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गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

सीमांत जिलों से खाद की कालाबाजारी? या किसानों क़े भविष्य की तस्करी?

 

रात के अंधेरे में नेपाल सीमा पर खाद की कालाबाजारी और उत्तर प्रदेश सरकार की लाचारी


बस्ती, सिदार्थनगर, बलरापुर, बहराइच, महराहजगंज, कुशीनगर
नेपाल सीमा से सटे उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती ज़िलों में एक बार फिर वही पुरानी, लेकिन और अधिक भयावह होती सच्चाई सामने है—खाद की संगठित कालाबाजारी। दिन में किसान समितियों और गोदामों के बाहर लाइन में खड़ा रहता है, और रात के अंधेरे में वही खाद ट्रकों, पिकअप और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में भरकर नेपाल सीमा पार पहुंचा दी जाती है। यह कोई चोरी-छिपे होने वाला छोटा अपराध नहीं, बल्कि प्रशासनिक संरक्षण में फल-फूल रहा सीमापार सिंडिकेट है।सीमा पर ‘रात का राज’ सूत्रों के अनुसार, यूरिया, डीएपी और एनपीके खाद को पहले स्थानीय सहकारी समितियों से ‘पेपर पर’ किसानों को वितरित दिखाया जाता है। वास्तविकता में वही खाद सीमा के नजदीकी अस्थायी गोदामों में रात होते ही एकत्र कर ली जाती है। नेपाल में ऊंचे दाम, डॉलर-रुपये का अंतर और वहां की मांग—इन सबका लाभ उठाकर लाखों का अवैध कारोबार चल रहा है।
किसान बेबस, दलाल बेखौफ एक तरफ किसान फसल बचाने के लिए दर-दर भटक रहा है, दूसरी तरफ दलाल और माफिया प्रशासन की आंखों के सामने खुलेआम खेल कर रहे हैं। यह सवाल अब केवल कालाबाजारी का नहीं, बल्कि कृषि सुरक्षा और राज्य की संप्रभुता का भी है। आखिर सीमा पर चेकिंग क्यों ढीली है? रात में ट्रकों की आवाजाही किसके आदेश से निर्बाध है?सरकार की ‘लाचारी’ या मौन सहमति?उत्तर प्रदेश सरकार बार-बार सख्ती के दावे करती है—छापेमारी, एफआईआर, निलंबन। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि बड़े मगरमच्छ आज भी सुरक्षित हैं। छोटे दुकानदार पकड़े जाते हैं, फोटो खिंचती है, खबर बनती है—और फिर सब पहले जैसा। 
यह लाचारी नहीं तो और क्या है? या फिर यह मौन सहमति है, जिसमें राजनीतिक संरक्षण और अफसरशाही की मिलीभगत शामिल है?सवाल जो जवाब मांगते हैं
सीमा पर रात में विशेष टास्क फोर्स क्यों नहीं?सहकारी समितियों की डिजिटल ट्रैकिंग वास्तविक समय में क्यों नहीं?नेपाल सीमा तक खाद पहुंचने से पहले किस स्तर पर आंख मूंदी जाती है?
जिन जिलों से सबसे ज्यादा तस्करी होती है, वहां के जिम्मेदार अफसरों पर संपत्ति की जांच क्यों नहीं?
समाधान नहीं, संकल्प चाहिए,समाधान कागज़ पर हैं—ई-पॉस सत्यापन, जीपीएस ट्रैकिंग, नाइट पेट्रोलिंग, अंतर-एजेंसी समन्वय। कमी है तो सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति की। 
जब तक बड़े नामों पर हाथ नहीं पड़ेगा, तब तक किसान की खाद माफिया की तिजोरी में जाती रहेगी।यह केवल खाद की कालाबाजारी नहीं, किसान के भविष्य की तस्करी है।और अगर सरकार अब भी इसे ‘स्थानीय समस्या’ मानकर टालती रही, तो इतिहास इसे लाचारी नहीं, विफलता के रूप में दर्ज करेगा। 

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