राजेश सिंह बागी, राष्ट्रवादी विचारक
600 किलो स्वर्ण, एक राष्ट्र और हमारी विस्मृति
(संवेदनशील, विस्तृत संपादकीय)
कुछ ख़बरें शोर नहीं मचातीं,पर आत्मा को झकझोर देती हैं।
कुछ मृत्यु केवल किसी व्यक्ति का अंत नहीं होतीं,वे हमारे सामूहिक विवेक की परीक्षा होती हैं।बिहार के दरभंगा राज परिवार की महारानी कामसुंदरी देवी का 94 वर्ष की आयु में गुमनामी के बीच निधन—ऐसी ही एक घटना है। 1962 के भारत–चीन युद्ध के समय, जब देश अस्तित्व के संकट से जूझ रहा था, इस महारानी ने लगभग 600 किलो सोना राष्ट्र की रक्षा के लिए दान कर दिया।कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं, कोई शर्त नहीं, कोई प्रचार नहीं—सिर्फ़ राष्ट्र प्रथम।और आज?न कोई राष्ट्रीय शोक,न कोई सरकारी श्रद्धांजलि,न कोई टीवी बहस,न अख़बार का पहला पन्ना।
यह चुप्पी साधारण नहीं है।यह बेहद पीड़ादायक है।त्याग की वह पीढ़ी, जो सवाल नहीं करती थी1962 का भारत आज के भारत से अलग था।
तब दान का अर्थ कर्तव्य था,और राष्ट्रवाद पोस्टर नहीं, प्राण था। महारानी कामसुंदरी देवी उस पीढ़ी की प्रतिनिधि थीं— जो यह नहीं पूछती थी कि“देश ने हमें क्या दिया?”बल्कि यह सोचती थी कि“देश को हमारी क्या आवश्यकता है?”600 किलो सोना केवल धातु नहीं था,
वह सदियों की विरासत, स्त्रियों के गहने, पीढ़ियों की स्मृति थ जिसे उन्होंने बिना हिचक राष्ट्र को सौंप दिया।मौत गुमनामी में नहीं, व्यवस्था की उपेक्षा में हुई यह कहना कि उनकी मृत्यु “गुमनामी” में हुई—दरअसल एक आधा सच है।सच यह है कि हमारी व्यवस्था ने उन्हें गुमनामी में छोड़ दिया। जिस देश मेंउद्घाटन और शिलान्यास उत्सव बन जाते हैं, सत्ता के समीप रहने वाले इतिहास बन जाते हैं,
उसी देश में एक ऐसी महिला, जिसने युद्धकाल में राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को सहारा दिया—उसके लिए कोई राष्ट्रीय स्मरण नहीं!यह केवलcप्रशासनिक भूल नहीं, नैतिक असंवेदनशीलता है। मीडिया का मौन: सबसे बड़ा प्रश्न यदि कोई अभिनेता छींक दे—तो कैमरे दौड़ पड़ते हैं।
कुछ ख़बरें शोर नहीं मचातीं,पर आत्मा को झकझोर देती हैं।
कुछ मृत्यु केवल किसी व्यक्ति का अंत नहीं होतीं,वे हमारे सामूहिक विवेक की परीक्षा होती हैं।बिहार के दरभंगा राज परिवार की महारानी कामसुंदरी देवी का 94 वर्ष की आयु में गुमनामी के बीच निधन—ऐसी ही एक घटना है। 1962 के भारत–चीन युद्ध के समय, जब देश अस्तित्व के संकट से जूझ रहा था, इस महारानी ने लगभग 600 किलो सोना राष्ट्र की रक्षा के लिए दान कर दिया।कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं, कोई शर्त नहीं, कोई प्रचार नहीं—सिर्फ़ राष्ट्र प्रथम।और आज?न कोई राष्ट्रीय शोक,न कोई सरकारी श्रद्धांजलि,न कोई टीवी बहस,न अख़बार का पहला पन्ना।
यह चुप्पी साधारण नहीं है।यह बेहद पीड़ादायक है।त्याग की वह पीढ़ी, जो सवाल नहीं करती थी1962 का भारत आज के भारत से अलग था।
तब दान का अर्थ कर्तव्य था,और राष्ट्रवाद पोस्टर नहीं, प्राण था। महारानी कामसुंदरी देवी उस पीढ़ी की प्रतिनिधि थीं— जो यह नहीं पूछती थी कि“देश ने हमें क्या दिया?”बल्कि यह सोचती थी कि“देश को हमारी क्या आवश्यकता है?”600 किलो सोना केवल धातु नहीं था,
