न्याय पर हमला या न्याय का अपमान?आईएएस संतोष वर्मा–जज विजयेंद्र सिंह रावत मामला : व्यवस्था की सड़ांध बेनकाब
इंदौर मध्यप्रदेश
लोकतंत्र की बुनियाद केवल चुनावों से नहीं टिकती, वह टिकती है न्याय पर, व्यवस्था पर, प्रशासन की ईमानदारी पर और संविधान की प्रतिष्ठा पर। यदि कोई आम नागरिक अदालत के दरवाज़े पर दस्तक देता है, तो वह इस भरोसे के साथ जाता है कि कानून उसके लिए समान होगा, न्याय निष्पक्ष होगा और सत्य की रक्षा करने वाली संस्था अदालत किसी भी व्यक्ति, पद, जाति, धर्म या प्रभाव के आगे झुकेगी नहीं। यही भरोसा लोकतंत्र की आत्मा है।लेकिन मध्यप्रदेश के चर्चित मामले — आईएएस संतोष वर्मा और तत्कालीन न्यायिक अधिकारी विजयेंद्र सिंह रावत — ने इस आत्मा को गहरे आघात पहुँचाया है। यह केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं, यह व्यवस्था के चरित्र के पतन का मामला है। इसमें सत्ता, अहंकार, जाति, अपराध, पद और न्यायपालिका — सब कुछ दांव पर लगा हुआ है।
कैसे एक आरोपी अफसर न्याय के नाम पर ‘नायक’ बनाया गया?
मामले की जड़ उस समय से शुरू होती है जब संतोष वर्मा पर एक महिला ने गंभीर आरोप लगाए। आरोप मामूली नहीं थे — अपमान, धमकी, चोट पहुँचाने तथा अभद्र सामग्री प्रसारित करने के। सामान्यतः ऐसे मामलों में सरकारी अधिकारी को पदोन्नति रोक दी जाती है, जांचें तेज होती हैं और सेवा आचरण नियम के अनुसार, उन्हें उच्च पद की जिम्मेदारी नहीं दी जाती।लेकिन यहाँ उल्टा हुआ!वर्मा ने बाकायदा अदालत का एक आदेश पेश कर दिया, जिसमें लिखा था कि उन्हें इन आरोपों से बरी कर दिया गया है। इस तथाकथित आदेश के आधार पर उन्हें आईएएस पदोन्नति दे दी गई। एक अपराध का आरोपी, अचानक एक सम्मानित उच्चाधिकारी के रूप में सामने आया और उसने सत्ता का लाभ लेना चालू कर दिया।बाद में जो खुलासा हुआ, उसने पूरे तंत्र की पोल खोल दी — जिस दिन उन्हें ‘बरी’ दिखाया गया, उस दिन जज छुट्टी पर थे!यानी आदेश नकली था, मनगढ़ंत था, और वह आदेश उसी अदालत से निकलने का दावा कर रहा था जिसके न्यायाधीश उस दिन अनुपस्थित थे! क्या यह महज इत्तफ़ाक़ था? नहीं। यह सुनियोजित अपराध था।जज और अफसर के बीच ‘114 बार संपर्क’ — क्या यह मात्र संवाद था?जांच में यह तथ्य भी निकलकर सामने आया कि उस समय के न्यायिक अधिकारी विजयेंद्र रावत और संतोष वर्मा के बीच 114 बार मोबाइल संपर्क हुआ। एक फर्जी आदेश, और उससे पहले सैकड़ों बार एक अफसर और एक जज का संपर्क — क्या यह केवल दोस्ती थी? या सत्ता और न्याय का व्यापार हो रहा था?यह प्रश्न आज हर नागरिक को पूछना चाहिए, क्योंकि जब न्यायपालिका के भीतर ही न्याय खरीदा-बेचा जाने लगे, तब लोकतंत्र की आधारशिला हिल जाती है।
प्रमोशन: अपराध से बड़ा प्रमाणपत्र?विडंबना देखिए — जिस अपराध में वर्मा आरोपी थे, उसी मामले के कथित ‘नकली आदेश’ को प्रमोशन बोर्ड के सामने रखा गया और यही ‘कथित न्याय’ वर्मा को उच्च प्रशासनिक पद दिलाने का साधन बन गया।प्रश्न यह है:क्या प्रमोशन समिति दस्तावेजों की जांच नहीं करती?क्या अदालत के आदेश की सत्यता जांचने की ज़िम्मेदारी नहीं होती?क्या इतनी बड़ी प्रक्रिया केवल एक काग़ज़ के सहारे पूरी कर दी जाती है?यदि उत्तर ‘हाँ’ है, तो यह प्रणाली केवल काग़ज़ी नहीं, भ्रष्ट है। यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो इस मामले में कई स्तरों पर मिलीभगत है। दोनों ही स्थिति लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है।फिर वही जाति, स्त्री का अपमान और सत्ता का अहंकार,जब मामला शांत हुआ नहीं था, तभी संतोष वर्मा ने एक सार्वजनिक मंच पर बेहद अशोभनीय और जाति–वैमनस्य फैलाने वाला बयान दे दिया। उन्होंने कहा कि “आरक्षण तब तक चलता रहेगा जब तक एक ब्राह्मण अपनी बेटी किसी दूसरे वर्ग को न दे।”यह बयान न केवल जाति के नाम पर समाज को बांटने वाला था, बल्कि महिलाओं की गरिमा का घोर अपमान था। महिलाओं के सम्मान को व्यापार बना देना, उन्हें दहेज या सौदे में बदल देना — यह मानसिकता कितनी विकृत है!एDक उच्चाधिकारी, जिसकी जिम्मेदारी संविधान की रक्षा करना है, वह संविधान की आत्मा — समानता और सम्मान — को ही लांघ जाता है। यह केवल बयान नहीं था, यह सभ्य समाज के खिलाफ अपराध था।
अब सवाल यह नहीं कि दोषी कौन, सवाल है कि दोषी बचेंगे या नहीं?आज सड़कें गरम हैं, प्रदर्शन हो रहे हैं, जनता गुस्से में है। अफसर और जज खुद कानून के शिकंजे में फँसे दिख रहे हैं। लेकिन क्या इससे न्याय मिलेगा? देश की जनता पूछ रही है:क्या केवल निलंबन पर्याप्त है?क्या फर्जी आदेश बनाना ‘जमानती खिलवाड़’ है?क्या न्यायालय की गरिमा का अपमान ‘धोखा’ नहीं?क्या जज और अधिकारी दोनों को गिरफ्तारी होनी चाहिए?क्या प्रमोशन वापस लेना चाहिए?इन सवालों से भागकर सरकार या अदालतें खुद अपने पवित्र दायित्व से भागेंगी।
कठोर कार्यवाही क्यों अनिवार्य है?यदि ऐसे अपराधी बच गए, तो तीन बड़ी हानियाँ होंगी:

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