बिहार का वोटर: भारत का सर्वाधिक जागरूक मतदाता
दिनकर की भूमि और लोकतंत्र की चेतना
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जब कहते हैं—“जिसमें नहीं चेतना, उसे जीवित कहना व्यर्थ है,जागे हुए मनुष्य ही इतिहास बदलते हैं।”तो उनकी यह पंक्ति सीधे बिहार की जनता पर लागू होती है।बिहार का मतदाता केवल एक नागरिक नहीं,बल्कि लोकतंत्र का सबसे जागृत प्रहरी,सबसे प्रश्नाकुल दिमागऔर सबसे सूझबूझ वाला निर्णयकर्ता है।यहाँ जनता का वोट,भावना का विस्फोट नहीं,बल्कि विवेक का शस्त्र होता है।बिहार की राजनीतिक भूमिबार-बार यह सिद्ध कर चुकी है कियहाँ मतदाता नेता को नहीं,नेता को जनता को समझना पड़ता है।
जागरूकता का स्रोत : बिहार का ऐतिहासिक प्रशिक्षण:भारत में जहाँ लोकतांत्रिक चेतना धीरे-धीरे विकसित हुई,वहाँ बिहार की भूमि पर यह चेतना सदियों से परिष्कृत होती रही।यह वही भूभाग है जहाँ— जनक ने विमर्श की परम्परा को जन्म दिया, बुद्ध ने प्रश्न पूछने के अधिकार को धर्म का केंद्र बनाया, चाणक्य ने राजनीति को तीक्ष्ण बुद्धि का विज्ञान बनाया,और दिनकर ने अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध को जीवन का अनिवार्य नियम बताया।इसीलिए बिहार के मतदाता के भीतर राजनीतिक इतिहास एक अंतर्जात शक्ति की तरह चलता है।वह नेता के चेहरे नहीं,उसके चरित्र, इतिहास और रणनीति को पढ़ता है।यह ज्ञान किसी चुनावी पोस्टर से नहीं आता,यह पीढ़ियों की राजनीतिक अनुभूति से जन्मता है।अनुभव की आग में पका हुआ समाज,दिनकर कहते हैं—
“पीड़ा में तपकर जिसने खुद को गढ़ा,
वही दूसरों का भाग्य गढ़ने योग्य होता है।”
बिहार का समाज—बेरोज़गारी, पलायन, बुनियादी पिछड़ेपन,
और राजनीतिक अस्थिरताओं का दशकों से सामना करता हुआ—
एक ऐसी जनता बन चुका हैजो जीवन से राजनीति सीखता है,
न कि नारों से।दूसरे प्रदेशों में मतदाता पाँच साल में एक बार मुद्दे समझते हैं,पर यहाँ—हर परिवार के पास तीन-तीन पीढ़ियों का राजनीतिक स्मृति–कोष है।किस नेता ने क्या वादा किया?कितनों ने पूरा किया?कौन चुनाव से पहले बदल गया? किसके शासन में क्या बदला और क्या नहीं बदला?बिहार का voter यह सब इसलिए याद रखता है क्योंकि उसने कई असफलताओं को प्रत्यक्ष झेला हैऔर वह असफलता को पुनः स्वीकार करने में संकोच करता है।यही वह अनुभवजन्य बुद्धि जो है, उसे देश का सर्वाधिक जागरूक मतदाता बनाती है। यहाँ चुनाव भावनाओं पर नहीं, प्रश्नों पर चलते हैं,भारत के कई राज्यों में,भावना, जातीय रोमांच, क्षेत्रीय गर्व,या नेता का व्यक्तित्व ही चुनावी वातावरण बना देता है।
लेकिन बिहार में चुनाव सवालों का उत्सव होता है।भीड़ केवल सुनने नहीं आती।भीड़ नेता की बातचीत को तौलने आती है।यहाँ की जनता की आँखें कहती हैं—
“कहो नेता, हम सुन रहे हैं…
पर हम केवल ताली नहीं बजाएँगे,
हम तुम्हारे कहे को परखेंगे।”
और यही कारण है कि—बिहार में लोकप्रियता का मतलब यह नहीं किवोट पक्का है।यहाँ भीड़ और वोट अलग-अलग होते हैं।
भीड़ सुनती है, भीड़ वोट सोचकर दिया जाता है।यह लोकतंत्र के लिए सबसे परिपक्व व्यवहार है।बिहार का मतदाता चुनाव को भावनाओं का युद्ध नहीं, तर्क का युद्ध मानता है,दिनकर की एक तेजस्वी पंक्ति है—
“बुद्धि की कसौटी पर जब मन को तौलो,
तभी निर्णय धर्मयुक्त होता है।”
