वन्देमातरम षट्पञ्चाशत् श्रृंखला 56
वन्दे मातरम् और स्वतंत्रता संग्राम की पत्रकारिता
राष्ट्रीय चेतना, वैचारिक संघर्ष और औपनिवेशिक दमन का दस्तावेज
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल तलवार, सत्याग्रह और जनांदोलनों का इतिहास नहीं है; वह शब्दों, विचारों और पत्रकारिता के माध्यम से लड़ा गया एक सशक्त बौद्धिक युद्ध भी था। इस वैचारिक युद्ध का सबसे प्रभावशाली और भावनात्मक उद्घोष था— “वन्दे मातरम्”। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध खड़ी भारतीय पत्रकारिता की आत्मा, चेतना और प्रेरणा बन गया। स्वतंत्रता संग्राम की पत्रकारिता में वन्दे मातरम् एक नारे, संपादकीय दृष्टि और राष्ट्रवादी संकल्प के रूप में व्याप्त रहा।
वन्दे मातरम्: गीत से राष्ट्रवादी घोषणापत्र तक*बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वन्दे मातरम् का जन्म साहित्यिक कृति आनंदमठ (1882) में हुआ, परंतु उसका वास्तविक विस्तार पत्रकारिता के माध्यम से हुआ। ब्रिटिश सत्ता ने बहुत शीघ्र यह समझ लिया कि यह गीत जनता में केवल भावनात्मक उत्तेजना नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतना का संचार कर रहा है।यही कारण था कि वन्दे मातरम् धीरे-धीरे राष्ट्रवादी अखबारों और पत्रिकाओं की शीर्षक पंक्तियों, संपादकीय विचारों और जनांदोलनों की आत्मा बन गया।
स्वतंत्रता संग्राम की पत्रकारिता: मिशन, नहीं व्यवसाय*उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में भारतीय पत्रकारिता का चरित्र आज की तरह व्यावसायिक नहीं था। वह राष्ट्र-निर्माण का साधन थी। उस समय का पत्रकार सत्ता का प्रवक्ता नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ था।बाल गंगाधर तिलक के केसरी और मराठा, गणेश शंकर विद्यार्थी के प्रताप, मदन मोहन मालवीय के अभ्युदय, विपिन चंद्र पाल के न्यू इंडिया, अरविंद घोष के वन्दे मातरम् जैसे पत्रों ने पत्रकारिता को एक क्रांतिकारी मंच बना दिया।विशेष रूप से अरविंद घोष द्वारा संपादित अंग्रेज़ी साप्ताहिक ‘Vande Mataram’ (1906) ब्रिटिश सरकार के लिए सबसे बड़ा वैचारिक खतरा बन गया। इस पत्र ने स्वराज, बहिष्कार और पूर्ण स्वतंत्रता की मांग को वैचारिक आधार प्रदान किया।
वन्दे मातरम् और औपनिवेशिक सेंसरशिप*ब्रिटिश शासन ने भारतीय पत्रकारिता को दबाने के लिए कठोर कानून बनाए—1878 का वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट,1908 का प्रेस एक्ट,1910 का इंडियन प्रेस एक्ट.इन कानूनों का प्रमुख लक्ष्य वही पत्र थे जो वन्दे मातरम् की भावना को प्रसारित कर रहे थे। अखबारों पर जुर्माने लगे, प्रेस जब्त हुए, संपादक जेल भेजे गए।फिर भी, राष्ट्रवादी पत्रकारिता झुकी नहीं।गणेश शंकर विद्यार्थी ने स्पष्ट लिखा था—पत्रकार का कर्तव्य सत्ता की सेवा नही अपितु युगधर्म का आह्वान है.
वन्दे मातरम्: संपादकीय विचारधारा के रूप में,स्वतंत्रता संग्राम की पत्रकारिता में वन्दे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक संपादकीय दृष्टिकोण था।इसका अर्थ था—मातृभूमि को देवी के रूप में देखना,दासता को पाप मानना,स्वराज को धर्म समझना,बलिदान को कर्तव्य स्वीकार करना
अखबारों के लेख, कविताएँ, कार्टून, घोषणाएँ—सब इसी दृष्टि से लिखे जाते थे। ब्रिटिश शासन को यह डर केवल शब्दों से नहीं था, बल्कि उस मानसिक स्वतंत्रता से था, जिसे पत्रकारिता जन्म दे रही थी।
क्रांतिकारी पत्रकारिता और वन्दे मातरम,भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारी भी पत्रकारिता से गहरे जुड़े थे। प्रताप, चांद, किरती जैसी पत्रिकाएँ क्रांतिकारी विचारों की प्रयोगशाला थीं।इन पत्रों में वन्दे मातरम् केवल उद्घोष नहीं, बल्कि शपथ बन चुका था।भगत सिंह ने लिखा—“क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।”यह “विचारों की सान” स्वतंत्रता संग्राम की पत्रकारिता ही थी।महात्मा गांधी और वन्दे मातरम् की पत्रकारिता-गांधीजी ने यंग इंडिया, हरिजन और नवजीवन के माध्यम से पत्रकारिता को नैतिक अनुशासन दिया।यद्यपि गांधीजी ने वन्दे मातरम् को लेकर संतुलित दृष्टि(असहज) अपनाई, पर वे इसके राष्ट्रवादी भाव के समर्थक थे।उनकी पत्रकारिता सत्य, अहिंसा और स्वराज को जोड़ते हुए जनता को जागरूक करने का माध्यम बनी।
पत्रकारिता: जेलों से निकलती आवाज़-स्वतंत्रता संग्राम की पत्रकारिता अक्सर जेलों से संचालित होती थी। लेखक-संपादक जेल में होते थे, फिर भी लेख बाहर पहुँचते थे।सेलुलर जेल, अलीपुर जेल, नैनी जेल—ये सब केवल कारागार नहीं, बल्कि विचारों के विश्वविद्यालय थे। वन्देमातरम इन जेलों में गूंजता था—जेल की दीवारों से टकराकर, फिर अखबारों के पन्नों में उतर आता था।
स्वतंत्रता के बाद: पत्रकारिता का बदला स्वरूप-दुखद विडंबना यह है कि स्वतंत्रता के बाद वही पत्रकारिता, जिसने वन्दे मातरम् को जीवन मंत्र बनाया था, धीरे-धीरे सत्ता-समीकरणों, विज्ञापनों और राजनीतिक स्वार्थों में उलझती चली गई।आज वन्दे मातरम् अक्सर विवाद का विषय बना दिया जाता है, जबकि वह मूलतः एक पत्रकारिता-जनित राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक था।
वन्दे मातरम् आज भी प्रासंगिक क्यों?-वन्दे मातरम् और स्वतंत्रता संग्राम की पत्रकारिता हमें यह सिखाती है कि—पत्रकारिता का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, राष्ट्र का चरित्र गढ़ना है.शब्द भी क्रांति कर सकते हैं,सत्य के लिए जेल जाना अपमान नहीं, गौरव हैआज जब पत्रकारिता पर विश्वास का संकट है, तब वन्दे मातरम् हमें उसकी मूल आत्मा की याद दिलाता है—
निडर, राष्ट्रनिष्ठ और जनपक्षधर पत्रकारिता।वन्दे मातरम् केवल अतीत की स्मृति नहीं,वह आज भी एक प्रश्न है—क्या हमारी पत्रकारिता मातृभूमि के प्रति उतनी ही निष्ठावान है, जितनी स्वतंत्रता संग्राम के दौर में थी?
यह आज क़े युवा क़े लिए अपमानास्पद है कि वन्देमातरम आत्मा आज भी संघर्ष रत है
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