कांग्रेस का ‘राहुकाल’: पतन की ओर बढ़ती एक पुरानी शक्ति
एक युग का अंत, एक नई राजनीति का आरम्भ
भारतीय राजनीति के दीर्घ इतिहास में कांग्रेस कभी सर्वाधिक प्रभावशाली, सर्वव्यापी और सर्वमान्य दल रही है। परंतु आज वही पार्टी अपने ही बोझ तले दबकर धीरे-धीरे एक ऐसे राहुकाल में प्रवेश कर चुकी है जहाँ से वापसी की कोई स्पष्ट राह दिखाई नहीं देती। यह स्थिति किसी एक चुनावी पराजय की उपज नहीं, बल्कि वर्षों से जमी वैचारिक धुंध, नेतृत्व की भ्रमावस्था और संगठनात्मक क्षरण का परिणाम है।विचारधारा का शून्य : कांग्रेस की आत्मा लुप्त
कांग्रेस की त्रासदी यह नहीं कि उसके पास सत्ता नहीं है, बल्कि यह है कि उसके पास विचार नहीं है।
आज पार्टी—न राष्ट्रवाद की नई व्याख्या दे पा रही है,
न आधुनिक समाजवाद की दिशा तय कर पा रही है,
न आर्थिक नीति पर कोई गंभीर विकल्प प्रस्तुत कर पा रही है।जिन सिद्धांतों पर कभी वह खड़ी थी, वह स्मृतियों में ही रह गए।
विचारहीन दल समय के साथ संग्रहालय का अवशेष बन जाते हैं; कांग्रेस अब उसी मार्ग पर प्रतीत होती है।नेतृत्व की विफलता : परिवारवाद के छाया-प्रभाव,कांग्रेस का नेतृत्व आज प्रश्नों से घिरा है—उत्तर कहीं नहीं।राहुल गांधी को जनता ने निर्णायक नेता के रूप में स्वीकार नहीं किया।पार्टी के भीतर परिवार से इतर किसी और को नेतृत्व देना लगभग वर्जित है। यही कारण है कि—निर्णय लेने की क्षमता समाप्त, उत्साहहीन कार्यकर्ता, और नेतृत्वहीन राज्य संगठन—सब मिलकर पतन की कथा लिख रहे हैं।
कांग्रेस की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह आंतरिक लोकतंत्र की बात तो करती है, पर नेतृत्व अपने ही घर की चारदीवारी से बाहर निकलने नहीं देता।vसंगठन का क्षरण : जमीनी धरातल पर सन्नाटा,एक समय कांग्रेस का बूथ स्तर तक नेटवर्क मजबूत था।आज स्थिति उलट है—न बूथ एजेंट मिलते हैं,न वार्ड स्तर पर सक्रियता,न ज़मीनी आंदोलन का दम। संगठन जब जड़ों से कट जाए, तो तना कितना भी पुराना हो—सूखना तय है।
गठबंधन पर निर्भरता : विकल्पहीनता की राजनीति
कांग्रेस अब स्वयं चुनाव जीतने की क्षमता खो चुकी है।उसकी राजनीति गठबंधन के सहारे जीवित है।
पर कोई भी राष्ट्रीय दल गठबंधन को सहारा नहीं, बल्कि रणनीति बनाता है।यह निर्भरता बताती है कि कांग्रेस की अपनी ताकत समाप्त हो रही है।
नीति-निर्णय का अभाव : प्रतिक्रियाशील विपक्षआज कांग्रेस मुद्दों पर नेतृत्व नहीं करती—
बस सरकार के विरोध में खड़ी हो जाती है।
‘विरोध के लिए विरोध’ की यह नीति न देश को प्रभावित करती है, न मतदाताओं को।विपक्ष का मूल अर्थ है—विकल्प देना,पर कांग्रेस के पास न विकल्प है, न दृष्टि।देश को मजबूत विपक्ष चाहिए, पर कांग्रेस अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रही है।
भारत के मनोवैज्ञानिक परिवर्तन को न पढ़ पाना,
पिछले एक दशक में भारत के मतदाता में—
राष्ट्रीय सुरक्षा,सांस्कृतिक चेतना,तकनीकी प्रगति,
और वैश्विक प्रतिष्ठा—ये चारों भाव तीव्र हुए हैं।
कांग्रेस इस नए भारत को पुराने 1970 के चश्मे से देखती रही। इसी disconnect ने उसे जनता से बिल्कुल अलग-थलग कर दिया।
घोटालों की छवि का स्थायी दाग,
2G, CWG, कोयला और तमाम अन्य प्रकरण कांग्रेस के दामन पर स्थायी छाप की तरह अंकित हैं।लोकतंत्र में छवि अक्सर वास्तविकता से भी ज्यादा असर करती है।कांग्रेस इस छवि से मुक्त होने में असफल रही है—और जनता के मन में यह स्मृति अब भी ताज़ा है।
आगे का रास्ता : कांग्रेस क्या कर सकती है?
कांग्रेस अब दो मार्गों पर खड़ी है—
(क) पुनर्जन्म का मार्ग
परिवारवाद से बाहर नेतृत्व,
विचारधारा का पुनर्निर्माण
संगठन का पुनर्जीवन
राष्ट्रहित आधारित विपक्ष
(ख) पतन का मार्ग
यदि परिवर्तन नहीं हुआ, तो कांग्रेस 2030 के दशक में तीसरी-चौथी शक्ति बनकर रह जाएगी।
कांग्रेस का राहुकाल लंबा, भविष्य अनिश्चित
आज कांग्रेस शक्ति के शिखर से नहीं, बल्कि अपनी ही कमजोरी की खाई में गिर रही है।भारत की राजनीतिक चेतना बदल चुकी है—इस तेज़ बदलते परिदृश्य में वही दल जीवित रह सकता है जिसमें नवाचार और साहस हो।कांग्रेस में दोनों का अभाव है। यही उसका राहुकाल है, यही उसका पतन।
अंततः यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी—
कांग्रेस का संघर्ष सत्ता से नहीं, स्वयं से है;
और यदि यह संघर्ष हार गया, तो भारत में एक युग का अंतिम अध्याय लिख दिया जाएगा।
अब कांग्रेस की आत्माको अंतिम आहुति देना hi शेष है 🙏

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