दशम श्रृंखला
कांग्रेस अधिवेशनों में वन्देमातरम
भारतीय राष्ट्रवाद का इतिहास यदि किसी एक भाव-उद्गार से सबसे अधिक ऊर्जा, प्रेरणा और सांस्कृतिक चेतना प्राप्त करता है, तो वह निःसंदेह “वन्देमातरम्” है। यह केवल एक गीत नहीं था; यह भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का प्राण मंत्र था, वह ध्वनि थी जो गुलामी की जंजीरों के बीच भी स्वतंत्रता का मार्ग रोशन करती थी। जिस समय राष्ट्र में राजनीतिक नेतृत्व आकार ले रहा था, जनता असंगठित थी, और औपनिवेशिक सत्ता असमाधानी स्वर को भी अपराध मानती थी—ऐसे समय में कांग्रेस के अधिवेशनों ने राष्ट्रीय चेतना का मंच प्रदान किया। यही वे क्षण थे जब वन्देमातरम् का मंत्र गूंजता था और पूरा सभामंडप राष्ट्रमाता के चरणों में समर्पित दिखाई देता था।दसवीं श्रृंखला का यह अध्याय इसी अदृश्य लेकिन अत्यंत गहन शक्ति का विस्तृत विश्लेषण है—कांग्रेस अधिवेशनों में वन्देमातरम् की भूमिका, उसके राजनीतिक, सांस्कृतिक व दार्शनिक आयाम तथा स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी प्रभावशाली उपस्थिति।
कांग्रेस और राष्ट्रवाद की प्रारंभिक भूमिका,1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का उदय एक राजनीतिक आवश्यकता भर नहीं था; वह भारतीय जनता में नवजागरण का प्रतीक भी थी। ब्रिटिश शासन के दमन और मनोवैज्ञानिक गुलामी के बीच कांग्रेस वह स्थान था जहां भारतीय पहली बार एक राष्ट्र के रूप में स्वयं को महसूस करने लगे।1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के ‘आनंदमठ’ में प्रकाशित वन्देमातरम् का साहित्यिक अस्तित्व तो पहले से था, परंतु उसका राजनीतिक रूप से सक्रिय होना कांग्रेस की बैठकों और अधिवेशनों के माध्यम से ही संभव हुआ।कांग्रेस अधिवेशनों में यह गीत धीरे-धीरे राष्ट्रीय एकता का सांस्कृतिक प्रतीक बनता गया। विषय चाहे स्वदेशी हो, बहिष्कार हो, संविधान सुधार हो या प्रशासनिक मांग—हर अधिवेशन का आरंभ और अंत “वन्देमातरम्” की ऊर्जा से ही होता था।
. 1896 का कलकत्ता अधिवेशन — ऐतिहासिक शुरुआत,भारतीय राजनीति के इतिहास का एक अविस्मरणीय क्षण वर्ष 1896 में कलकत्ता अधिवेशन में आया। इस अधिवेशन की अध्यक्षता भारतीय राष्ट्रवाद के पहले प्रमुख नेताओं में से एक रहमानिचंद्र दत्त ने की। उद्घाटन के समय जब “वन्देमातरम्” का गान किया गया, तो पूरा पंडाल राष्ट्रभक्ति से भर गया।ध्यातव्य है कि यह वह समय था जब इस गीत को औपचारिक रूप से किसी भी राजनीतिक दायरे में “प्रतिरोध” की भाषा नहीं माना गया था। परंतु उसका आत्मिक प्रभाव इतना प्रबल था कि नेताओं ने इसे कांग्रेस की पहचान बना दिया।यहां से शुरू हुई परंपरा ने आने वाले 50 वर्षों तक राष्ट्रवादी चेतना को दिशा दी।
बाल गंगाधर तिलक और वन्देमातरम् की क्रांतिकारी ध्वनि,तिलक के नेतृत्व में वन्देमातरम् केवल गीत नहीं, बल्कि स्वराज्य का घोष बन गया। उनके भाषणों में बार-बार यह उद्घोष उभरता था—“वन्देमातरम् केवल एक नारा नहीं; यह भारतीय आत्मा की पुकार है।”1905 में बंग-भंग के विरोध के दौरान तिलक ने वन्देमातरम् को भारत की सामूहिक चेतना का प्रतीक बताया। कांग्रेस के अधिवेशनों में जब-जब तिलक बोलते, जनता पूरे जोर से वन्देमातरम् के स्वर में शामिल होती।वह समय ऐसा था जब हर भारतीय नवजागरण की लहर से अभिभूत था। कांग्रेस के मंच से उठती यह ध्वनि तत्काल पूरे देश में फैलती और जनमानस में चिंगारी बनकर सुलग जाती।
