जिन्ना -नेहरू की दूरभि सन्धि से शापित एक राष्ट्र गीत (द्वादश श्रृंखला ) - कौटिल्य का भारत

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बुधवार, 19 नवंबर 2025

जिन्ना -नेहरू की दूरभि सन्धि से शापित एक राष्ट्र गीत (द्वादश श्रृंखला )

 

द्वादश श्रृंखला :


वन्देमातरम् ‘राष्ट्र-द्रोही’ क्यों कहा गया?
नेहरू–जिन्ना की नियति और राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न!

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में “वन्देमातरम्” केवल एक गीत या नारा नहीं था; यह भारतीय आत्मा, स्वाभिमान, सांस्कृतिक चेतना और परतंत्रता-विरोधी तेवरों का ज्वालामुखी था। इस गीत को लेकर जो भ्रम, विवाद और राजनीतिक ध्रुवीकरण 20वीं शताब्दी के प्रारंभ से लेकर आज तक खड़ा है, वह केवल इतिहास का प्रसंग नहीं—बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद के चरित्र, उसके मूल्यों और उसके संकटों का आईना है।द्वादश श्रृंखला का यह विश्लेषण इस प्रश्न की तह में उतरता है कि आख़िर “वन्देमातरम्” जैसे राष्ट्रजागरण के स्त्रोत को नेहरू, जिन्ना और उनके अनुयायी वर्गों द्वारा ‘विभाजनकारी’ या ‘राष्ट्र-द्रोही’ क्यों कहा गया? इसका उत्तर मात्र राजनीतिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक और वैचारिक स्तर पर छिपा हुआ है

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में “वन्देमातरम्” केवल एक गीत या नारा नहीं था; यह भारतीय आत्मा, स्वाभिमान, सांस्कृतिक चेतना और परतंत्रता-विरोधी तेवरों का ज्वालामुखी था। इस गीत को लेकर जो भ्रम, विवाद और राजनीतिक ध्रुवीकरण 20वीं शताब्दी के प्रारंभ से लेकर आज तक खड़ा है, वह केवल इतिहास का प्रसंग नहीं—बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद के चरित्र, उसके मूल्यों और उसके संकटों का आईना है।

द्वादश श्रृंखला का यह विश्लेषण इस प्रश्न की तह में उतरता है कि आख़िर “वन्देमातरम्” जैसे राष्ट्रजागरण के स्त्रोत को नेहरू, जिन्ना और उनके अनुयायी वर्गों द्वारा ‘विभाजनकारी’ या ‘राष्ट्र-द्रोही’ क्यों कहा गया? इसका उत्तर मात्र राजनीतिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक और वैचारिक स्तर पर 

वन्देमातरम्, (द्वादश  श्रृंखला)



