एकादश श्रृंखला
क्रांतिकारियों का ऊर्जा-उद्घोष : वन्दे मातरम
“जिनकी भुजाओं में बल था, जिनमें था देश-प्रेम का तेज,
वे कहते थे—हम लड़ेंगे, और लड़कर रहेंगे।” — रामधारी सिंह ‘दिनकर’
भारत के स्वाधीनता इतिहास में यदि कोई एक ध्वनि, एक श्वास, एक भाव और एक नाद ऐसा रहा जिसने लाखों देशभक्तों की चेतना को आंदोलित किया, उनके हृदयों में ज्वालामुखी-सा संकल्प भरा, और जिसे सुनकर शरीर की नसों में बिजली-सी दौड़ जाती थी—तो वह था “वन्दे मातरम्”। यह उद्घोष केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक ऊर्जा-मंत्र, एक संकल्प-सूत्र, एक युद्ध-घोष, और एक अमिट राष्ट्रीय प्रतीक था।यह श्रृंखला (एकादश) क्रांतिकारियों की उसी भावना को समझने का प्रयास है—कैसे “वन्दे मातरम्” उनके लिए प्रेरणा, प्राण, प्रकाश और पराक्रम का अमित स्रोत बन गया।क्यों यह गीत विदेशी साम्राज्यवाद के लिए भय, और भारतीय क्रांतिकारियों के लिए अमृत बन गया।
वन्दे मातरम् : मातृभूमि का दिव्य आह्वान,जब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने “आनंदमठ” में "वन्दे मातरम्" को जन्म दिया, तब यह कोई साधारण गीत नहीं था। यह भारत की मातृप्रतिमा का जागरण था—वह प्रतिमा जिसे ब्रिटिश शासन ने दमन, अत्याचार और अपमान के बोझ तले दबा दिया था।क्रांतिकारियों के लिए भारत केवल भूगोल न था—वह तो जीवंत माता थी। हर पर्वत, हर नदी, हर खेत, हर पगडंडी, हर मंदिर और हर धूल का कण इस मातृप्रतिमा का अंग था।"वन्दे मातरम्" सुनते ही मातृदेवी जाग उठती थीं।और जब मातृदेवी जागती थीं—तो क्रांतिकारियों की चेतना भी प्रज्ज्वलित हो जाती थी।
क्रांतिकारियों की मानस-भूमि : आग, भक्ति और बलिदान,भारत का क्रांतिकारी आंदोलन केवल राजनीतिक असंतोष का परिणाम नहीं था। वह धर्म, सांस्कृतिक चेतना और आत्मबलिदान की परंपरा से उपजा हुआ था।भगत सिंह हों या सुखदेव, राजगुरु हों या चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, खुदीराम बोस, सूर्य सेन, ऊधम सिंह—इनमें से हर व्यक्ति के भीतर एक ऐसी अग्नि थी जो केवल राजनीतिक कारणों से नहीं जल सकती थी। यह अग्नि आध्यात्मिक-राष्ट्रीय चेतना से उत्पन्न होती थी।और इस चेतना का सबसे शक्तिशाली मंत्र था—“वन्दे मातरम्”यह एक ऐसी पुकार बन गई थी जो मृत्यु को भी तुच्छ बना देती थी।जो जेल की कालकोठरी को तपोभूमि बना देती थी।जो फांसी के तख्ते को भी मंदिर की सीढ़ी बना देती थी।
जब वन्दे मातरम् क्रांति का पासवर्ड बन गया,इंग्लैंड के खिलाफ संघर्ष कर रहे क्रांतिकारी दलों—अनुशीलन समिति, युगांतर, गदर पार्टी, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA), रेवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ इंडिया—सभी के लिए “वन्दे मातरम्” एक संकेत था।जहां ब्रिटिश पुलिस को आशंका होती कि क्रांतिकारी सक्रिय हैं, वहीं यह आवाज दीवारों पर लिखी मिलती—“वन्दे मातरम्—हम आ रहे हैं।”यह गीत कुछ के लिए मंत्र था, कुछ के लिए कोड, और सबके लिए ताकत का स्रोत।
जेल की कोठरियों में गूंजता हुआ गीत,क्रांतिकारियों के लिए जेल एक तपस्थली थी।कई बार ब्रिटिश अधिकारी आश्चर्य से देखते कि लाठीचार्ज, कोड़े, भूख और बंदीगृह के कष्टों के बावजूद ये युवक न हताश होते, न टूटते।जब रात्रि के अंधेरे में कोठरियों से आवाज आती—“वन्दे मातरम्…”तो जेलर कांप उठते।उनके लिए यह गीत विद्रोह का एलान था।और क्रांतिकारियों के लिए—मुक्ति का संगीत।
