वंदेमातरम में सहकारिता
एक तराना जो संगठन बन गया ,वंदे मातरम् केवल एक राष्ट्रगीत नहीं, बल्कि भारत के सहकारी राष्ट्रवाद की आत्मा है, जिसमें माँ, मिट्टी, मजदूर और मातृभूमि के प्रति समर्पण का अनूठा संगम दिखाई देता है। गुलामी के काल में यह गीत जिस तरह हर वर्ग के लोगों को एक स्वर, एक लक्ष्य और एक ध्येय पर संगठित करता है, वही इसकी सहकारिता-दृष्टि को स्पष्ट करता है।वंदे मातरम् में न तो व्यक्ति-पूजा है, न सत्ता-पूजा; यहाँ केवल माँ-भूमि की पूजा है और उसकी सेवा के लिए संगठित जन-शक्ति की पुकार है।यही कारण है कि यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन में एकतरफ भावनात्मक प्रेरणा बना तो दूसरी तरफ स्वदेशी, राष्ट्रीय शिक्षा, स्वदेशी उद्योग और जन-संगठन जैसे सहकारी प्रयोगों का वैचारिक आधार भी बना।
माँ-भूमि की स्तुति और सहकारिता का भाव“सुजलाम्, सुफलाम्, शस्य-श्यामलाम् मातरम्” – इस पंक्ति में भारत माता के सौंदर्य के साथ-साथ सामूहिक श्रम और साझा समृद्धि का दर्शन छिपा है। सुजलाम् केवल नदी-झरने नहीं, बल्कि वे नहरें, कुएँ, तालाब और जल-व्यवस्थाएँ भी हैं जिन्हें किसान और समाज मिलकर बनाते हैं; सुफलाम् केवल प्राकृतिक उर्वरता नहीं, बल्कि सामूहिक परिश्रम से प्राप्त फल है।“शस्य-श्यामलाम्” उस भूमि का चित्र है जो किसानों, मजदूरों, कारीगरों, व्यापारियों और उपभोक्ताओं के सहकार से लहलहाती है।
वंदे मातरम् की माँ एक जीवित राष्ट्र-समष्टि है, जहाँ प्रत्येक नागरिक केवल अधिकार-भोगी नहीं, बल्कि कर्तव्य-निष्ठ सहयोगी है।यहीं से सहकारिता का पहला सूत्र निकलता है – मातृभूमि हमारी साझा पूँजी है, उसका सम्मान और विकास हमारी साझा जिम्मेदारी है। जब माता साझा है, तो संसाधन, अवसर और विकास भी साझा होने चाहिए; सहकारिता इसी साझा दृष्टि का संस्थागत रूप है।
स्वदेशी आंदोलन : वंदे मातरम् से सहकारी अर्थव्यवस्था तक1905 के बंगाल विभाजन के बाद “वंदे मातरम्” स्वदेशी आंदोलन का रणघोष बनकर उभरा। इस आंदोलन की आत्मा केवल विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार नहीं थी, बल्कि देशी उद्योग, देशी शिक्षा, देशी वित्त और देशी संगठन को सहकारी ढंग से खड़ा करने की थी।स्वदेशी की प्रयोगशाला में सहकारिता की अनेक धाराएँ दिखती हैं:राष्ट्रीय विद्यालय और गुरुकुल जहाँ समाज ने मिलकर शिक्षा की व्यवस्था की स्वदेशी मिल, हस्तकरघा, लघु उद्योग और कुटीर उद्योग जिन्हें स्थानीय पूँजी और लोक-समर्थन से चलाया गयाविभिन्न प्रांतों में समितियाँ, लीग और संघ जिन्होंने मिलकर प्रचार, संगठन और बहिष्कार का अभियान चलाया,इन सबका सांस्कृतिक नारा था – “वंदे मातरम्।” यह नारा जहाँ गूँजता, वहाँ लोग मिलकर एकजुट होते, धन देते, समय देते, श्रम देते – यानी सहकारिता की तीन मूल पूँजियाँ (समय, श्रम, साधन) एक माँ के चरणों में अर्पित होतीं।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद : सहकारिता का आत्मिक आधार वंदे मातरम् ने भारत में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नींव रखी, जिसमें राष्ट्र को भाषा, जाति, प्रांत या धर्म की संकरी परिभाषा से नहीं, बल्कि माँ-भूमि के रूप में देखा गया। जब सब स्वयं को एक ही माँ की संतान मानते हैं, तब प्राकृतिक रूप से सहकारिता, साझेदारी और परस्पर सह-अस्तित्व का भाव पैदा होता है।इस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के कुछ मुख्य बिंदु सहकारिता से सीधे जुड़े हैं:राष्ट्र कोई अनुबंध नहीं, बल्कि आध्यात्मिक-सांस्कृतिक संबंध है; ऐसे संबंध में शोषण नहीं, सहयोग का स्थान होता है।धन, ज्ञान और शक्ति जैसे संसाधन केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि समष्टिगत उत्तरदायित्व हैं, जिन्हें समाज के हित में बाँटने की प्रेरणा मिलती है।
