वन्देमातरम् को ‘राजद्रोही’ क्यों कहा गया? — (त्रयोदश श्रृंखला)
भारत के राष्ट्रीय आंदोलन की सबसे प्रखर और प्रेरणादायी पुकार “वन्देमातरम्” कभी ऐसे जोश और श्रद्धा से गूँजी कि अंग्रेज़ी साम्राज्य की नींव काँप उठी। यह गीत केवल साहित्यिक रचना नहीं थी, अपितु स्वाधीनता का मंत्र, सामूहिक चेतना का दीप और भारतीय आत्मसम्मान का प्रतीक था। फिर भी इतिहास में कई बार इसे “विवादित” या “राजद्रोही” कहा गया। यह आरोप कैसे जन्मा, उसके पीछे कौन–से ऐतिहासिक और राजनीतिक कारण रहे—इन प्रसंगों को समझना आवश्यक है।
गीत की उत्पत्ति और राष्ट्रवादी स्वभाव,वन्देमातरम् का जन्म बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के, आनंदमठ उपन्यास में हुआ। यह उपन्यास और इसमें समाहित गीत भारतीय समाज में सोई हुई राष्ट्रचेतना को जगाने वाला था। माँ–भूमि का वंदन, प्रकृति की पवित्रता और स्वतंत्रता की आकांक्षा—इन सबका सामूहिक रूप इस गीत में उभर कर आया। इसीलिए अंग्रेजी शासन ने इस गीत को केवल साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतना का स्रोत माना। अंग्रेजों की दृष्टि में यह गीत राज्य सत्ता के लिए चुनौती थी
अंग्रेज सरकार ने इसे राज द्रोही क्यों मना?1905 के बंग–भंग आंदोलन से लेकर 1920 के दशक तक वन्देमातरम् स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख नारा बन चुका था। जनसभाएँ इस गीत के साथ प्रारम्भ और समाप्त होती थीं। क्रांतिकारी संगठन इसे युद्ध–उद्घोष के रूप में उपयोग करते थे। पुलिस की रिपोर्टों में कई बार लिखा गया कि “वन्देमातरम्” सुनते ही भीड़ उग्र हो जाती है या सत्याग्रह का रंग तीव्र हो उठता है।इसके कारण अंग्रेजी सरकार ने इसे “राजद्रोही”, “उत्तेजक” और “अशांतिप्रद” घोषित किया। स्कूल, दफ्तर, सरकारी सभाओं—कहीं भी इसे बोलने की अनुमति नहीं थी। स्पष्टतः, अंग्रेज इसे इसलिए राजद्रोही कहते थे क्योंकि यह उनकी सत्ता को चुनौती देता था.
मुस्लिम लीग द्वारा इसे विवादित बनाना,समय बीतने पर यह विवाद केवल अंग्रेजों तक सीमित नहीं रहा। 1930 के दशक में मुस्लिम लीग ने इस गीत को धार्मिक आधार पर प्रश्नों के घेरे में लाना शुरू किया। उनका दावा था कि यह गीत हिंदू देवी की स्तुति करता है, इस कारण मुस्लिम समाज इसे स्वीकार नहीं कर सकता।हालाँकि यह तर्क साहित्यिक दृष्टि से सही नहीं था, क्योंकि गीत में माँ–भूमि की उपमा रूपक के रूप में है, किसी देवी–देवता की प्रत्यक्ष पूजा नहीं। फिर भी, लीग ने इसे अपनी साम्प्रदायिक राजनीति का साधन बनाया और धीरे–धीरे इसे ‘विवादित’ का लेबल दे दिया।ध्यान देने योग्य बात यह है कि—भारत के अधिकांश मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों ने इस गीत का कभी विरोध नहीं किया।खान अब्दुल गफ्फार खान, मौलाना आज़ाद और अशफाक उल्ला खान जैसे महान व्यक्तित्व वन्देमातरम् को भारतीय राष्ट्रवाद का प्रतीक मानते थे।
स्वतंत्र भारत में नया विवाद : राजनीति का प्रभाव,1947 के बाद भी वन्देमातरम् को लेकर विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। कुछ राजनीतिक दलों ने इसे बहुसंख्यक सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया, जिससे कुछ वर्गों में यह भ्रम फैलाया गया कि यह गीत उन पर “थोपा” जा रहा है।दूसरी ओर, एक वर्ग ने प्रतिक्रिया में यह कह दिया कि जो वन्देमातरम् नहीं गाएगा वह देशद्रोही है।दोनों तरह की अतिशय प्रतिक्रियाओं ने इस गीत को अनावश्यक राजनीतिक विवादों में उलझाया। कभी–कभी विरोध के क्रम में कुछ नेताओं ने उल्टा इसे ही “राजद्रोही” कहने की अनुचित हद भी पार कर दी।लेकिन ऐतिहासिक सच यह है कि—स्वतंत्र भारत में कभी किसी संवैधानिक या कानूनी प्राधिकरण ने वन्देमातरम् को राजद्रोही नहीं कहा।
संविधान सभा का स्पष्ट निर्णय,24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में वन्देमातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया गया।डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आज़ाद सहित अधिकांश सदस्यों ने इसे भारत की ऐतिहासिक धरोहर बताया। यह भी स्पष्ट कहा गया कि गीत के किसी अंश में किसी धर्म का प्रचार नहीं, बल्कि मातृभूमि का वंदन है।इस प्रकार यह गीत संविधान, संसद और राष्ट्र—तीनों की स्वीकृति से राष्ट्रीय विरासत बना।
क्या वन्देमातरम् सचमुच किसी धर्म का गीत है?गीत के शब्दों में—हरित-श्यामल भूमि,शस्य-श्यामला धरती,शीतल पवन,पवित्र जल,सौंदर्य की अनुपम छाया का वर्णन है।यह प्रकृति और मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता की भावना है।भारत के किसी भी धर्म में मातृभूमि का सम्मान करना वर्जित नहीं है। इसीलिए वन्देमातरम् किसी धर्म का नहीं, बल्कि राष्ट्र का गीत है।
‘राजद्रोही’ कहने का आरोप ऐतिहासिक भ्रम है,समग्र विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि—अंग्रेजों ने इसे राजद्रोही कहा क्योंकि यह उनकी सत्ता को चुनौती देता था।मुस्लिम लीग ने इसे अपनी राजनीति के हित में विवादित बनाया।स्वतंत्र भारत की राजनीति ने इसे कभी–कभी व्यक्तिगत लाभ के लिए अनावश्यक विवाद का माध्यम बनाया।परंतु सत्य यह है कि वन्देमातरम् न कभी राजद्रोही था, न है और न होगा।यह गीत भारतीय स्वाधीनता, सामूहिक चेतना, वीरता और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है।जो लोग इसे गलत अर्थों में प्रस्तुत करते हैं, वे या तो इतिहास से अनभिज्ञ हैं या राजनीति के अंधेपन से ग्रस्त हैं.
राजेंद्र नाथ तिवारी,
वन्देमातरम श्रृंखला -चतुर्दश प्रसून 🙏

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