प्रतिकार की संस्कृति : अंग्रेज क्यों डरते थे 'वन्दे मातरम्' से,ब्रिटिश शासन ने अनेक आदेश निकाले कि—स्कूलों में यह गीत न गाया जाए,जुलूसों में यह उद्घोष न हो,सार्वजनिक संस्थानों में इसे प्रतिबंधित किया जाए,छात्रों को दंड मिलें,धरने-प्रदर्शनों में इसके नारे लगे तो गोली चलाई जाएयह क्यों?क्योंकि यह गीत जनता को नींद से जगाकर क्रांति के लिए तैयार कर देता था।अंग्रेज जानते थे—जहां "वन्दे मातरम्" है, वहां बगावत की चिंगारी है।
क्रांतिकारी शहीदों के जीवन में वन्दे मातरम् का प्रभाव,(क) खुदीराम बोस,सिर्फ 18 वर्ष की आयु में फांसी पर चढ़े खुदीराम बोस फांसी के तख्ते पर जाते समय हंस रहे थे।उनके मुख पर केवल एक मंत्र था—“वन्दे मातरम्”यह उद्घोष उनके लिए मृत्यु नहीं, बल्कि अमरत्व का वरण था।ख) बिस्मिल-अशफाक की अमर जोड़ी,रामप्रसाद बिस्मिल केवल कवि ही नहीं, भीषण क्रांतिकारी भी थे।उनकी कविता “सरफरोशी की तमन्ना” जब गाई जाती थी, तो पृष्ठभूमि में हमेशा गूंजता था—“वन्दे मातरम्”अशफाक उल्ला खान, जो मुस्लिम होकर भी वन्दे मातरम् को उतना ही पूजते थे, कहते थे—"यह गीत हमें बताता है कि भारत हमारी माता है, और माता से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।"(ग) चंद्रशेखर आज़ाद,आज़ाद ने अपने दल में एक नियम बनाया था—हर अभियान से पहले सब लोग खड़े होकर “वन्दे मातरम्” का सामूहिक उच्चारण करेंगे।उनका तर्क सरल था—"जब यह गीत हृदय में उतरता है, तो मृत्यु का भय स्वतः मिट जाता है।"(घ) भगत सिंह और उनके साथी,HSRA के दस्तावेज़ों में स्पष्ट प्रमाण मिलता है कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जब किसी मिशन पर जाते या लौटते, तब उनकी बैठक का समापन हमेशा “वन्दे मातरम्” के उद्घोष से होता था।उनके लिए यह गीत मानसिक दृढ़ता का हथियार था।गोले-बारूद के बीच जैसे कोई सुरक्षाचक्र हो—ऐसा अनुभव “वन्दे मातरम्” देता था।(7). क्रांति-साहित्य में वन्दे मातरम्क्रांतिकारियों के गुप्त साहित्य में “वन्दे मातरम्” सर्वाधिक प्रकाशित होता था।यह गीत—पर्चों पर लिखा जाता,अखबारों की गुप्त पंक्तियों में छपता,हथियारों के पैकेटों में दबाकर भेजा जाता,जेल के भीतर दीवारों पर उकेरा जाता,गांवों में रात के अंधेरे में कीर्तन की तरह गाया जाता।वास्तव में, यह गीत भारत के क्रांति-साहित्य का शिरोमणि गीत था।(8). गीत से युद्ध-ऊर्जा तक : “वन्दे मातरम्” की मानसिक शक्ति,गीत मनुष्य की भावनाओं को बदल देता है।वन्दे मातरम् केवल भाव नहीं बदलता था—वह चेतना को रूपांतरित करता था।इसके प्रभाव से क्रांतिकारियों में:भय का नाश,त्याग का भाव,बलिदान का संकल्प,ध्वंस का दुस्साहस,मृत्यु का वरण स्वतः उत्पन्न हो जाता था।य ह गीत आध्यात्मिक ऊर्जा का सागर था।सुने ही हृदय में मातृशक्ति उतर आती थी।क्रांतिकारी इसे शक्ति-पाठ समझते थे।(9). वन्दे मातरम् और भारतीय युवाशक्ति,उस समय के युवा वर्ग का हृदय ज्वालामुखी था।19–20 वर्ष के छात्र ऐसे निर्णय लेते थे जिन्हें सामान्य मनुष्य सोच भी नहीं सकता—बम बनाना, पुलिस से लड़ना, गोली खाना, और फांसी स्वीकार करना!इन युवाओं में यह पराक्रम कहाँ से आता था?वन्दे मातरम् उनके लिए संघर्ष-चक्र, ऊर्जा-कवच, और नैतिक प्रेरणा था।जब कोई युवा “वन्दे मातरम्” पुकारता था—उसे लगता था कि समूची धरती, आकाश, हवा, वृक्ष, नदियाँ, पर्वत—सब उसके साथ खड़े हैं।
