वन्देमातरम् और मुस्लिम समाज : ऐतिहासिक प्रभाव
श्रृंखला की नौवीं कड़ी
राजेंद्र नाथ तिवारी
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वन्देमातरम् केवल एक गीत भर नहीं था, बल्कि यह राष्ट्र की सामूहिक चेतना, आत्मसम्मान, संघर्ष-शक्ति और त्याग का महागान बन कर उभरा। बंगाल विभाजन (1905) से लेकर असहयोग, खिलाफ़त, स्वदेशी, सत्याग्रह और क्रांतिकारी आंदोलनों तक – वन्देमातरम् ने लाखों भारतीयों को निर्भीक, संगठित और आत्मबल से भरा।परंतु इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय यह भी है कि मुस्लिम समाज ने इस राष्ट्रीय पुकार को किस रूप में सुना, समझा और उससे कैसे जुड़ा। यह कड़ी इसी संवेदनशील, तथ्यपूर्ण और संतुलित विमर्श का विश्लेषण प्रस्तुत करती है।संगत है कि हम इस श्रृंखला का आरंभ एक उपयुक्त उद्धरण से करें—उद्धरण“न हि ज्ञानेन सदृशं, पवित्रमिह विद्यते।”— भगवद्गीता 4/38(ज्ञान से बढ़कर इस संसार में और कुछ पवित्र नहीं।)इसी ज्ञानपूर्ण दृष्टि से इतिहास को देखना आवश्यक है, ताकि किसी भी प्रकार का भ्रम, पूर्वाग्रह या मिथ्या-वर्णन सत्य के आगे टिक न सके। वन्देमातरम् का मूल स्वर और मुस्लिम समाज
वन्देमातरम्—बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की आनंदमठ से निकला—मूलतः राष्ट्रमाता भारत को प्रणाम था। यह किसी देवी-देवता का धार्मिक स्तवन नहीं, बल्कि भूमि-पूजन की काव्यमय अभिव्यक्ति थी।किन्तु बीसवीं सदी की शुरुआत में मुस्लिम समाज का एक वर्ग इस गीत में प्रयुक्त "माता" और "वंदना" को धार्मिक अर्थों में देख बैठा। यह वही समय था जब ब्रिटिश नीति Divide and Rule अपने निर्णायक रूप में थी और मुस्लिम जनता में भय, असुरक्षा और राजनीतिक अलगाव की भावना को उभारा जा रहा था।लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि—मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग वन्देमातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में wholehearted समर्थन देता रहा।स्वदेशी आंदोलन में हजारों मुसलमानों ने "वन्देमातरम्" के नारे के साथ विदेशी वस्त्र त्यागे, जात-पांत से ऊपर उठकर आंदोलन में भाग लिया, और ब्रिटिश उत्पीड़न सहा। 1905–1910 : बंगाल विभाजन और मुस्लिम बुद्धिजीवियों की भूमिका
बंगाल विभाजन के बाद जब वन्देमातरम् राष्ट्रीय उद्घोष बना, उस समय कोलकाता, ढाका, चटगाँव, मुर्शिदाबाद आदि स्थानों में—मुस्लिम व्यापारियों ने स्वदेशी वस्तुओं की दुकानों को आर्थिक सहयोग दिया,मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने आंदोलन के लिए लेखन किया,मुस्लिम युवा वन्देमातरम् के गीत पर प्रेरणासिक्त सभाओं में भाग लेते रहे।ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि—
“1906 के ढाका स्वदेशी सम्मेलन में मुस्लिम विद्यार्थियों का वन्देमातरम् गाते हुए जुलूस सबसे लोकप्रिय माना गया।”यह तथ्य ब्रिटिश रिकॉर्ड में भी स्पष्ट रूप से दर्ज है.
वन्देमातरम् पर राजनीतिक विवाद : वास्तविक कारण क्या थे?
