जब "बस्ती "की ढील बारूद बन जाये,स्थानीय लापरवाही भी राष्ट्रद्रोह की परिधि में रखना होगा. - कौटिल्य का भारत

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मंगलवार, 18 नवंबर 2025

जब "बस्ती "की ढील बारूद बन जाये,स्थानीय लापरवाही भी राष्ट्रद्रोह की परिधि में रखना होगा.














 देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए पुलिस बीट की लापरवाही, स्थानीय स्तर पर व्याप्त अपराध एवं पुलिस, दुकानदार, दूध विक्रेता, शैक्षिक संस्थान आदि पर संदिग्ध गतिविधियों की अनदेखी, और जांच एजेंसियों की ढिलाई को लेकर एक बेहद आक्रामक और चेतावनीपूर्ण सम्पादकीय की जरूरत है, जिससे समाज, सरकार और एजेंसियां सचेत हो सकें.पुलिस बीट की विफलता और समाज पर प्रभावपुलिस बीट यानी स्थानीय गश्त और निगरानी बहुत पहले सुरक्षा की रीढ़ मानी जाती थी, लेकिन हाल के वर्षों में आतंकवाद एवं स्थानीय अपराध के चलते इसमें भारी कमजोरी देखी गई है.कई जगह रेलवे, बस स्टेशन, बड़े बाजार, दूध विक्रेता, दुकानदार, होटल आदि तक पुलिस की नियमित चौकसी नहीं दिखती, जिससे संभावित आतंकी या आपराधिक गतिविधियों के लिए जगह बचती है.दुकानदारों या आम लोगों के साथ पुलिस का रवैया अनेक बार उत्पीड़नपूर्ण देखा गया है, जिससे न केवल पुलिस-जन संवाद बिगड़ता है, बल्कि आंतरिक सूचना प्रणाली भी कमजोर पड़ती है.स्थानीय संदिग्धों पर सतर्कता का संकटसमय-समय पर यह स्पष्ट होता है कि देश के विभिन्न हिस्सों—विशेषकर महाराष्ट्र, केरल, झारखंड जैसे राज्यों—में स्थानीय स्तर पर उग्रवाद और संदिग्ध गतिविधियां बढ़ रही हैं.दुग्ध विक्रेता, छोटे दुकानदार या रिक्शा चालक, स्कूल-कॉलेज, शिक्षण संस्थान, न्यूज एजेंसियों की भूमिका कथित तौर पर काफी महत्त्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन इनपर न निगरानी है, न ही सामुदायिक संवाद, जिससे स्थानीय संदिग्धों की पहचान और कार्रवाई में कई बार देर हो जाती है.जांच एजेंसियों और तंत्र की विफलताखुफिया एजेंसियों और पुलिस यूनिट्स के परस्पर समन्वय की भारी कमी है, कई बार महत्वपूर्ण सूचना महकमे अपने-अपने हित में दबा लेते हैं.

देश की सशस्त्र बल, IB, ATS, NIA वगैरह, स्थानीय पुलिस या बीट अधिकारी—सभी का पारस्परिक समन्वय या सतर्कता स्तर जितना होना चाहिए, उतना नहीं हैl.इस कारण, जब तक कोई बड़ी वारदात न हो जाए, एजेंसियां छोटी-छोटी संदिग्ध गतिविधियों को "रूटीन" या "स्थानीय बहाना" मानकर अनदेखा कर देती हैं.आंतरिक सुरक्षा के खतरों पर चेतावनी देश जिस विकेंद्रीकृत आतंकवाद और संगठित अपराध के युग में है, वहाँ स्थानीय समाज और संस्थानों (दूध विक्रेता, दुकानदार, स्कूल-कॉलेज, निजी समाचार-प्रबंधक, इत्यादि) से आने वाली संदिग्ध गतिविधियों की अनदेखी देश को दुश्मनों के लिए आसान लक्ष्य बना रही है.यह लापरवाही सिर्फ कानून-व्यवस्था ही नहीं, देश के अस्तित्व के लिए सीधा खतरा बन चुकी है, क्योंकि बाहरी आतंकवादी नेटवर्क अब स्थानीय तंत्रों—रोज़मर्रा के व्यापार, स्कूल, दुकानदार, छोटे विक्रेता—की आड़ में ही गतिविधियां छिपाते हैं.

सम्पादकीय दिशाअब वक्त आ गया है कि हर राज्य में पुलिस बीट को तकनीकी और मानवीय दोनों स्तरों पर सशक्त किया जाए, उन्हें सामुदायिक संवाद और पहचान की स्पेशल ट्रेनिंग मिले, और स्थानीय निवासियों के साथ भरोसेमंद सूचना तंत्र विकसित हो.जांच एजेंसियों (IB, ATS, NIA) के बीच सूचना साझा करने की सख्त सिस्टम बने और हर संदिग्ध गतिविधि—चाहे जितनी भी छोटी हो—पर उच्च स्तरीय समीक्षा और कार्रवाई का प्रावधान हो.दूध विक्रेताओं, दुकानदारों, स्कूल-कॉलेजों, न्यूज एजेंसियों, होटल-रेस्तरां जैसे स्थानीय तंत्रों का डाटा बेस बनाकर हर संदिग्ध व्यक्ति/गतिविधि की सीधी मॉनिटरिंग की व्यवस्था की जाये.निष्कर्ष,देश की आंतरिक सुरक्षा को छेदने वाले नामालूम छिद्र अब इतने बड़े हो चुके हैं कि कोई भी आतंकी, तस्कर या संगठित अपराधी बेहद आसानी से स्थानीय तंत्रों का इस्तेमाल कर सकता है. पुलिस, स्थानीय नागरिकों और जांच एजेंसियों, सभी को बाहरी और स्थानीय दोनों तरह के खतरों के प्रति एक नयी, अत्यंत आक्रामक और तकनीकी समझ वाली नीति की जरूरत है, जिसमें कोई भी शिकायत, सूचना, शक या असामान्य गतिविधि को सजगता से लेकर उसकी तह तक पहुँचना अनिवार्य बनाए जाए. देश की सुरक्षा ईमानदार चौकसी, पारदर्शी संवाद और तकनीकी-मानवीय एकता की अंतिम परख पर ही सिद्ध हो पाएगी.

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