बिहार का वोटर इसी कसौटी पर चलता है।वह यह नहीं पूछता कि नेता कितना बोलता है,वह यह पूछता है—जो कहा, क्या वह संभव है? जो वादा किया, क्या वह इतिहास से मेल खाता है?जो घोषणा की, उसका स्रोत और उद्देश्य क्या है?जो आज कह रहा है, कल भी वही कहेगा या नहीं? की यह क्षमता,राजनीतिक भ्रम को बहुत जल्दी भेद देती है।यही कारण है कि बिहार में नेता तीन भाषण देने से लोकप्रिय हो जाए,यह संभव नहीं।जनता उसकी वाणी और कर्म के बीच की दूरी एक ही क्षण में पहचान लेती है।
.जाति-समीकरणों के बावजूद विवेक की प्रधानता
यह सत्य है कि बिहार की राजनीति
जातिगत ध्रुवीकरण से कभी मुक्त नहीं हुई,
पर उतना ही सत्य यह भी है कि—
बिहार का मतदाता जाति से वोट करता है,
पर विवेक से निर्णय लेता है।
यदि केवल जाति निर्णायक होती,
तो हर चुनाव का परिणाम स्थायी होता।
जनादेश बार-बार बदलता नहीं।
पर बिहार ने कई बार दिखाया है कि—
जब मुद्दे गंभीर हों,
जब प्रशासन की नाकामी या भ्रष्टाचार बढ़े,
जब नेतृत्व अविश्वसनीय लगे,
तो जनता जातीय रेखाएँ पार कर देती है।
यह वह परिपक्वता है
जो देश के अन्य प्रदेशों में धीरे-धीरे उभर रही है,
पर बिहार में यह दशकों से मौजूद है।
नेताओं की परीक्षा और जनता का गणित:बिहार के voter के सामनेनेता भी एक सामान्य नागरिक ही होता है।यहाँ के मतदाता नेता को ऊँचे pedestal पर नहीं रखते।वे जानते हैं कि—
“सत्ता मनुष्य को बड़ा नहीं बनाती,
कार्य उसे बड़ा बनाते हैं।”
इसीलिए चुनाव से पहले बिहार की जनता नेता के— पिछले बयान,पुराने सहयोगी, पुराने गठबंधन, उनके टूटने–बनने का इतिहास, और विकास के रिकॉर्ड सबको एक मानसिक तख्ती पर लिखकर रखती है।और फिर नेता तय होता है।यहाँ लहर नहीं चलती,
यहाँ विचार चलता है।यहाँ करिश्मा नहीं चलता,यहाँ कर्म का तौल चलता है।
लोकतंत्र का सबसे बड़ा विद्यार्थी : बिहार का मतदाता
दिनकर कहते हैं—
“चेतना से बड़ा कोई दीप नहीं।”
और बिहार का मतदाता
इसी चेतना का दीपक है।
यह मतदाता—सत्ता के प्रचार से नहीं डोलता,जाति के भावनात्मक बोझ में नहीं बहता,और न ही वादों के शोर में अपने विवेक को खोता है।वह लोकतंत्र का अनुशासित विद्यार्थी है,जो हर चुनाव में नए अध्याय पढ़ता है,पुराने अध्यायों की तुलना करता है,और फिर निर्णय देता है।और यही कारण है किभारत में राजनीतिक चेतना की जो गहराई बिहार में मिलती है,वह अन्यत्र दुर्लभ है।बिहार भारत का वह आईना है जहाँ लोकतंत्र अपनी सर्वाधिक परिपक्व छवि देखता है।
बिहार का मतदाता लोकतंत्र की रीढ़ है
राजनीति शोर मचा सकती है,नेता मंचों पर आँधी दिखा सकते हैं,
पर चुनाव का अंतिम निर्णायक बिहार का जागृत मतदाता ही होता है।वह चुप रहता है,पर उसके भीतर का विवेक गूंजता है।वह भावनाओं से नहीं,अनुभवों से निर्णय करता है।इस इसलिए—
बिहार का मतदाता देश के सभी मतदाताओं में
सबसे अधिक जागरूक,
सबसे अधिक प्रश्नाकुल,
और सबसे अधिक राष्ट्र–चेतन मतदाता है।
दिनकर की ही वाणी में—
“जो झुकता नहीं अन्याय के आगे,
वही इतिहास का निर्माता होता है।”
बिहार का मतदाता ही इतिहास–निर्माण करने वाली चेतना है.
उसी महान बिहारी दाता ने जातिवाद, परिवार वाद or जंगलराज के साथ अहंकार को तिस्कृत कर राष्ट्रवादी जनादेश दिया है 🙏

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