विवाद गीत से अधिक राजनीति से जुड़ा था।ब्रिटिश शासन समझ चुका था कि वन्देमातरम् राष्ट्र की आत्मा बन चुका है। इसलिए उन्होंने मुस्लिम नेतृत्व के एक हिस्से को यह समझाने की कोशिश की कि—यह हिंदू प्रतीक है,यह मुसलमानों को अलग कर देगा,इससे इस्लाम को खतरा है।जबकि वास्तविकता यह थी—
वन्देमातरम् भूमि-पूजन है, धर्म से इसका कोई विरोध नहीं।
इसीलिए मुसलमान क्रांतिकारियों जैसे,अशफाकउल्ला खान, अमीर चाँद, बरकतुल्ला भोपाली, उबैदुल्लाह सिंधीने इसे पूर्ण सम्मान दिया।वन्देमातरम् और मुस्लिम क्रांतिकारी,अशफाकउल्ला खान – सर्वोच्च उदाहरण,काकोरी कांड के महान क्रांतिकारी अशफाकउल्ला खान वन्देमातरम् को भारत की आवाज मानते थे। जब काकोरी षड्यंत्र केस में अदालत में उन्हें फांसी सुनाई गई, तब उन्होंने यही कहा—“मेरे लिए मातृभूमि की सेवा ही सर्वोच्च इबादत है।”काकोरी केस की सुनवाई के दौरान अदालत के बाहर,“वन्देमातरम्, अशफाकउल्ला अमर रहें”के नारे गूंजते थे और वे मुस्कराते हुए उन नारों को सुनते थे।मौलाना बरकतुल्ला भोपाली,हिन्दुस्तान गदर पार्टी के प्रथम राष्ट्रपति मौलाना बरकतुल्ला भोपाली ने 1916 में जापान में दिए भाषण में कहा—“भारत मेरी माता है। ‘वन्देमातरम्’ में मुझे वह जोश दिखता है जो किसी भी इन्सान को गुलामी से लड़ने के लिए पर्याप्त है।”
खिलाफत आंदोलन और वन्देमातरम् का समन्वय,खिलाफत और असहयोग (1920–22) आंदोलन में वन्देमातरम् का स्वर मुस्लिम समाज की विशाल भागीदारी के साथ गुंजा।महात्मा गांधी जैसे नेताओं ने इसे सभी धर्मों का समान राष्ट्रगान कहा।कई खिलाफत सभाओं में,अल्लाह-ओ-अकबर” और “वन्देमातरम्”के नारे समान रूप से लगाए जाते थे।इस ऐतिहासिक समन्वय का उल्लेख मौलाना आज़ाद ने स्वयं किया है।
लीग राजनीति बनाम वास्तविक मुस्लिम जनमत
यह महत्वपूर्ण है कि मुस्लिम लीग द्वारा खड़ा किया गया विरोध पूरे मुस्लिम समाज का मत नहीं था।लीग की राजनीति पृथकतावाद पर आधारित थी,वन्देमातरम् को लेकर उनका विरोध भी उसी अलगाव को मजबूत करने का प्रयास था,जबकि किसान, मज़दूर, विद्यार्थी, उलेमा—मुस्लिम समाज का बहुसंख्यक वर्ग—वन्देमातरम् के माध्यम से राष्ट्रीयता के साथ खड़ा था।
मौलाना आज़ाद का वक्तव्य
“वन्देमातरम् में केवल देशप्रेम है, इसमें किसी धर्म विशेष की बाध्यता नहीं।”उनका यह संदेश 1923 के कांग्रेस अधिवेशन में दिया गया।
7. 1937–1947 : राजनीतिक वातावरण और गलतफहमियां
1930 के दशक में लीग नेतृत्व ने वन्देमातरम् को हिंदू राष्ट्रवाद का प्रतीक बताकर मुस्लिम समाज को भ्रमित किया, जबकि सत्य यह था—गीत की पहली दो पंक्तियाँ पूर्णतः राष्ट्रवादी हैं,धार्मिक प्रतीकवाद गीत के अंतिम छंदों में है, जो कभी राष्ट्रीय गीत का भाग नहीं बने,कांग्रेस कार्यसमिति ने स्पष्ट कहा था कि केवल पहली दो पंक्तियाँ ही स्वीकृत हैं।लेकिन ब्रिटिश-लीग गठजोड़ ने इस सूचना को जनता तक पहुँचने ही नहीं दिया।