“माँ” का भाव हर वर्ग के बीच समानता और आत्मीयता पैदा करता है, जिससे सहकारिता की सामाजिक स्वीकृति मजबूत होती है।इस प्रकार वंदे मातरम् सहकारिता को केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा बनाकर प्रस्तुत करता है।संविधान, राष्ट्रीय गीत और सहकारिता का संदेश1950 में संविधान सभा ने वंदे मातरम् को भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकृति दी और उसे जन गण मन के समान सम्मान दिया। यह निर्णय केवल भावनात्मक नहीं था; इसके पीछे यह समझ भी थी कि भारत की विविधता को एक सूत्र में बाँधने के लिए एक ऐसा गीत चाहिए जो समाज, संस्कृति और समष्टि की चेतना को जागृत करे।
संविधान लोकतंत्र, समानता और न्याय की बात करता है, जो सहकारिता के मूल तत्व हैं।वंदे मातरम् संविधानिक राष्ट्रवाद के उस सांस्कृतिक पक्ष का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें सहयोग, सेवा और समर्पण के बिना अधिकार अधूरे हैं।आज जब सहकारिता मंत्रालय, सहकारी बैंक, दुग्ध संघ, कृषि सहकारी समितियाँ और बहुउद्देशीय सहकारी संस्थाएँ कार्य कर रही हैं, तो इन सबके पीछे जो “साझी मातृभूमि – साझा समृद्धि” का भाव है, उसका स्रोत वंदे मातरम् जैसे राष्ट्रीय प्रतीक हैं।आधुनिक सहकारिता आंदोलन और वंदे मातरम् की प्रासंगिकता वर्तमान समय में सहकारिता को “जन-आंदोलन” बनाने का प्रयास हो रहा है। गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कई मंचों से कहा है कि सहकारिता भारतीय ग्राम्य अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और इसे आधुनिक प्रबंधन, पारदर्शिता और जनभागीदारी के साथ पुनर्जीवित किया जा रहा है। यह दृष्टि सीधा-सीधा वंदे मातरम् की उस चेतना से जुड़ती है जो लोगों में “हम सब मिलकर माँ की सेवा करेंगे” का भाव जगाती है।
आधुनिक सहकारिता में वंदे मातरम् की प्रासंगिकता तीन स्तरों पर देखी जा सकती है:विचार स्तर पर : “माँ” के प्रति समर्पण को गाँव, किसान और श्रमिक के प्रति समर्पण के रूप में विकसित करना।नीति स्तर पर : सहकारी संस्थाओं के माध्यम से लाभ को सदस्य–समाज के बीच न्यायपूर्ण बाँटना, केवल कुछ पूँजीपतियों तक सीमित न रखना।व्यवहार स्तर पर : PACS, दुग्ध संघ, चीनी मिल, श्रमिक सहकारी, आवास सहकारी और शहरी क्रेडिट सोसायटी जैसे मॉडल को जन-सहयोग से मज़बूत बनाना।इस तरह वंदे मातरम् सहकारिता को केवल आर्थिक मॉडल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय कर्तव्य और सांस्कृतिक साधना का रूप देता है।सहकारिता के पाँच आयाम और वंदे मातरम् यदि “सहकारिता” को पाँच आयामों में समझें – सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक – तो वंदे मातरम् इन सभी को स्पर्श करता है।सामाजिक सहकारितागीत जाति, भाषा, क्षेत्र, पंथ से ऊपर उठकर “माँ की संतान” की पहचान देता है।इससे समाज में समरसता, बंधुत्व और परस्पर सहयोग की संस्कृति बनती है, जो सहकारी संस्थाओं के लिए सामाजिक पूँजी का काम करती है।आर्थिक सहकारितास्वदेशी उद्योग, स्वदेशी शिक्षा और स्वदेशी वित्त की प्रेरणा से सहकारी बैंक, उपभोक्ता सहकारी और उत्पादन सहकारी का आदर्श मिलता है।“सुफलाम्, शस्य-श्यामलाम्” आर्थिक समृद्धि को समष्टिगत फल के रूप में चित्रित करता है, जो सहकारिता का लक्ष्य है।
राजनीतिक सहकारिता स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् पर आधारित जनजागरण ने विभिन्न दलों, संगठनों और क्षेत्रों को एक राजनीतिक लक्ष्य – स्वराज – पर संगठित किया।लोकतंत्र में भी यह गीत राजनीतिक दलों, सरकार और जनता के बीच राष्ट्रहित पर सहमति की संस्कृति का प्रतीक बन सकता है।सांस्कृतिक सहकारिताबंगाल में जन्मा गीत पूरे भारत में, विशेषकर दक्षिण और उत्तर भारत तक, अनुवादों और लोकधुनों के माध्यम से पहुँचा, यह सांस्कृतिक सहकार का श्रेष्ठ उदाहरण है।
