खैर इंटर कॉलेज नियुक्ति प्रकरण: महत्त्वाकांक्षा की अंधी दौड़ में प्रबंधक फँस गए—अब बचा है केवल क़ानून का कठोर रास्ता
बस्ती।19 नवंबर 25
खैर इंटर कॉलेज की अवैध नियुक्तियों का मामला अब उस मोड़ पर पहुँच चुका है जहाँ हर परत खुलने के साथ यह साबित होता जा रहा है कि शिक्षा को दुकान और नियुक्ति को सौदा बनाने की कीमत आखिरकार बेहद भारी पड़ती है।कॉलेज प्रबंधक बाबू खान आज जिस जाल में फँसे हैं, वह किसी एक दिन का बनाया हुआ नहीं है—यह वर्षों से चल रही उस महत्वाकांक्षा का परिणाम है जिसमें कानून को ठोकर पर रखकर “सबको खुश करने” की कोशिश की जाती है, और अंत में कोई भी नहीं बचता—ना संस्था, ना प्रबंधक और ना ही वे शिक्षक जिनसे रुपये लेकर नियुक्तियाँ बाँटी गईं।
डीआईओएस का अस्वीकार, हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी और अब सुप्रीम कोर्ट का रास्ता
6 जुलाई 2019 को डीआईओएस ने स्पष्ट आदेश में कहा था कि—नियुक्ति प्रक्रिया समयबद्ध नहीं थी
शासनादेश 12 मार्च 2018 के मानकों का पालन नहीं हुआ चयन प्रक्रिया पारदर्शिता से रहित थी
डीआईओएस ने 21 एल.टी. ग्रेड शिक्षकों की नियुक्ति अस्वीकृत कर दी।इसके बाद प्रबंधक और चयनित शिक्षक सभी अदालत पहुँच गए।8 सितम्बर 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन नियुक्तियों को पूर्णतः निरस्त कर दिया।तीन शिक्षकों ने डबल बेंच में याचिका लगाई, पर अंतिम राहत नहीं मिली।
अब पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर जाने के लिए विवश है।यह स्थिति ही बताती है कि किसी गैरकानूनी निर्णय की उम्र अधिक नहीं होती—चाहे वह कितने ही प्रभावशाली लोगों द्वारा क्यों न लिया गया हो
बब्बू खान कहाँ फँसे?
खैर इंटर कॉलेज के प्रबंधक को लगा कि—अपने प्रभाव और पुराने नेटवर्क पर भरोसा कर नियुक्ति प्रक्रिया को “मनमर्जी” से चलाया जा सकता है नियमों को ताक पर रखकर “समस्या बाद में देख लेंगे” वाली राजनीति यहाँ भी चल जाएगी,जिन शिक्षकों से मोटी रकम लेकर नियुक्तियाँ दे दी गईं, उनका मामला किसी तरह दब जाएगा लेकिन शिक्षा विभाग काग़ज़ और प्रक्रिया पर चलता है, न कि रसूख पर।जब नियुक्ति में समयसीमा, विज्ञापन, चयन समिति की वैधता, शासनादेश पालन, सब कुछ संदिग्ध पाया गया—तो पूरा ढाँचा ढह गया।आज स्थिति यह है कि—शिक्षक नियुक्ति खो रहे हैं
शिक्षक का भविष्य अधर में है कॉलेज की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई,और प्रबंधक बाबू खान पर प्रशासनिक अविश्वास की मोटी रेखा खिंच चुकीहै.सबको धोखा, और अंत में—सबसे बड़ा नुकसान खुद को,यह प्रकरण केवल प्रशासनिक भ्रष्टाचार नहीं बल्कि सामाजिक नैतिकता का भी प्रश्न है।बाबू खान ने—सरकार को धोखा दिया
विभाग को धोखा दिया,नियुक्ति चाहने वाले शिक्षकों को धोखा दिया,और अंत में—अपने संकाय, समाज और खुद की विश्वसनीयता को भी खो दिया,यही वो बिंदु है जो साफ़ करता है—
अति महत्त्वाकांक्षा, जब नियम-विरुद्ध हो जाए, तो उसका अंत हमेशा विनाश में होता है।
यह केवल खैर कॉलेज की कहानी नहीं—पूरा सिस्टम चेतावनी दे रहा है,प्रदेश के कई अल्पसंख्यक संस्थानों में ऐसे ही मामलों के कारण—छात्र नुकसान उठा रहे हैंयोग्य शिक्षक अवसर खो रहे हैं
शिक्षा विभाग पर अविश्वास बढ़ता है,और राजनीति, प्रबंधन का खेल बन जाता है
शिक्षा मंदिर है, सौदेबाज़ी की मंडी नहीं।
जब मंदिर में ही दलाली शुरू हो जाए, तो भगवान भी चुप नहीं रहते—कानून का डंडा उसी का रूप ले लेता है।जनता के लिए संदेश,यह मामला बताता है कि—कानून से बड़ा कोई नहींप्रक्रिया से भागने वाले अंत में पकड़ लिए जाते हैं,,शिक्षा में भ्रष्टाचार, सबसे बड़ा राष्ट्रीय अपराध है,और जो “नाम बनाने” के लालच में नियम तोड़ते हैं, परिणाम इतने कठोर आते हैं कि नाम ही धूमिल हो जाता है
यह शिक्षा जगत का आईना है,खैर इंटर कॉलेज प्रकरण बताता है कि—सही रास्ता कठिन होता है,
पर गलत रास्ता खाई में ले जाता है।अब न शिक्षक चैन में हैं, न प्रबंधन,और न ही संस्था का गौरव बचा है।
बाबू खान के लिए रास्ता अब सिर्फ एक है—सुप्रीम कोर्ट,और समाज के लिए सबक सिर्फ एक—
नियुक्ति में ईमानदारी, ही शिक्षा की असली नींव है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें