दुनियाँ के सभी धर्म अपनी और अपनों की सोचते, हिंदुत्व अखिल ब्रह्माण्ड और सम्पूर्ण मानवता का.
“हिन्दू नहीं तो दुनियां नहीं”
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भगवत का बयान कि " बिना हिंदुत्व के दुनिया के कल्पना ही नहीं की जा सकती", यह विचार उस समय आया है जब, आज पूरा विश्व परस्पर मार काट और विश्वास पर उतरा हुआ है ऐसे में विचार यह वाक्य क्यों उभरा? इसलिए कि दुनिया की प्रत्येक समस्या का समाधान केवल भारत अर्थात हिंदुत्व के ही पास है. क्योंकि हिंदुत्व कोई जाति नहीं अपितु जीवन दर्शन है, जो पूरे विश्व को अपना परिवार मानता है और पूरे विश्व को भाई-बहन. हिंदुत्व सम्पूर्ण थकी हारी मानवता की छाँव है. "वसुधेव कुटुंबकम".
श्री मोहन भागवत की चिंतन-धारा में “हिन्दू” शब्द धर्म या पूजा-पद्धति से बड़ा है।
यह शब्द सभ्यता, संस्कृति, मानव-मूल्यों, आचारधर्म, समत्व, और विश्व-कल्याण के बहुस्तरीय अर्थ में प्रयुक्त होता है।उनके अनुसार—
“हिन्दू” = वह चेतना जो मानवता के अस्तित्व को संतुलित रखती है।
अतः “हिन्दू नहीं तो दुनिया नहीं” वाक्य किसी धार्मिक विचार नहीं का, मानवता की रक्षा का एकमात्र veshvik उद्घोष है, दुनिया भी अपनी आशान्वित दृष्टि भारत पर ही टिकाये है. धर्मिक उन्माद, धार्मिक उन्माद, आतंकवाद, समानता, संकिर्णता हिंदुत्व का स्वभाव नहीं.
बल्कि वैश्विक सांस्कृतिक संतुलन का संकेत है.
मोहन भागवत की दृष्टि : हिंदू कोई विकल्प नहीं, एक व्यवस्था है
भागवत का तर्क यह नहीं कि—
“केवल हिन्दू बचेगा तो दुनिया बचेगी,”
बल्कि यह कि—हिन्दू–चिंतन = विश्व के लिए आवश्यक सात आधारभूत मूल्यसर्वं खल्विदं ब्रह्म — समस्त जगत एक है,वसुधैव कुटुम्बकम — पृथ्वी परिवार है,अहिंसा–सत्य–संयम — शक्ति और नीति का संतुलन,कर्मयोग — कर्त,व्य का सार्वभौमिक सिद्धान्त, योग:कर्मषु कौशलम,प्रकृति-पूजन — पर्यावरण-सुरक्षा का प्राचीन मॉडल,विविधता में एकता — समानता नहीं, समरसताधर्म वही जो सबके हित में हो — सार्वभौमिक नैतिकता.भागवत का कथन है—यदि मानव समाज इनमें से किसी भी तत्त्व को त्याग देगा,तो पृथ्वी पर जीवन असंतुलित हो जाएगा। आधुनिक वैश्विक सन्दर्भ में यह कथन क्यों सार्थक?
पाश्चात्य मॉडल—भोगवाद, उपभोक्तावाद, युद्ध-मानस,पृथ्वी के संसाधन सीमित हैं,पश्चिमी सभ्यता का आधार लालसा है,इससे युद्ध, जलवायु-विनाश और मानसिक-संकट अनिवार्य हैं,भागवत इसे “अधर्म-जनित अव्यवस्था” कहते हैं।
अब्राहमिक मॉडल—एकेश्वरवाद, लेकिन विविधता का अस्वीकार,एक ही सत्य, एक ही मार्ग का दावा,टकराव, धार्मिक युद्धों का इतिहास,सांस्कृतिक विविधता को खतरा,भागवत इसको “संस्कृतिक संकुचन” मानते हैं।
हिंदू मॉडल—विविधता, संतुलन, समरसता
- सत्य एक, मार्ग अनेक
- प्रकृति-संगत जीवन
- आत्मसंयम + कर्तव्य
- शक्ति पर नियंत्रण
यही कारण है कि उनके अनुसार—
“हिन्दू विचार-व्यवस्था के बिना विश्व का नैतिक ढाँचा ढह जाएगा।”, क्या यह कथन आक्रामक है?नहीं — यह एक सभ्यतामूलक निष्कर्ष है**श्री मोहन भागवत का वाक्य शत्रु-निर्माण नहीं करता;वह यह कहता है कि—हिन्दू विचारधारा के मूल्य बिना,मानवता की दीर्घकालिक सुरक्षा असम्भव है।यह कथन “दूसरों के नाश” की नहीं,बल्कि “मानवता के बचाव” की घोषणा है।5. क्यो “हिन्दू नहीं तो दुनिया नहीं”?क्योंकि हिन्दू दर्शन सह-अस्तित्व को आधार बनाता है।क्योंकि हिन्दू मनुष्य को कर्तव्य–समाज–प्रकृति की त्रयी से जोड़ता है।क्योंकि हिन्दू चेतना विश्व-कल्याण का विमर्श है, न कि विजय-विस्तार का।क्योंकि हिन्दू दर्शन ही वह एकमात्र जीवित सभ्यता है जो,प्रकृति,संस्कृति,अध्यात्म,विज्ञान,समाज,को एक ही सूत्र में बाँधती है।इसीलिए मोहन भागवत का यह कथन,
उग्र या अतिवाद नहीं, सार्वभौमिक है।
“हिन्दू नहीं तो दुनिया नहीं”—
मानव सभ्यता के भविष्य की चेतावनी है.🙏🙏

अच्छी खबर रविन्द्र गौतम
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