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रविवार, 23 नवंबर 2025

राजनीति में नैतिकता का अभाव — अध्यात्म की वापसी ही समाधान

  राजनीति में नैतिकता का अभाव — अध्यात्म की वापसी ही समाधान


टीम कौटिल्य


ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

हे देव वन्दन! वैदिक मन्त्रों के अमृतधारा से अभिसिंचित होकर, हम इस विशाल ब्रह्माण्ड के सूक्ष्म तन्तु को स्पर्श करते हैं, जहाँ राजनीति न केवल शासन की कला है, अपितु धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चतुरुर्वर्ग का आधारभूत स्तम्भ। किन्तु समकालीन काल में, युगपुरुष की दृष्टि से दृष्टव्य है कि राजनीति का यह पवित्र क्षेत्र अतिक्रमण का शिकार हो गया है। नैतिकता का अभाव, जो कि सत्य, अहिंसा, दया और न्याय का मूलाधार है, अब एक प्रेत छाया मात्र रह गया है। यह  विचार, वैदिक ऋषियों की उदात्त दृष्टि और पुराणों की कथामय परम्परा से प्रेरित होकर, इस संकट का चित्रण करेगा तथा अध्यात्म की पुनरावृत्ति को एकमात्र समाधान के रूप में स्थापित करेगा। हे पाठक! इस यात्रा में हम ऋग्वेद की मन्त्रध्वनि से लेकर भगवत्पुराण की लीला-कथाओं तक विचरेंगे,  सत्य का दीप प्रज्वलित हो।

 समकालीन राजनीति का नैतिक पतन — एक वैदिक दृष्टि

वैदिक साहित्य में राजनीति को 'राजधर्म' कहा गया है, जो राजा को देवताओं का प्रतिनिधि बनाता है। ऋग्वेद (१०.१९१.४) में कहा गया है:"संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।"(सभी एकत्र होकर चलो, एक-दूसरे से संवाद करो, तुम्हारे मन एक हों।)

यह मन्त्र सामूहिकता और नैतिक एकता का आह्वान है। किन्तु समकालीन राजनीति में यह आदर्श एक स्वप्न मात्र हो गया है। आज की राजनीति, जो लोकतन्त्र के नाम पर चलेगी, वास्तव में सत्ता-लोलुपता का अखाड़ा बन चुकी है। भ्रष्टाचार के घोटाले, वोट-बैंक की राजनीति, जाति-धर्म के नाम पर विभाजन — ये सब नैतिकता के ह्रास के प्रमाण हैं। उदाहरणस्वरूप, विश्व के प्रमुख लोकतन्त्रों में, जैसे भारत, अमेरिका या यूरोपीय संघ, राजनीतिक नेताओं पर लगे आरोप — धनलिप्सा, सत्ता-हिंसा, और जनकल्याण की उपेक्षा — वैदिक 'धर्मसंकर' (नैतिक अवनति) का चित्रण करते हैं।

पुराणिक शैली में कल्पना कीजिए: कलियुग के प्रारम्भ में, विष्णु पुराण (४.२४) के अनुसार, राजा कालभैरव के रूप में प्रकट होते हैं, जो प्रजा को लूटते हैं, किन्तु प्रजा भ्रम में पड़ी रहती है। आज का राजनीतिज्ञ, सोशल मीडिया के मायाजाल में, वोटर को 'वशीकरण' करता है, जैसे पुराणों में राक्षस मायावी छल से देवताओं को मोहित करते हैं। नैतिकता का अभाव इतना गहन है कि 'अर्थशास्त्र' केआचार्य कौटिल्य भी शोकाकुल हो उठें। चाणक्य ने कहा था: "राजा हि प्रजानां पिता।" (राजा प्रजा का पिता होता है।) किन्तु आज पिता पुत्र को बेचता है, सत्ता के लोभ में।

इस पतन का मूल कारण है भौतिकवाद का प्रादुर्भाव। वेदों में 'अध्यात्म' को 'आत्मा का जागरण' कहा गया है, जो नैतिकता का स्रोत है। उपनिषदों (बृहदारण्यक १.४.१४) में याज्ञवल्क्य कहते हैं: "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।" (आत्मा को देखना, सुनना, चिन्तन करना और ध्यान करना चाहिए।) किन्तु आधुनिक राजनीति में यह आत्म-चिन्तन विलुप्त हो गया है। नेतागण 'जीडीपी' और 'विकास' के आंकड़ों में उलझे हैं, किन्तु 'सत्कर्म' की उपेक्षा करते हैं। परिणामस्वरूप, पर्यावरण विनाश, सामाजिक असमानता, और मानसिक संकट — ये सब नैतिक शून्यता के फल हैं।

 पुराणिक कथाओं से प्रेरणा — राजधर्म का आदर्श

पुराणों की कथा-शैली हमें जीवन्त चित्र प्रदान करती है, जहाँ नैतिक पतन के परिणामस्वरूप युगान्तर होते हैं। महाभारत की कथा लीजिए: कुरुक्षेत्र का युद्ध नैतिक अवनति का प्रतीक है। दुर्योधन का लोभ, द्रोणाचार्य का पक्षपात, और कर्ण का छल — ये सब राजनीतिक षड्यन्त्रों के समान हैं। भगवद्गीता (४.७-८) में श्रीकृष्ण कहते हैं:

"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।"(जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अवतार लेता हूँ।)समकालीन राजनीति में यह 'ग्लानि' प्रत्यक्ष है। उदाहरण के लिए, भारत में हाल के वर्षों में हुए चुनावी घोटाले, जैसे 'इलेक्टोरल बॉन्ड्स' विवाद, दुर्योधन के जुए के समान हैं — धन का छलपूर्ण उपयोग। विश्व स्तर पर, अमेरिकी 'कैपिटल हिल' दंगा (२०२१) या यूक्रेन-रूस संघर्ष, सत्ता-हिंसा के पुराणिक चित्र हैं, जैसे रावण का लंका-प्रकोप।

किन्तु पुराण हमें समाधान भी सुझाते हैं। रामायण में राम का वनवास और राज्याभिषेक नैतिक राजनीति का आदर्श है। राम कहते हैं (अयोध्याकाण्ड १०९.१७): "न हि राज्यं मम प्रियं प्रजानां हितमिच्छता।" (राज्य मेरे लिए प्रिय नहीं, प्रजा का हित ही मेरा उद्देश्य है।) आज के नेताओं को इस 'प्रजाहित' की स्मृति जागृत करनी चाहिए। विष्णु पुराण में प्रह्लाद की कथा नैतिक साहस का प्रतीक है — हिरण्यकशिपु के अधर्म के विरुद्ध अध्यात्मिक शक्ति। प्रह्लाद का भक्ति-मार्ग हमें सिखाता है कि राजनीति में नैतिकता की बहाली अध्यात्म से ही सम्भव है।

अध्यात्म की अनुपस्थिति में राजनीति 'अराजक' हो जाती है। भागवत पुराण (११.१७.२१) में कहा गया है: "राज्ञां धर्मः प्रजाहिते।" (राजाओं का धर्म प्रजा का हित है।) किन्तु जब राजा स्वार्थी हो जाते हैं, तो कलियुग का प्रकोप बढ़ता है। समकालीन उदाहरण: ब्राजील के अमेज़न वनों का विनाश राजनीतिक लापरवाही से, जो पुराणिक 'प्रलय' का सूचक है।

 नैतिकता का मूलस्रोत

वेदों में अध्यात्म को 'ब्रह्मविद्या' कहा गया है, जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ती है। तैत्तिरीय उपनिषद (२.१) में:

"अहं ब्रह्मास्मि।"(मैं ब्रह्म हूँ।)

