भारत में सहकारिता @2047 - कौटिल्य का भारत

Breaking News

Home Top Ad

विज्ञापन के लिए संपर्क करें - 9415671117

Post Top Ad

गुरुवार, 20 नवंबर 2025

भारत में सहकारिता @2047

 सहकारिता सप्ताह पर विशेष!


सहकारिता भारतीय समाज की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास यात्रा का केंद्रीय तत्व रही है। इसका आधार वेद काल से लेकर आज़ादी की शताब्दी (2047) तक की सामाजिक-आर्थिक दृष्टि में स्पष्टता से देखा जा सकता है। भारतीय विचार परंपरा में “सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय” का भाव और वसुधैव कुटुम्बकम् जैसे सिद्धांत सहकारिता की नींव हैं, जो महत्त्वपूर्ण रूप से आज के ‘विकसित भारत 2047’ विजन से जुड़ते हैं।वेदकालीन सहकारिता की अवधारणा वेदिक कालीन समाज सामुदायिकता और सहयोग की मूल भावना पर आधारित था। ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद आदि ग्रंथों में अनेक स्थलों पर साझा उपासना, संसाधनों के सामूहिक प्रबंधन (जैसे जल-स्रोत, वन इत्यादि) तथा समूह के सामूहिक आर्थिक कल्याण की चर्चा है। गाँवों में भूमि का बंटवारा, सिंचाई व्यवस्था, भंडारण, सामूहिक श्रमदान और दान–ये प्राचीन सहकारिता के उदाहरण हैं.वैदिक काल की सहकार परंपराएँ ग्रामसभा और “समिति” जैसे शब्द सहकारिता की सांस्कृतिक जड़ों को प्रकट करते हैं।यज्ञ, सामूहिक कृषि कार्य, समाज के अनेक वर्गों का आपसी सहयोग, 'सभा', 'विदथ' जैसे संस्थाओं से लौकिक गतिविधियों का संचालन।“एकता में शक्ति” भाव वाली सूक्तियाँ और ऋचाएँ।

प्राचीन भारत में सहकारिता का स्वरूप प्राचीन भारत की आर्थिक, सामाजिक संरचनाएँ जैसे कि गिल्ड (श्रेणी), शिल्प संघ और ग्राम समितियाँ सहकारिता के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ग्रामीण समाजों में ‘महाजन’, ‘गिल्ड’, ‘परिषदी’ जैसे संगठन सामुदायिक हितों के लिये कार्य करते थे। भूमि संरक्षण, सिंचाई, उपभोग वस्तुओं का संग्रह आदि सामूहिक प्रयास के मुख्य बिंदु थे।मध्यकालीन काल में सहकारिता मध्ययुग में भले ही राजनीतिक अस्थिरता रही, किंतु गाँवों में सामूहिक कार्य, आपसी मदद, परस्पर ऋण व्यवस्था (धिफ या चिट फंड), संसाधनों का साझा उपयोग जारी रहा। दक्षिण भारत में “निधि” प्रथा, उत्तर भारत में “महाजन” या सामूहिक भंडारण जैसी व्यवस्थाएँ इसकी मिसाल हैं।औपनिवेशिक काल और औपचारिक सहकारिता आंदोलन1882 के मद्रास प्रेसिडेंसी में “निधि” प्रथा, 1891 में पंजाब की को–ऑपरेटिव लैंड सोसायटी जैसे प्रयास, लेकिन औपचारिक रूप से सहकारिता का कानूनी आधार वर्ष 1904 में अंग्रेजों ने ‘सहकारी साख समितियाँ अधिनियम’ के माध्यम से दिया। 1912 के सहकारी समितियाँ अधिनियम ने सभी क्षेत्रों में सहकारी संस्थाओं की स्थापना का मार्ग खोला। इन संस्थाओं ने ऋण, विपणन, खपत, आवास, उत्पादन, सहकारी बैंकिंग आदि क्षेत्रों में संक्रियता दिखाई।