वन्दे मातरम् : राष्ट्र के पुनर्जागरण का महामंत्र,भारत 1857 के बाद निराशा, भय और भ्रम में डूबा हुआ था।अंग्रेजों ने जनता को यह विश्वास दिला दिया था कि वे अजेय हैं।लेकिन “वन्दे मातरम्” ने इस भ्रम को तोड़ दिया।इस गीत ने बताया—
भारत दास नहीं, भारत माता है।
माता कभी पराधीन नहीं हो सकती।
उसके पुत्र कभी हार नहीं मानते।
इसीलिए यह राष्ट्र-जागरण का मंत्र बना। जिसने देश को नींद से जगाया, चेतना को बल दिया और आत्मा को स्वाधीनता का संकल्प दिया।
क्रांतिकारियों के युद्ध-घोष, जुलूस और अभियान में वन्दे मातरम्,चाहे बंग-भंग हो, चाहे असहयोग आंदोलन, चाहे सशस्त्र क्रांति—हर जगह एक स्वर था—“वन्दे मातरम्… वन्दे मातरम्…”कई जुलूसों में अंग्रेजों ने गोली चलाई—लेकिन लोग गिरते हुए भी यही कहते—“वन्दे मातरम्!”यह उद्घोष आंदोलन की आत्मा बन गया था।जब राष्ट्रगीत क्रांति का शंख बना,भारत में कोई क्रांति तब सफल होती है जब वह सांस्कृतिक शक्ति से जुड़ जाती है।वन्दे मातरम् ने क्रांति को सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और मानसिक आयाम दिया।यह भारत की—संस्कृति,संस्कृति का स्त्री-तत्व,मातृशक्ति,भूमि-पूजनप्रकृत,वीर-परंपरासभी का प्रतिनिधित्व करने लगा।इसीलिए यह गीत केवल क्रांति नहीं, राष्ट्रीय पुनर्जन्म का गीत बन गया। स्वतंत्रता के समय अंतिम बार उठा उद्घोष,जब 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ—पूरा देश एक ध्वनि से भर गया—“वन्दे मातरम्!”यह जीत का नारा भी था,बलिदानियों का स्मरण भी था,और राष्ट्र-चेतना की विजय का समारोह भी। आधुनिक भारत और क्रांतिकारी ऊर्जा,आज भारत चाहे कितनी भी प्रगति कर ले, चाहे अंतरिक्ष में जा पहुँचे—लेकिन ऊर्जा का स्रोत वही है जो 1857, 1905 और 1931 में था—मातृभूमि का प्रेम।और इस प्रेम का उद्घोष आज भी वही है—“वन्दे मातरम्”जब कोई छात्र, कोई सैनिक, कोई युवा, कोई नागरिक इसे उच्चारित करता है—उसके भीतर वही प्राचीन शक्ति प्रवाहित होती है,वही चंद्रशेखर आज़ाद वाली आग,वही भगत सिंह वाला संकल्प,वही बिस्मिल वाला प्रण—मातृभूमि के लिए जीना और मरना। क्रांतिकारियों का अनंत ऊर्जा-मंत्र,क्रांतिकारी जानते थे—हथियार सीमित हैं, लेकिन चेतना अनंत है।वन्दे मातरम् इस चेतना को उभारने का सबसे शक्तिशाली साधन था।
यह गीत शस्त्र नहीं था—शक्ति था।यह संगीत नहीं था—संघर्ष था।
यह कविता नहीं थी—क्रांति थी।क्रांतिकारियों के लिए “वन्दे मातरम्” था—साहस का स्रोत,मातृभूमि का आशीर्वाद,दृढ़ता का कवच,युद्ध का जयघोष,बलिदान का मंत्र,इसलिए यह कहा जा सकता है—
जहाँ वन्दे मातरम्, वहाँ क्रांति;जहाँ क्रांति, वहाँ मातृभूमि का उजाला।
दिनकर की प्रेरक वाणी
“सिंहासन खाली करो कि जनता आती है,
वन्दे मातरम् का नाद ही क्रांति जगाती है।” — दिनकर🙏
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क्रमशः.. द्वादश श्रृंखला 🙏


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