वन्देमातरम् का उद्भव—एक श्लोक, एक शक्ति, एक राष्ट्र,

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने आनंदमठ में जब “वन्देमातरम्” लिखा, तब वह किसी समुदाय या सम्प्रदाय के विरोध में रचित न था।यह गीत था—मातृभूमि के प्रति अटूट श्रद्धा का गीत,भारतीय संस्कृति की प्राण-प्रतिष्ठा,और विदेशी दासता के विरुद्ध प्रतिरोध का उद्घोष।उस युग में अंग्रेज़ों का भारत को सांस्कृतिक रूप से निर्जीव बनाने का प्रयास चरम पर था; ऐसे में “वन्देमातरम्” ने जनता में वह स्पंदन उत्पन्न किया जो आगे चलकर 1905 के बंग-भंग विरोध, स्वदेशी आंदोलन और क्रांतिकारियों की प्रेरणा का शाश्वत स्रोत बना। फिर विरोध क्यों?—समस्या गीत में नहीं, राजनीति में थी,इतिहास बताता है कि लगभग चार दशक तक वन्देमातरम् को लेकर कोई बड़ा विवाद नहीं था। मुस्लिम लीग तक के कई नेता इसे सम्मान देते थे। विवाद प्रारंभ हुआ 1930 के दशक में, जब कांग्रेस के भीतर सत्ता-संतुलन बदल रहा था और मुस्लिम लीग अलग राष्ट्र की मांग की ओर झुक रही थी।विरोध का कारण धर्म नहीं, बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण था।जिन्ना को मुस्लिम लीग का जनाधार मजबूत करना था।इसके लिए आवश्यक था कि मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रखा जाए।प्रतीकों को लड़ाई का हथियार बनाया गया—और “वन्देमातरम्” इसका पहला लक्ष्य बना।इसलिए गीत पर आरोप लगाया गया कि यह “हिंदू देवी की पूजा” जैसा दिखता है। जबकि बंकिमचन्द्र ने गीत का भाव मातृभूमि को समर्पित रखा था, किसी धार्मिक देवी को नहीं। नेहरू की दुविधा—राष्ट्रीय भावना बनाम सत्ता-समीकरण,जवाहरलाल नेहरू निजी स्तर पर वन्देमातरम् को सुंदर और प्रेरणादायी मानते थे।लेकिन उन्हें दो प्रकार के दबाव झेलने पड़े—(क) मुस्लिम लीग के तुष्टिकरण की राजनीतिक आवश्यकता,कांग्रेस को लगता था कि यदि मुस्लिम भावनाओं को “संतुष्ट” नहीं किया गया तो लीग अलगाव की ओर और तेज़ी से बढ़ जाएगी।नेहरू इस मनोविज्ञान को मानते थे।(ख) औपनिवेशिक वार्ताओं में ‘सेक्युलर’ छवि बनाए रखना,अंग्रेज़ कांग्रेस को ‘हिंदू पार्टी’ के रूप में प्रस्तुत करते रहते थे।नेहरू इस छवि को तोड़ने के लिए हर उस प्रतीक से दूरी बनाते गए जिसका कोई सांस्कृतिक स्वरूप हो—even if it was national, not religious.परिणाम—राष्ट्र-चेतना का गीत राजनीति का शिकार बन गया. जिन्ना की रणनीति—वन्देमातरम् को हथियार बना देना,मोहम्मद अली जिन्ना स्वयं प्रारंभिक दौर में ‘राष्ट्रवादी मुसलमान’ कहलाते थे।किन्तु 1937 में चुनावी पराजय के बाद जिन्ना ने रणनीति बदल दी“कांग्रेस हिंदुओं की पार्टी है”—यह धारणा स्थापित करना।मुसलमानों को कांग्रेस से अलग करना।हर सांस्कृतिक प्रतीक को “हिंदू” बनाकर उसके विरुद्ध अभियान खड़ा करना।वन्देमातरम् उसके लिए सबसे आसान लक्ष्य था—क्योंकि यह जनता के भीतर अत्यधिक लोकप्रिय था, और लोकप्रियता ही किसी राजनेता के लिए सबसे बड़ा खतरा होती है।इस गीत को ‘राष्ट्र-द्रोही’ बताना वास्तव में भारत की एकता को तोड़ने की रणनीति थी।सत्य यह था—वन्देमातरम् ने क्रांतिकारियों को शक्ति दी थी, लीग को नहीं,मुस्लिम लीग और जिन्ना का सबसे बड़ा भय यह था कि वन्देमातरम् का भाव एक ऐसा राष्ट्रवाद गढ़ता है जिसमें संप्रदाय की राजनीति पनप ही नहीं सकती।गीत के माध्यम से ऐसे राष्ट्र की कल्पना उभरती थी—जहाँ भूमि, धर्म, समाज, इतिहास सब एक राष्ट्रीय धारा में समाहित हैं।यह जिन्ना की ‘दो-राष्ट्र सिद्धान्त’ का खंडन था।इसलिए गीत पर हमला किया गया। नेहरू–जिन्ना की नियति—दोनों की राजनीति का अंतिम फल,इतिहास की विडंबना देखिए—नेहरू की नियति,नेहरू ने मुस्लिम लीग को साधने और “सेक्युलर छवि” संरक्षित रखने के लिए वन्देमातरम् को सीमित किया।लेकिन—लीग कभी संतुष्ट नहीं हुई,विभाजन हुआ,और भारत की राष्ट्रीय चेतना का एक शक्तिशाली प्रतीक अवमूल्यित कर दिया गया।नेहरू की नियति यह रही कि उनके प्रयासों से जिन्ना को राजनीतिक शक्ति ही मिली।जिन्ना की नियतिजिन्ना ने वन्देमातरम् को हथियार बनाकर मुसलमानों में अलगाव बढ़ाया।परिणाम—पाकिस्तान मिलने के कुछ महीनों बाद ही जिन्ना की सत्ता उनकी ही राजनीति के बोझ से टूटने लगी।वे स्वयं कहते सुने गए—“I never wanted a theocratic state.”परंतु दो-राष्ट्र सिद्धांत ही पाकिस्तान का मूलाधार बन चुका था।उनकी नियति यही बनी कि उन्होंने जिस विभाजनकारी राजनीति से सत्ता पाई, उसी ने राष्ट्र का भविष्य अनिश्चित कर दिया। वन्देमातरम् ‘राष्ट्र-द्रोही’ नहीं—राष्ट्र-विरोधी राजनीति का शिकार,“राष्ट्र-द्रोही” शब्द का प्रयोग कहाँ हुआ?कब हुआ?किसके द्वारा किया गया?उत्तर सरल है—वन्देमातरम् राष्ट्र-द्रोही नहीं था, न हो सकता है।विरोध करने वाले इसे राष्ट्र-विरोधी सिद्ध नहीं कर सके;उन्होंने केवल राजनीतिक लाभ के लिए भ्रम फैलाया।यह गीत भारत-भक्ति का है।इसमें किसी संप्रदाय की निंदा या उपेक्षा नहीं।यह किसी देवता की पूजा का आग्रह नहीं करता—यह मातृभूमि की स्तुति है, जो विश्व की हर सभ्यता में सहज और सामान्य है।परंतु जब राजनीति भावनाओं को अपने हित में मोड़ने लगती है, तो राष्ट्र के प्रतीक भी आरोपों के घेरे में आ जाते है.आज की दृष्टि से—वन्देमातरम् का अर्थ और भी व्यापक है21वीं सदी में यह विवाद प्रासंगिक इसलिए है क्योंकि—भारत की संस्कृति,राष्ट्र की एकता,और स्वतंत्रता संग्राम की विरासत,छद्म-सेक्युलर बहसों, कट्टरवाद और राजनीतिक ध्रुवीकरण में दोबारा विवाद के केंद्र में लाई जाती है।आज “वन्देमातरम्” का अर्थ केवल एक गीत का नहीं—एक ऐसी स्मृति का है जो बताती है कि भारतीय राष्ट्रवाद किसी संप्रदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि किसी विदेशी वर्चस्व के विरुद्ध जन्मा था।