स्वतंत्रता–पूर्व सहयोग आंदोलन का महत्त्व किसानों, जमींदारों, जरूरतमंद तबकों को महाजनी शोषण से मुक्ति।सहकारी साख समितियों, उपभोक्ता समितियों का विस्तार।श्रेयः मद्रास, पंजाब, बंगाल और बंबई प्रेसिडेंसी की स्थानीय पहलों को जाता है।स्वतंत्रताोत्तर भारत में सहकारिता,स्वतंत्रता के बाद सहकारिता को पंचायती राज, दशकों की पंचवर्षीय योजनाओं में एक केंद्रीय नीति के रूप में स्थान मिला। लक्ष्य था – आर्थिक सत्ता का विकेंद्रीकरण, लोकतांत्रिक आर्थिक भागीदारी और ग्रामीण नवाचार। 1963 में राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC), 1982 में NABARD जैसे संस्थानों का गठन सहकारी आंदोलन को सशक्त बनाने में निर्णायक रहा।सहकारी आंदोलन – भूमिका और उपलब्धियाँ-कृषि, दुग्ध, बैंकिंग, विपणन, ग्रामीण उद्योग क्षेत्रों में सहकारी समितियाँ आर्थिक सशक्तिकरण की रीढ़ बनीं।श्वेत क्रांति, ग्रीन रेवोल्यूशन में सहकारी समितियों की सक्रिय भूमिका-सहकारी समितियों के माध्यम से ग्रामीण सशक्तिकरण, छोटे उत्पादकों को बाज़ार, लोन, तकनीक तक पहुँच।महिला सशक्तिकरण, स्वयं सहायता समूह, उत्पादक सहकारी समितियों का विस्तार।नवीन भारत और नई सहकारिता नीति (2025 और 2047 का दृष्टिकोण)आज भारत का सहकारिता आंदोलन दूरदृष्टि के साथ डिजिटलीकरण, पारदर्शिता, तकनीकी उन्नयन, ग्रामीण-शहरी सहयोग, समावेशी विकास के लक्ष्य की ओर अग्रसर है। 

2025 में घोषित राष्ट्रीय सहकारिता नीति (National Cooperative Policy 2025) का विजन है – “2047 तक सहकारिता के माध्यम से विकसित भारत”।नीति के प्रमुख बिंदु“सहकार से समृद्धि” – हर गाँव में कम से कम एक आधुनिक सहकारी इकाई।छोटे किसानों, श्रमिकों, महिला समूहों के आर्थिक अधिकार।रोजगार सृजन, बाजारों तक पहुँच, डिजिटलीकरण, प्रोफेशनल मैनेजमेंट।सदस्य-केन्द्रित मॉडल, सबका साथ–सबका विकास।2047 की सहकारितावादी दृष्टि2047 तक सहकारिता आंदोलन का ध्येय है – सामाजिक न्याय, आर्थिक आत्मनिर्भरता, नवाचार और लोक-शक्ति का लोकतांत्रिक संचालन। तकनीक, वित्त, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, विपणन में सहकारी संगठनों की व्यापक और स्वायत्त भागीदारी से समावेशी और सतत् विकास संभव होगा।

इस प्रकार, वेदकालीन सामूहिक श्रम–सांस्कृतिक जड़ों से लेकर आधुनिक डिजिटल युग की राष्ट्रीय सहकारिता नीति तक भारतीय सहकारिता का लक्ष्य “जन-जन की आर्थिक उन्नति, सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण” का सर्वोच्च साधन बनना है। भारत के पास इस दिशा में हजारों वर्षों की सांस्कृतिक पूँजी है जो 2047 के विकसित, आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला बनेगी। 

यह सब प्रधान मंत्री  मोदी, सहकारिता मंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नाथ क़े मार्गदर्शन में यसस्वी सहकारिता  मंत्री जेपीएस राठौर की अहर्निश मेहनत पर सार्थक सोच की   परिणिति  से ही सम्भव होगा.

राजेंद्र नाथ तिवारी 

अध्यक्ष, जिला  सहकारी बैंक लीं बस्ती 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Bottom Ad