बंग-भंग और 1905–1911 तक कांग्रेस अधिवेशनों में वन्देमातरम् का शिखर-काल,1905 में बंगाल का विभाजन हुआ और ब्रिटिश साम्राज्य ने भारतीय भावनाओं को तोड़ने का दुस्साहस किया। परंतु परिणाम उलटा हुआ—बंगाल की जनता विद्रोह के लिए उठ खड़ी हुई और इस आंदोलन का मुख्य घोष ‘वन्देमातरम्’ बना।कांग्रेस के 1905 से 1911 के बीच के हर अधिवेशन में वन्देमातरम् पहले से अत्यधिक शक्ति के साथ गाया गया।1906 के कलकत्ता अधिवेशन में अरविंद घोष ने अपने प्रसिद्ध भाषण में वन्देमातरम् को “भारत की आध्यात्मिक प्रेरणा” कहा।1907 के सूरत अधिवेशन में उग्रवादी–मध्यमवादी विवाद के बीच भी वन्देमातरम् ने राष्ट्रवाद की एकता बनाए रखी।1911 में विभाजन-निरस्ती के बाद कांग्रेस अधिवेशनों में यह गीत विजय-ध्वनि के रूप में गाया गया।इन अधिवेशनों में वन्देमातरम् ने भारतीय जनता को समझाया कि राष्ट्र मात्र भौगोलिक परिमाण नहीं, बल्कि मातृभूमि का सजीव, आध्यात्मिक, भावनात्मक रूप है।
ब्रिटिश शासन का भय—वन्देमातरम् पर प्रतिबंध का प्रयास,ब्रिटिश सरकार वन्देमातरम् से भयभीत थी। कारण स्पष्ट था—यह गीत केवल उत्तेजना पैदा नहीं करता था, यह मानसिक स्वतंत्रता पैदा करता था। मानसिक रूप से स्वतंत्र नागरिकों को गुलाम बनाकर रखना आसान नहीं होता।1907 से ब्रिटिश सरकार ने इस गीत को सार्वजनिक सभाओं में गाने पर कठोर निगरानी लगाना शुरू किया। कई स्थानों पर इसे “उपद्रवी घोषणा” माना गया। विद्यालयों और सभाओं में इसे रोकने के प्रयास हुए।परंतु कांग्रेस के अधिवेशनों में इस गीत को रोकना असंभव था। वहां यह पहले से अधिक जोर और सम्मान के साथ गूंजता था।प्रतिबंध जितना बढ़ता, गीत की शक्ति उतनी ही बढ़ती गई। यह औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध “आत्मिक प्रतिरोध का मंत्र” बन चुका था।
गांधी युग और वन्देमातरम्,महात्मा गांधी ने वन्देमातरम् को राष्ट्र की आध्यात्मिक चेतना का सर्वोच्च गीत कहा। यद्यपि उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता के दृष्टिकोण से गीत के कुछ धार्मिक प्रतीकों पर चर्चा की, परन्तु वे इसके राष्ट्रवादी मूल्य के अत्यंत सम्मानित समर्थक रहे।1920 के नागपुर अधिवेशन में गांधी की उपस्थिति में “वन्देमातरम्” और “रघुपति राघव राजाराम” दोनों गीत राष्ट्रीय भावधारा के दो स्तंभ के रूप में प्रस्तुत किए गए।गांधी के युग में भी यह गीत हर कांग्रेस अधिवेशन का अनिवार्य भाग रहा। चाहे खिलाफत आंदोलन हो, असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह या भारत छोड़ो आंदोलन—कांग्रेस के मंच पर जनता की पहली पुकार वन्देमातरम् ही होती थी।
जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस के आधुनिक अधिवेशन,नेहरू ने वन्देमातरम् को भारत की सांस्कृतिक आत्मा कहा। उनकी दृष्टि में यह गीत किसी भी संकीर्ण पहचान से परे था—“यह हमारी धरती का अभिनंदन है; यह राष्ट्र की कविता है।”कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन (1929) में, जिसमें पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित हुआ, मध्यरात्रि में जब नेहरू ने तिरंगा फहराया, तो हजारों लोगों ने एक स्वर में वन्देमातरम् गाया। यह क्षण भारतीय इतिहास में अमर हो चुका है।कांग्रेस का हर आधुनिक अधिवेशन — चाहे वह कराची हो, रामगढ़ हो या त्रिपुरी — वन्देमातरम् की ध्वनि से ही प्रारंभ होता था।पर जवाहर लाल अंदर से वन्देमातरम स्वीकारने की नियति नहीं रखते थे.