 राष्ट्र वाद वनाम सत्ता लाभ!वन्देमातरम् पर जो विवाद रचा गया, वह मूलतः भारत की चेतना का विवाद था।बंकिमचन्द्र का वन्देमातरम्—राष्ट्र का मन,नेहरू की दुविधा—सत्ता-संतुलन,जिन्ना की रणनीति—विभाजन और अलगाव,इन तीनों के टकराव में सबसे चोटिल हुआ—भारतीय राष्ट्रीयता का स्वाभिमान।वन्देमातरम् ‘राष्ट्र-द्रोही’ न था, न होगा।विवाद का वास्तविक स्रोत नेहरू–जिन्ना की राजनीतिक नियति थी—जो एक ओर तुष्टिकरण से शुरू हुई, और दूसरी ओर विभाजन की माँग पर जाकर समाप्त हुआ.भारत की राष्ट्रीय आत्मा इन राजनीतिक उलझनों से कहीं ऊपर है—और उसका महान उद्घोष आज भी वही है—

वन्दे मातरम्।

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने आनंदमठ में जब “वन्देमातरम्” लिखा, तब वह किसी समुदाय या सम्प्रदाय के विरोध में रचित न था।
यह गीत था—
मातृभूमि के प्रति अटूट श्रद्धा का गीत,भारतीय संस्कृति की प्राण-प्रतिष्ठा,और विदेशी दासता के विरुद्ध प्रतिरोध का उद्घोष।उस युग में अंग्रेज़ों का भारत को सांस्कृतिक रूप से निर्जीव बनाने का प्रयास चरम पर था; ऐसे में “वन्देमातरम्” ने जनता में वह स्पंदन उत्पन्न किया जो आगे चलकर 1905 के बंग-भंग विरोध, स्वदेशी आंदोलन और क्रांतिकारियों की प्रेरणा का शाश्वत स्रोत बना। फिर विरोध क्यों?—समस्या गीत में नहीं, राजनीति में थी