वह सदियों की विरासत, स्त्रियों के गहने, पीढ़ियों की स्मृति थ जिसे उन्होंने बिना हिचक राष्ट्र को सौंप दिया।मौत गुमनामी में नहीं, व्यवस्था की उपेक्षा में हुई यह कहना कि उनकी मृत्यु “गुमनामी” में हुई—दरअसल एक आधा सच है।सच यह है कि हमारी व्यवस्था ने उन्हें गुमनामी में छोड़ दिया। जिस देश मेंउद्घाटन और शिलान्यास उत्सव बन जाते हैं, सत्ता के समीप रहने वाले इतिहास बन जाते हैं,
उसी देश में एक ऐसी महिला, जिसने युद्धकाल में राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को सहारा दिया—उसके लिए कोई राष्ट्रीय स्मरण नहीं!यह केवलcप्रशासनिक भूल नहीं, नैतिक असंवेदनशीलता है। मीडिया का मौन: सबसे बड़ा प्रश्न यदि कोई अभिनेता छींक दे—तो कैमरे दौड़ पड़ते हैं।
यदि कोई अपराधी बयान दे—तो प्राइम टाइम सज जाता है।
पर जब राष्ट्र को 600 किलो सोना देने वाली महारानी दुनिया से विदा होती हैं—तो मीडिया को यह “टीआरपी योग्य” नहीं लगता।यह पत्रकारिता की मजबूरी नहीं,प्राथमिकताओं की गिरावट है।संवेदनशीलता को हमने स्पॉन्सरशिप से तौलना शुरू कर दिया है।
सरकार से अपेक्षा: केवल घोषणाएँ नहीं, स्मरणयह लेख सरकार-विरोध नहीं है,यह कर्तव्य-स्मरण है।ऐसी विभूतियों के लिए—राजकीय सम्मानस्मृति-स्थल पाठ्यपुस्तकों में उल्लेख और राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता
कोई उपकार नहीं,न्यूनतम कर्तव्य है।यदि राष्ट्र अपने उपकारकों को याद नहीं रखेगा,तो आने वाली पीढ़ियाँ त्याग नहीं, केवल सुविधा सीखेंगी।
यह खबर क्यों आवश्यक है?क्योंकि यह हमें बताती है—राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनतावह बलिदान और विश्वास से बनता है
यह खबर हमें असहज करती है,क्योंकि यह पूछती है—हमने किन्हें हीरो बनाया और किन्हें भुला दिया?अंतिम शब्दमहारानी कामसुंदरी देवी
कोई इतिहास की पंक्ति नहीं थीं,वे इतिहास की आत्मा थीं।
उनकी मृत्यु पर शोर नहीं हुआ, यदि आज भी हम चुप रहे
तो यह चुप्पीहमारे भविष्य की दिशा तय करेगी।श्रद्धांजलि फूलों से नहीं,स्मरण और सम्मान से होती है।यह संपादकीय श्रद्धांजलि नहीं,एक विनम्र लेकिन कठोर प्रश्न है—क्या हम अपने राष्ट्रसेवकों के योग्य हैं?
पर जब राष्ट्र को 600 किलो सोना देने वाली महारानी दुनिया से विदा होती हैं—तो मीडिया को यह “टीआरपी योग्य” नहीं लगता।यह पत्रकारिता की मजबूरी नहीं,प्राथमिकताओं की गिरावट है।संवेदनशीलता को हमने स्पॉन्सरशिप से तौलना शुरू कर दिया है।
सरकार से अपेक्षा: केवल घोषणाएँ नहीं, स्मरणयह लेख सरकार-विरोध नहीं है,यह कर्तव्य-स्मरण है।ऐसी विभूतियों के लिए—राजकीय सम्मानस्मृति-स्थल पाठ्यपुस्तकों में उल्लेख और राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता
कोई उपकार नहीं,न्यूनतम कर्तव्य है।यदि राष्ट्र अपने उपकारकों को याद नहीं रखेगा,तो आने वाली पीढ़ियाँ त्याग नहीं, केवल सुविधा सीखेंगी।
यह खबर क्यों आवश्यक है?क्योंकि यह हमें बताती है—राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनतावह बलिदान और विश्वास से बनता है
यह खबर हमें असहज करती है,क्योंकि यह पूछती है—हमने किन्हें हीरो बनाया और किन्हें भुला दिया?अंतिम शब्दमहारानी कामसुंदरी देवी
कोई इतिहास की पंक्ति नहीं थीं,वे इतिहास की आत्मा थीं।
उनकी मृत्यु पर शोर नहीं हुआ, यदि आज भी हम चुप रहे
तो यह चुप्पीहमारे भविष्य की दिशा तय करेगी।श्रद्धांजलि फूलों से नहीं,स्मरण और सम्मान से होती है।यह संपादकीय श्रद्धांजलि नहीं,एक विनम्र लेकिन कठोर प्रश्न है—क्या हम अपने राष्ट्रसेवकों के योग्य हैं?

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