माननीय नहीं तो ‘माय लॉर्ड’ क्यो?
यह भाषा नहीं, मानसिक गुलामी की जड़ है**
भारत का संविधान जिस वाक्य से आरंभ होता है— “We the People of India”,वही वाक्य अदालत की देहरी पर आकर दम तोड़ देता है,
“माय लॉर्ड…”यह संबोधन केवल शब्द नहीं है।यह मानसिकता का स्वीकार है—कि न्यायाधीश जनता से ऊपर है,कि न्याय संविधान से नहीं, किसी “लॉर्डशिप” की कृपा से मिलेगा। संविधान में ‘लॉर्ड’ कहाँ लिखा है?भारत के संविधान को खोलकर देखिए—कहीं “My Lord” नहीं मिलेगा,कहीं “Your Lordship” नहीं मिलेगा,कहीं न्यायाधीश को सामंती उपाधि नहीं दी गई।संविधान केवल यह कहता है—Hon’ble Judge, Hon’ble Courtअर्थात माननीय — सम्मानजनक,लेकिन स्वामी नहीं।तो फिर अदालतों में यह सामंती शब्द ज़िंदा कैसे है? उत्तर सीधा है— मानसिक गुलामी,ब्रिटिश चले गए,लेकिन उनकी भाषा, उनकी अदालतें,और उनसे भी अधिक खतरनाक—उनकी सोच हम संभालकर रख लाए।अंग्रेज़ी शासन में न्याय राजा के नाम पर होता था। न्यायाधीश राजा का प्रतिनिधि था।इसलिए उसे “Lord” कहा जाता था।लेकिन आज—भारत गणराज्य है,राजा नहीं, संविधान सर्वोच्च है,और न्यायाधीश लोक-सेवक हैं।फिर भी “माय लॉर्ड” क्यों?क्योंकि हमनेआजादी को कागज़ों में स्वीकारा,दिमाग़ में नहीं।सम्मान या आत्मसमर्पण?यह तर्क अक्सर दिया जाता है—“यह तो सम्मान की भाषा है।”प्रश्न यह है—सम्मान किसका?व्यक्ति का या संस्था का?यदि सम्मान संस्था का है,तो “माननीय न्यायालय” पर्याप्त है।लेकिन जब “माय लॉर्ड” कहा जाता है,तो यह संस्था नहीं,व्यक्ति को ऊपर बैठाता है।यह सम्माननहीं,अवचेतन आत्मसमर्पण है।क्या न्यायपालिका आलोचना से ऊपर है?लोकतंत्र की बुनियाद यह है किहर संस्था आलोचना के दायरे में हो।लेकिन “लॉर्ड” शब्द न्यायपालिका को अदृश्य रूप से आलोचना से ऊपर बैठा देता है। जब आप किसी को “लॉर्ड” कहते हैं,तो आप उसके निर्णय को ईश्वरीय मानने लगते हैं।और यहीं से न्याय नहीं,न्यायिक अहंकार जन्म लेता है।विडंबना देखिए सुप्रीम कोर्ट स्वयं कई बार कह चुका है “हमें ‘माय लॉर्ड’ कहने की आवश्यकता नहीं।”कुछ न्यायाधीश खुलकर कहते हैं—“हम संविधान के सेवक हैं, लॉर्ड नहीं।”फिर भी—निचली अदालतें,अधिवक्ता,सरकारी अधिकारी,आज भी इसी शब्द को अनिवार्य मानते हैं।क्यों?क्योंकि व्यवस्था बदलने से डरती है,और मानसिकता बदलाव से। जब जिलाधिकारी को टोका जाता है जब कोई प्रशासनिक अधिकारी,न्यायालय को संबोधित करते समय “माननीय” कह देता है,और उस पर आपत्ति होती है—तो प्रश्न उठता है—क्या संविधान गलत है?या आदतें?क्या “माननीय” कहना अपराध है?या “माय लॉर्ड” न कहना असहज कर देता है?यह असहजता कानून की नहीं,मानसिक सत्ता की है।लोकतंत्र में कोई ‘लॉर्ड’ नहीं लोकतंत्र का सिद्धांत स्पष्ट है—जनता सर्वोच्च है।लेकिन “माय लॉर्ड” कहकर हम न्यायाधीश को जनता से ऊपर स्थापित करते हैं।यह लोकतंत्र नहीं,नरम सामंतवाद है।आज शब्द है,कल सोच होगी,और परसों व्यवस्था।भाषा सत्ता का औज़ार होती है इतिहास गवाह है—जो भाषा नियंत्रित करता है,वह सत्ता नियंत्रित करता है।
जब तक अदालतों की भाषा औपनिवेशिक रहेगी,तब तक न्यायपूरी तरह जनोन्मुख नहीं हो सकता।न्याय केवल निष्पक्ष होना पर्याप्त नहीं,उसे दिखना भी लोकतांत्रिक चाहिए।अब प्रश्न टालने का नहींयह बहस सम्मान बनाम अपमान की नहीं,यह बहस है—संविधान बनाम सामंती विरासत की।जो आज भी “माय लॉर्ड” पर अड़ा है,वह अनजाने में कह रहा है—“हम अब भी उस दौर में जी रहे हैं जहाँ सत्ता ऊपर से आती है।”कठोर लेकिन आवश्यक निष्कर्ष लोकतंत्र में कोई ‘लॉर्ड’ नहीं होता।जो ‘लॉर्ड’ कहलवाने में सहज हो,उसे संविधान की विनम्रताफिर से पढ़ने की ज़रूरत है।अब समय आ गया है कि न्याय केवल फैसलों में नहीं,
- भाषा में भी आज़ाद दिखे।
“माननीय न्यायालय” कहना कोई विद्रोह नहीं,यह संवैधानिक सम्मान है।और “माय लॉर्ड” छोड़ना असम्मान नहीं,आज़ादी का स्वीकार है।

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