स्वतंत्रता के बाद मुस्लिम समाज का योगदान
स्वतंत्रता पश्चात मुस्लिम समाज का बड़ा हिस्सा वन्देमातरम् को भारत की राष्ट्रीय विरासत के रूप में मान्यता देता रहा—1950 में संविधान सभा में जब इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला,उस समय मौलाना हफीज़ुर्रहमान जैसे मुस्लिम सदस्य इसके समर्थन में बोले।1990 के दशक तक अनेक मुस्लिम कवियों, संगीतकारों और बुद्धिजीवियों नेवन्देमातरम् के और भी सरस संस्करण बनाए।2008 में ए.आर. रहमान ने वन्देमातरम् की एक विश्व-प्रसिद्ध रचना प्रस्तुत की,जिसे मुस्लिम समाज ने भी समान उत्साह से अपनाया। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बनाम धार्मिक राष्ट्रवाद : भ्रम की मूल जड़,वन्देमातरम् सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की उपज है, न कि धार्मिक राष्ट्रवाद की।भारत में “मातृभूमि” की अवधारणा,वेदों में,तमिल साहित्य में,सूफी काव्य में,कबीर-नानक की वाणी में,समान रूप से पाई जाती है।सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के शब्द—“हिन्दुस्तां हमारी जान है”—मातृभूमि-पूजन की इसी भावना का विस्तार हैं।1
मुस्लिम समाज की तीन धाराएँ : इतिहास का संतुलित आकलन,
राष्ट्रवादी मुस्लिम – विशाल बहुमत,जिन्होंने वन्देमातरम् को स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा माना।
लीग समर्थक मुस्लिम – राजनीतिक वर्ग,जिन्होंने ब्रिटिश प्रोत्साहन से इसे धार्मिक रूप में प्रस्तुत किया।आधुनिक मुस्लिम बुद्धिजीवी.जो गीत का आध्यात्मिक-सांस्कृतिक अर्थ समझते हैं और इसे राष्ट्र की धरोहर मानते हैं।
वन्देमातरम् : संघर्ष, त्याग और समान राष्ट्रीय पहचान,भारत की राष्ट्रीय पहचान किसी एक धर्म, भाषा या नस्ल पर नहीं बनी।वन्देमातरम्—एक सामूहिक लड़ाई का पुल था—हिंदू-मुसलमान साथ-साथ, गए,जुलूसों में साथ नारे लगाए,जेलों में साथ यातनाएँ झेलीं,शहीदों की कतार में नाम साथ-साथ लिखे गए।अशफाक-रामप्रसाद जैसे युगल संरचना इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं।
वन्देमातरम् का सार्वभौमिक संदेश,आज आवश्यकता है कि वन्देमातरम् को धर्म नहीं, राष्ट्र के संदर्भ में समझा जाए।इसकी शक्ति विभाजन नहीं, जोड़ने में है।यह गीत बताता है कि—भारत की मिट्टी हमारी माता है,यह माता सभी की समान है,इसके प्रति प्रेम किसी धर्म की सीमा में नहीं बंधा,और राष्ट्रभक्ति की आवाज़ वन्देमातरम् से अधिक व्यापक, उदार और प्रेरक शायद ही कोई हो।
वन्देमातरम् केवल हिंदू का नहीं,वन्देमातरम् केवल मुसलमान का नहीं,वन्देमातरम् पूरे भारत का है.
क्रमशः श्रृंखला दशम प्रसून l

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