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गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

वन्देमातरम राष्ट्रवाद तथा सांस्कृतिक पुनरुत्थान का माध्यम है।

 स्रोत सोशल गूगल


चत्वारिंशत् श्रृंखला

वन्देमातरम, राष्ट्रवाद तथा सांस्कृतिक पुनरुत्थान का माध्यम है।


वन्देमातरम  और अखंड भारत का भूगोल: एक विस्तृत विश्लेषणवन्दे मातरम भारत का राष्ट्रीय गीत है, जो मातृभूमि की भौगोलिक और सांस्कृतिक सुंदरता का जीवंत चित्रण करता है, जबकि अखंड भारत प्राचीन एकीकृत भारतवर्ष की अवधारणा को प्रतिबिंबित करता है।  यह गीत बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित है तथा स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रवाद का प्रतीक भी।  2025 में इसके 150 वर्ष पूरे होने पर संसदीय चर्चा हुई, जो इसकी प्रासंगिकता दर्शाती है। वन्दे मातरम की रचना और इतिहास बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वन्दे मातरम की रचना 1875 में की, जो 7 नवंबर को बंगदर्शन पत्रिका में प्रकाशित हुआ।  यह उनके उपन्यास आनंदमठ (1882) का हिस्सा है, जो सन्यासी विद्रोह पर आधारित है।  रवींद्रनाथ टैगोर ने 1896 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में इसे गाया तथा संगीतबद्ध किया।  1905 में बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन में राजनीतिक नारे के रूप में प्रयुक्त हुआ, जिसके कारण ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंध लगाया। 

 1937 में कांग्रेस ने पहले दो पदों को राष्ट्रीय गीत घोषित किया, तथा 1950 में संविधान सभा ने जन गण मन के समकक्ष सम्मान दिया। गीत का प्रारंभिक भाग मातृभूमि को "सुजलां सुफलां मलयजशीतलां शस्यश्यामलां" कहकर वर्णित करता है, जो जल, फल, मलय पर्वत की शीतल हवाओं तथा हरी-भरी फसलों वाली भूमि का चित्रण है।  दूसरा पद "शुभ्रज्योत्स्ना पुलकितयामिनीं" से चंद्रमा की रोशनी, फूलों से सजे वृक्षों तथा सुहासिनी मां की मधुर भाषा का वर्णन करता है।  पूर्ण गीत में दुर्गा, कमला तथा वाणी देवियों का उल्लेख है, जो विवाद का कारण बना, इसलिए केवल दो पद अपनाए गए। वन्दे मातरम में निहित भूगोलिक वर्णनवन्दे मातरम मुख्यतः बंगाल की उपजाऊ भूमि से प्रेरित है, किंतु यह अखंड भारत की व्यापक भौगोलिक एकता का प्रतीक है। 

 "सुजलां सुफलां" गंगा-यमुना जैसी नदियों तथा फलों से लदी वादियों को इंगित करता है, जबकि "मलयजशीतलां" दक्षिण भारत के मलय पर्वतों की शीतल वायु को दर्शाता है।  "शस्यश्यामलां" उत्तर तथा पूर्वी भारत की हरी-भरी फसल भूमि का वर्णन है, जो हिमालय से कन्याकुमारी तक विस्तृत है। यह गीत भारत को एक जीवंत इकाई के रूप में चित्रित करता है—चंद्रमा से श्वेत चांदनी, फुल्लकुसुमित द्रुम तथा सुखद वरदायिनी भूमि।  श्री अरविंद के अनुसार, यह बंगाल से आगे पूरे भारत माता का आह्वान है।  आधुनिक संदर्भ में, नई संसद भवन का अखंड भारत नक्शा इसी भूगोलिक एकता को उत्कीर्ण करता है। अखंड भारत की भौगोलिक सीमाएंअखंड भारत प्राचीन भारतवर्ष है, जो महाभारत तथा पुराणों में आर्यावर्त के रूप में वर्णित है।  इसकी सीमाएं हिमालय से हिंद महासागर, ईरान से इंडोनेशिया तक फैलीं, जिसमें आधुनिक पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, म्यांमार, मालदीव तथा तिब्बत शामिल हैं। 

 महाभारत कालीन नक्शे में गंधार (अफगानिस्तान) से कंबोज (कंबोडिया) तक विस्तार है।  यह नौ देशों को समाहित करता है, जो चक्रवर्ती साम्राज्य का प्रतीक है। ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ वन्दे मातरम ने स्वदेशी आंदोलन, बंदे मातरम समाचार पत्र तथा आंदोलनों को प्रेरित किया। गुलबर्गा आंदोलन (1938) में छात्रों ने प्रतिबंध तोड़ा।  मैडम भीकाजी कामा के तिरंगे पर यह अंकित था।  अखंड भारत हिंदुत्व संगठनों द्वारा प्रचारित है, जो सांस्कृतिक एकता पर जोर देता है। महाभारत में भारतवर्ष सम्राट भरत के नाम पर पड़ा, जो हिंदू तथा बौद्ध ग्रंथों में वर्णित है। 

 वर्तमान में, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में वैश्विक संदर्भ में भारत की सांस्कृतिक विरासत उभर रही है।  150वीं वर्षगांठ पर पीएम मोदी ने समारोह उद्घाटित किए। समकालीन प्रासंगिकता वन्दे मातरम एकता का प्रतीक है, जो मद्रास हाईकोर्ट के 2017 आदेश तथा 2022 दिल्ली हाईकोर्ट शपथ के अनुसार सम्मानित है।  अखंड भारत नक्शा नई संसद में स्थापित है, जो सांस्कृतिक गौरव दर्शाता है।  यह गीत साप्ताहिक गायन तथा सरकारी आयोजनों में अनिवार्य है। पूर्ण गीत में "सप्तकोटि कंठ कलकल निनाद कराले" 70 मिलियन हाथों वाली शक्ति का वर्णन है, जो अखंड भारत की सामर्थ्य को इंगित करता है।  आज यह राष्ट्रवाद तथा सांस्कृतिक पुनरुत्थान का माध्यम है।

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