इतिहास बताता है कि लगभग चार दशक तक वन्देमातरम् को लेकर कोई बड़ा विवाद नहीं था। मुस्लिम लीग तक के कई नेता इसे सम्मान देते थे। विवाद प्रारंभ हुआ 1930 के दशक में, जब कांग्रेस के भीतर सत्ता-संतुलन बदल रहा था और मुस्लिम लीग अलग राष्ट्र की मांग की ओर झुक रही थी।

विरोध का कारण धर्म नहीं, बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण था।जिन्ना को मुस्लिम लीग का जनाधार मजबूत करना था।इसके लिए आवश्यक था कि मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रखा जाए।प्रतीकों को लड़ाई का हथियार बनाया गया—और “वन्देमातरम्” इसका पहला लक्ष्य इसलिए गीत पर आरोप लगाया गया कि यह “हिंदू देवी की पूजा” जैसा दिखता है। जबकि बंकिमचन्द्र ने गीत का भाव मातृभूमि को समर्पित रखा था, किसी धार्मिक देवी को नहीं।३. नेहरू की दुविधा—राष्ट्रीय भावना बनाम सत्ता-समीकरण,जवाहरलाल नेहरू निजी स्तर पर वन्देमातरम् को सुंदर और प्रेरणादायी मानते थे।लेकिन उन्हें दो प्रकार के दबाव झेलने पड़े—क) मुस्लिम लीग के तुष्टिकरण की राजनीतिक आवश्यकता,कांग्रेस को लगता था कि यदि मुस्लिम भावनाओं को “संतुष्ट” नहीं किया गया तो लीग अलगाव की ओर और तेज़ी से बढ़ जाएगी।नेहरू इस मनोविज्ञान को मानते थे।

 औपनिवेशिक वार्ताओं में ‘सेक्युलर’ छवि बनाए रखना,अंग्रेज़ कांग्रेस को ‘हिंदू पार्टी’ के रूप में प्रस्तुत करते रहते थे।नेहरू इस छवि को तोड़ने के लिए हर उस प्रतीक से दूरी बनाते गए जिसका कोई सांस्कृतिक स्वरूप हो—even if it was national, not religious.परिणाम—राष्ट्र-चेतना का गीत राजनीति का शिकार बन गया। जिन्ना की रणनीति—वन्देमातरम् को हथियार बना देना

मोहम्मद अली जिन्ना स्वयं प्रारंभिक दौर में ‘राष्ट्रवादी मुसलमान’ कहलाते थे।
किन्तु 1937 में चुनावी पराजय के बाद जिन्ना ने रणनीति बदल दी—
“कांग्रेस हिंदुओं की पार्टी है”—यह धारणा स्थापित करना।मुसलमानों को कांग्रेस से अलग करना।हर सांस्कृतिक प्रतीक को “हिंदू” बनाकर उसके विरुद्ध अभियान खड़ा करना।

वन्देमातरम् उसके लिए सबसे आसान लक्ष्य था—
क्योंकि यह जनता के भीतर अत्यधिक लोकप्रिय था, और लोकप्रियता ही किसी राजनेता के लिए सबसे बड़ा खतरा होती है।

इस गीत को ‘राष्ट्र-द्रोही’ बताना वास्तव में भारत की एकता को तोड़ने की रणनीति थी। सत्य यह था—वन्देमातरम् ने क्रांतिकारियों को शक्ति दी थी, लीग को नहीं

मुस्लिम लीग और जिन्ना का सबसे बड़ा भय यह था कि
वन्देमातरम् का भाव एक ऐसा राष्ट्रवाद गढ़ता है जिसमें संप्रदाय की राजनीति पनप ही नहीं सकती।

गीत के माध्यम से ऐसे राष्ट्र की कल्पना उभरती थी—
जहाँ भूमि, धर्म, समाज, इतिहास सब एक राष्ट्रीय धारा में समाहित हैं।
यह जिन्ना की ‘दो-राष्ट्र सिद्धान्त’ का खंडन था।

इसलिए गीत पर हमला किया गया।

विवाद का वास्तविक स्रोत नेहरू–जिन्ना की राजनीतिक नियति थी—
जो एक ओर तुष्टिकरण से शुरू हुई, और दूसरी ओर विभाजन की माँग पर जाकर समाप्त।
भारत की राष्ट्रीय आत्मा इन राजनीतिक उलझनों से कहीं ऊपर है—और उसका महान उद्घोष आज भी वही है—न्दे मातरम्।🙏राजेंद्र नाथ तिवारी 

क्रमशः त्रयोदश... श्रृंखला 🙏

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