मा संगठन,जेलें केवल दमन-स्थल नहीं रहीं; वे राजनीतिक विश्वविद्यालय बन गईं। विचारों का आदान-प्रदान, इतिहास-पाठ, दर्शन-चर्चा—सब गुप्त रूप से। कई क्रांतिकारियों ने स्वीकार किया कि जेल में उन्होंने भारत को नए सिरे से जाना। वन्देमातरम् यहाँ केवल गीत नहीं, अनुशासन और संकल्प बन गया।धर्म, संस्कृति और औपनिवेशिक भय का प्रतीक,ब्रिटिश प्रशासन ने वन्देमातरम् को “धार्मिक” बताकर प्रतिबंधित करने की कोशिश की, जबकि भारतीय राष्ट्रवाद में संस्कृति और धर्म सामाजिक ऊर्जा के स्रोत थे, न कि बहिष्करण के औज़ार। साम्राज्य का भय यह था कि यदि संस्कृति संगठित हुई, तो शासन टिक नहीं पाएगा। इसलिए कारागारों में धार्मिक प्रतीकों, ग्रंथों और गीतों पर कड़ी निगरानी रखी गई।
स्त्रियाँ, गीत और जेल,औपनिवेशिक कारागारों में स्त्रियों की उपस्थिति कम आंकी गई, पर उनका योगदान निर्णायक रहा। जेलों के बाहर स्त्रियाँ वन्देमातरम् को घर-घर पहुँचाती रहीं; भीतर बंदियों के लिए संदेश, पुस्तकें, और नैतिक समर्थन जुटाती रहीं। गीत स्त्री-स्वर में घर से आंदोलन तक पहुँचा।खुले कारागार और सामाजिक नियंत्रण रहता,खुले कारागारों का दावा था—पुनर्वास। वास्तविकता—निरंतर निगरानी। यहाँ राष्ट्रवादी कैदी समाज में रहते हुए भी नज़रबंद थे। पर यही व्यवस्था उलटी पड़ गई; कैदी समाज के बीच रहकर वन्देमातरम् की चेतना को और व्यापक करने लगे।
भाषा, प्रेस और सेंसर,,औपनिवेशिक शासन ने प्रेस अधिनियमों से गीतों और लेखों पर प्रतिबंध लगाया। वन्देमातरम् के छपते ही प्रेस जब्त, संपादक जेल। पर भाषा की शक्ति यह थी कि प्रतिबंध लोकस्मृति में गीत को और स्थायी कर गया। जेलें अख़बारों के बिना भी विचारों के अख़बार बन गईं।कारागार-जीवन और नैतिक राजनीति रही,जेल में उपवास, सत्याग्रह, अनुशासन—ये सब नैतिक राजनीति के उपकरण बने। वन्देमातरम् यहाँ आत्मसंयम और त्याग का पाठ पढ़ाता रहा। साम्राज्य ने देह को बाँधा, पर नैतिकता को नहीं।
स्वाधीनता के बाद : स्मृति और विमर्श,,आज प्रश्न यह नहीं कि औपनिवेशिक कारागार क्या थे—बल्कि यह कि हम उन्हें कैसे याद करते हैं। यदि जेलें केवल पत्थर की इमारतें बनकर रह गईं, तो हमने इतिहास से अन्याय किया। वे स्थल चेतना-संग्रहालय हैं—जहाँ वन्देमातरम् की प्रतिध्वनि आज भी सुनी जा सकती हैआधुनिक भारत में जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राष्ट्रगीत, और कानून पर बहस होती है, तब औपनिवेशिक कारागारों का अनुभव हमें चेतावनी देता है—कानून यदि विचार को कुचलने लगे, तो वह साम्राज्यवादी बन जाता है। वन्देमातरम् का अर्थ है—संविधानिक स्वतंत्रता के साथ सांस्कृतिक आत्मविश्वास।
वन्देमातरम् और औपनिवेशिक कारागार—यह कथा गीत बनाम जेल की नहीं, बल्कि आत्मा बनाम साम्राज्य की है। कारागारों ने देह को कैद किया, पर गीत ने आत्मा को मुक्त रखा। इतिहास का सत्य यही है कि जो गीत जेलों में जीवित रहता है, वही राष्ट्रों को जीवित रखता है। वन्देमातरम् इसलिए अमर है क्योंकि उसने कारागारों को भी विद्यालय बना दिया—जहाँ स्वतंत्रता का सबसे कठिन, पर सबसे सच्चा पाठ पढ़ाया गया.
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