स्वतंत्रता दिवस के पूर्व—कांग्रेस का अंतिम अधिवेशन और वन्देमातरम्,1946–47 के काल में कांग्रेस अधिवेशनों में वन्देमातरम् की ध्वनि पहले से कहीं अधिक भावुक हो गई थी। यह वह समय था जब राष्ट्र आज़ादी की दहलीज पर खड़ा था, और हर अधिवेशन जनता की आशाओं और बलिदानों से भरा होता था।1947 के आस-पास हुए कांग्रेस के अधिवेशन में जब वन्देमातरम् गाया गया, तो पंडाल में उपस्थित कई वरिष्ठ नेता भावुक हो उठे। यातना, जेल, संघर्ष और शहादत—सब कुछ आंखों के सामने तैर गया।वन्देमातरम् अब केवल संघर्ष का घोष नहीं रहा, बल्कि स्वतंत्र भारत की नींव का संस्कार बन चुका था। संवैधानिक मान्यता — वन्देमातरम् का गौरव,स्वतंत्रता के बाद संविधान सभा में लम्बी चर्चा के बाद 24 जनवरी 1950 को “वन्देमातरम्” को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया।संविधान सभा के सदस्यों ने बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय को भारत का महानतम राष्ट्रकवि माना और यह स्वीकार किया कि वन्देमातरम् ने भारत को स्वाधीनता दिलाने में अतुलनीय भूमिका निभाई।यह निर्णय कांग्रेस अधिवेशनों में सौ वर्षों तक गाये गये वन्देमातरम् की ऐतिहासिक विरासत का सम्मान था।
कांग्रेस अधिवेशन और वन्देमातरम् का अविच्छिन्न संबंध,कांग्रेस के अधिवेशनों में वन्देमातरम् केवल एक गीत के रूप में नहीं था—यह राष्ट्रीय चेतना का संस्कार,राजनीतिक संघर्ष का मंत्र,सांस्कृतिक गौरव का परिचायक,और मानसिक स्वतंत्रता का उद्घोष था।कांग्रेस का हर अधिवेशन वन्देमातरम् के बिना अधूरा था।अपने जन्म से लेकर स्वतंत्रता तक यह गीत राष्ट्रवाद का अंग, कांग्रेस का प्रेरक-स्रोत और जनता की आत्मा बना रहा। वन्देमातरम् ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन को न केवल ऊर्जा दी, बल्कि भारत को एक राष्ट्र के रूप में आत्मबोध भी कराया।इसलिए, यह कहना उचित होगा कि—
“कांग्रेस के अधिवेशनों में वन्देमातरम् भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का गान नहीं, उसकी आत्मा था। भारतीय राष्ट्रवाद के हृदय में बसा हुआ अनन्त गीत. यह एकदम सत्य है कि कांग्रेस में एक बड़ा धडा था जो नहीं चाहता था कि वंदे मातरम को राष्ट्र की आत्मा घोषित किया जाए पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वयं जिन्ना के दबाव में रहते थे और उनकी नीति और नियत दोनों वंदे मातरम के खिलाफ थी.

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