सम्पादकीय
"बस्ती में गाँव की चौपाल में बैठा भ्रष्टाचार — गाँव का न्याय अब बोली पर, सच्चाई पर नहीं”
बस्ती जिले के गाँवों की चौपाल किसी समय लोक-न्याय की अकादमी हुआ करती थी। यहाँ न कोई स्टांप, न एफिडेविट—सिर्फ सच, तर्क और लोकसम्मति। बुजुर्गों का एक-एक शब्द संविधान की तरह माना जाता था।पर आज बस्ती की चौपालें अपनी आत्मा खो रही हैं।जहाँ कभी बुजुर्गों का न्याय था, वहाँ अब रसूखदारों का “प्रभाव” बैठता है।जहाँ कभी सत्य की प्रतिष्ठा थी, वहाँ अब “सम्पर्क + शक्ति = फैसला” का फार्मूला चल रहा है।गाँव की चौपड़ अब सत्ता-खेल का मैदान
सबसे दर्दनाक बात यह है कि गाँव की चौपड़ अब गांव के लोगों का केंद्र नहीं रही। यह कुछ चुनिंदा लोगों की निजी अदालत बन गई है—जो मनरेगा की सूची से लेकर आवास पात्रता तक, और पट्टा से लेकर सरकारी योजनाओं तक हर जगह अपनी पकड़ बनाए हुए हैं।
कई ग्राम पंचायतों में यह स्थिति इतनी बुरी है कि जिस गरीब की समस्या सुने जाने योग्य होती है, उसी गरीब को “बाद में आना”, “कल बतायेंगे”, “जिलाधिकारी से मिल लो” जैसा टका-सा जवाब मिलता है।गाँव में एक नई कहावत चल रही है—“चौपाल में सच नहीं चलता, पहचान चलती है।”बस्ती की पंचायतें क्यों हार रही हैं?
क्योंकि—ग्राम प्रधान की मनमानी बढ़ रही है।सचिव और रोजगार सेवक गांव से कट चुके हैं।गरीब की तरफ से बोलने वाला कोई नहीं बचा। शिकायतें ऊपर तक जाते-जाते ‘निस्तारित’ दिखा दी जाती हैं।सामाजिक लेखा-जोखा (Social Audit) सिर्फ कागज़ पर हो रहा है। यही कारण है कि बस्ती में चौपाल का स्तर गिर रहा है, और गाँवों के बीच अविश्वास बढ़ रहा है।भूमि विवाद—बस्ती की नई राजनीतिक प्रयोगशाला,एक समय बस्ती में खेत-मेढ़ का विवाद भी चौपाल पर सुलझ जाता था।
आज वही विवाद रसूखदारों की जेब भरने का जरिया है।जिस किसान का खेत है, उसे ही कई जगह अपने हक का सबूत देने के लिए बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।बस्ती में खेत सिर्फ फसल का नहीं, सत्ता का भी प्रतीक बन गया है।क्या यह हाल ऐसे ही रहेगा?नहीं, समाधान है—और वह सरल है, बस राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए:चौपाल में बैठकों की अनिवार्य रिकॉर्डिंग, निर्णयों को सूचना बोर्ड पर चिपकाने की व्यवस्था, पट्टा, मनरेगा, आवास—सभी चयन प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाना, युवाओं की निगरानी समिति: “बस्ती नव-चौपाल मॉडल”
अधिकारियों के औचक निरीक्षण—सिर्फ फोटो नहीं, कार्रवाई चाहिए
कौटिल्य का भारत का स्पष्ट मत“यदि बस्ती की चौपाल पुनः निष्पक्ष हो गई, तो पूर्वांचल का सामाजिक ढांचा फिर उठ खड़ा होगा।जिस दिन चौपाल मजबूत होगी, उसी दिन भ्रष्टाचार कमजोर पड़ेगा।”बस्ती की चौपाल सिर्फ लकड़ी की बैठक नहीं है—यह जनता के अधिकारों की पहली पाठशाला है।इसे बचाना प्रशासन की ज़िम्मेदारी ही नहीं, समाज की प्रतिष्ठा भी है।यदि चौपाल चरित्रहीन हो गई, तो गाँव बिखर जाएँगे, और जब गाँव बिखरते हैं, तब राष्ट्र मजबूत नहीं रह पायेगा.

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