भाषा-भेद के बावजूद एक ही भाव – माँ के चरणों में वंदना – सबको जोड़ता है।आध्यात्मिक सहकारितागीत में माँ को दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती के रूप में स्मरण किया गया है; यह भक्ति और राष्ट्रभक्ति का समन्वय है।जब साधक, संत, सामान्य नागरिक और क्रांतिकारी एक ही मंत्र – वंदे मातरम् – का जप करते हैं, तो यह आध्यात्मिक सहकारिता का रूप ले लेता है।वंदे मातरम्, लोकतंत्र और सहकार-लोकलोकतंत्र केवल चुनाव और सरकार बदलने का तंत्र नहीं; यह “सहकार-लोक” की स्थापना का माध्यम भी है, जहाँ जनता की भागीदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही मूल मूल्य हैं। वंदे मातरम् लोकतंत्र को एक नैतिक आधार देता है:जनता को स्मरण कराता है कि सत्ता, संसाधन और अवसर माता की अमानत हैं, जिनका दुरुपयोग अपराध है।चुने हुए प्रतिनिधियों को यह संकेत देता है कि उनका पद “माँ की सेवा” का मंच है, न कि निजी सुख-सुविधा का माध्यम।सहकारी संस्थाओं के प्रबंधकों को याद दिलाता है कि वे सदस्यों और समाज के प्रति उत्तरदायी हैं, क्योंकि वे मातृभूमि के संसाधनों का संचालन कर रहे हैं।
इसी दृष्टि से जब सहकारिता मंत्रालय पारदर्शी ऑडिट, प्रोफेशनल मैनेजमेंट और जनभागीदारी की बात करता है, तो वंदे मातरम् की भावना उसके पीछे नैतिक बल बनकर खड़ी होती है।वंदे मातरम् और सहकारिता पर आज की बहसआज जब कुछ समूह वंदे मातरम् पर आपत्ति उठाते हैं या इसे केवल एक “राजनीतिक नारा” बताकर खारिज करना चाहते हैं, तो वे दरअसल उस सहकारी राष्ट्रीय चेतना पर चोट कर रहे होते हैं, जिसने इस देश को गुलामी से मुक्त कराया और लोकतंत्र को मजबूत किया।इस संदर्भ में दो बातें स्पष्ट देखी जा सकती हैं:जो शक्तियाँ भारत की सांस्कृतिक एकता को तोड़ना चाहती हैं, वे सबसे पहले वंदे मातरम् जैसे प्रतीकों पर हमला करती हैं, ताकि “माँ” की साझा पहचान कमजोर हो जाए और सहकारिता के स्थान पर विभाजन की राजनीति मजबूत हो।वहीं दूसरी तरफ, जो भारत को आत्मनिर्भर, स्वाभिमानी और समावेशी बनाना चाहते हैं, वे वंदे मातरम् को सहकारिता, स्वदेशी, ग्राम-समृद्धि और सांस्कृतिक जागरण का सूत्र वाक्य मानते हैं।इसलिए “वंदे मातरम् में सहकारिता” केवल अकादमिक विषय नहीं, बल्कि वर्तमान राष्ट्र-चर्चा का केंद्रीय प्रश्न है – क्या भारत आत्महित से ऊपर उठकर मातृहित और समष्टि हित की दिशा में संगठित हो “ हैं
वंदे मातरम् : भाव से आंदोलन तक माँ-भूमि, सुजलाम-सुफलाम और सहकारितस्वदेशी प्रयोग : वंदे मातरम् और आर्थिक सहकारिता संविधान, राष्ट्रीय गीत और सहकारी राष्ट्रवादआधुनिक सहकारिता मंत्रालय और वंदे मातरम् की प्रेरणाआज की राजनीति में वंदे मातरम् बनाम वोट-बैंक पर व्यापक समर्थ चर्चा अपेक्षित है।

बहुत ही मार्मिक विचारधारा पर आधारित एक सुन्दर लेख और विचार जिसे पढ़ कर बहुत सी जानकारियों का बोध होता है
जवाब देंहटाएंवास्तव मे वंदे मातरम की रचना करते समय पं बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय जी ने यह नही सोचा था कि यह इतना बड़ा आंदोलन इस के पिछे खडा़ हो जायेगा और यह जिवन का महा मंत्र बन कर राष्ट्र धरोहर हो जाऐगा लेकिन सहकारिता के माध्यम से लोग टोलियों के माध्यम से लोग जुडते गए और राष्ट्र कारवां चल पड़ा और आजादी का आंदोलन को एक मजबूत ताकत मिलती गयी जो सहकारिता के माध्यम से ही एक मिसाल बनी लेकिन तब और अब मे काफी अन्तर हो गया है उस समय लोग सहकारिता से जुड कर लोगो के सहयोग करने की भावना से ही लोग जुडते थे और राष्ट्र और समाज निर्माण मे अपना सहयोग करते थे पर अब लोग सहकारिता से सहयोग के लिए नही अपने स्वार्थ लाभ के लिए जुडने का दिखावा करते है अपना भला कर के सहकारिता का दुरूपयोग करते है
अवनीश पांडे लालगंज