यह महावाक्य राजनीतिज्ञ को स्मरण कराता है कि सत्ता व्यक्तिगत नहीं, दिव्य है। समकालीन राजनीति में नैतिक अभाव का कारण 'अविद्या' (अज्ञान) है, जो भौतिक सुखों में लिप्तता से उत्पन्न होता है। अध्यात्म की वापसी से 'विद्या' जागृत होती है, जो सत्यनिष्ठा लाती है।

पुराणिक दृष्टि से, स्कन्द पुराण में शिव-पार्वती संवाद नैतिकता का उपदेश देते हैं: "नैतिकता ही राज्य का आधार है, अन्यथा पतन निश्चित।" आज, योग और ध्यान के माध्यम से अध्यात्म को राजनीति में स्थान देना आवश्यक है। उदाहरणस्वरूप, भूटान का 'ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस' मॉडल अध्यात्मिक है, जो वैदिक 'सुख' पर आधारित है। भारत में गांधीजी का 'सत्याग्रह' अध्यात्म का राजनीतिक रूप था — अहिंसा और सत्य का समावेश पर उनका सत्याग्रह पोलेटिकल होगया.

अध्यात्म की वापसी के लिए व्यावहारिक मार्ग:रा,जनीतिक शिक्षा में वेद-पुराण समावेश: स्कूलों से लेकर संसद तक, ऋषि-परम्परा का अध्ययन। ध्यान-योग का प्रचार: नेताओं के लिए अनिवार्य ध्यान-सत्र, जैसे उपनिषदों का चिन्तन।  जन-जागरण: पुराणिक कथाओं के माध्यम से नैतिकता का प्रचार, जैसे रामलीला या कृष्णलीला।इससे नैतिकता पुनः प्रस्थापित होगी।

 समाधान की पुराणिक लीला — अध्यात्म की विजय

कल्पना कीजिए एक पुराणिक कथा: कलियुग के एक राजा, नाम 'अधर्मदत्त', जो सत्ता के लोभ में प्रजा को पीड़ित करता है। एक ऋषि, वसिष्ठावत्, आते हैं और कहते हैं: "हे राजन्! अध्यात्म की ज्योति प्रज्वलित करो।" राजा ध्यान में लीन होते हैं, और भगवान विष्णु अवतार लेते हैं — एक आधुनिक कृष्ण, जो राजनीति को धर्मयुद्ध बनाते हैं। यह कथा भागवत पुराण की भक्ति-लीला से प्रेरित है।

समकालीन संदर्भ में, दलाई लामा या मण्डेला, डॉ हेडगेवार, श्री गुरूजी जैसे नेता अध्यात्मिक हैं — उनके निर्णय नैतिकता पर आधारित। भारत में, स्वामी विवेकानन्द ने कहा: "उठो, जागो, और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो।" यह वैदिक 'तप' है। अध्यात्म की वापसी से राजनीति 'सत्संग' बनेगी, जहाँ निर्णय 'कर्मयोग' पर आधारित होंगे।

चुनौतियाँ: भौतिकवाद का प्रलोभन। किन्तु उपनिषद कहते हैं: "तदेतदक्षरं ब्रह्म।" (यह अक्षर ब्रह्म है।) अध्यात्म शाश्वत है, भौतिक क्षणिकहै.

हे पाठक! वैदिक मन्त्रों की ध्वनि और पुराणों की लीला से स्पष्ट है कि समकालीन राजनीति का नैतिक अभाव एक संकट है, किन्तु अध्यात्म की वापसी ही अमृत है। ऋग्वेद (१०.१९१.२) में:

"एष वः समनसो ज्योतिरस्मभ्यं ज्योतिरुत नः।"(यह तुम्हारा एकमत प्रकाश हो, हमारा भी प्रकाश हो।)

राजनीतिज्ञों को इस प्रकाश को अपनाना चाहिए। जनता को पुराणिक भक्ति से जागृत होना चाहिए। इस प्रकार, एक नया युग — सत्ययुग का सूत्रपात — सम्भव है।

ॐ तत्सत्।

🙏

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