दीपावली भारत का सर्वश्रेष्ठ सांस्कृतिक, वैदिक और आध्यात्मिक पर्व है, जो अंधकार से प्रकाश, अज्ञान से ज्ञान और भूल से सत्य की ओर ले जाने का प्रतीक है। वैदिक और पौराणिक परंपराओं में यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि मानव आत्मा के जागरण का प्रतीक माना गया है।वैदिक दृष्टि से महत्वऋग्वेद का आरंभ “अग्निमीले पुरोहितम्” मंत्र से होता है, जो अग्नि को प्रकाश और ज्ञान का वाहक बताता है । उपनिषदों के “तमसो मा ज्योतिर्गमय” मंत्र का सार यही है कि मनुष्य अंधकार यानी अविद्या से मुक्त होकर आंतरिक ज्योति को पहचान सके । दीपक का प्रज्ज्वलन इसी वैदिक संस्कृति का अनुकरण है, जिसमें अग्नि को देवताओं तक पहुँचाने वाला माध्यम माना गया है ।पौराणिक संदर्भभगवान राम के 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने की खुशी में दीपावली मनाने का उल्लेख रामायण में मिलता है । महाभारत के अनुसार पांडवों के अज्ञातवास के बाद वापसी की स्मृति में भी दीपमालाएं जलाई गईं । वहीं एक अन्य कथा के अनुसार, समुद्र मंथन से इसी दिन धन की देवी लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था, अतः इस दिन लक्ष्मी पूजा की परंपरा शुरू हुई ।पूर्व भारत में यह दिन देवी काली की आराधना का अवसर होता है, जिसे ‘काली पूजा’ कहा जाता है । जैन धर्म में इसे महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस के रूप में और सिख धर्म में “बंदी छोड़ दिवस” के रूप में मनाया जाता है ।आध्यात्मिक अर्थआध्यात्मिक दृष्टि से दीपावली का प्रत्येक दीप आत्मा की ज्योति का प्रतीक है, जो चेतना, सत्य और धर्म का मार्ग दर्शाता है । यह आत्मसाधना का पर्व है जो बताता है कि एक दीपक अपने से अंधकार मिटाकर अन्य दीपों को भी प्रज्ज्वलित करता है, उसी प्रकार एक ज्ञानी व्यक्ति अपने ज्ञान से समाज को आलोकित करता है ।दीप जलाना केवल सजावट नहीं बल्कि आत्मा की उस आंतरिक ज्योति की पुष्टि है जो अज्ञान, ईर्ष्या, अहंकार और लोभ को जलाकर मनुष्य को पूर्णता की ओर ले जाती है । यह आत्म-संयम, सत्य, करुणा और धर्म के पालन की प्रेरणा देता है ।सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूपदीपावली का उत्सव पाँच दिनों तक चलता है—धनतेरस, नरक चतुर्दशी, लक्ष्मी पूजा, गोवर्धन पूजा और भाई दूज । हर दिन का अपना प्रतिकात्मक अर्थ है—स्वास्थ्य, शुद्धि, समृद्धि, कृतज्ञता और स्नेह। इस अवसर पर घरों की सफाई, सजावट और दीप प्रज्ज्वलन का अर्थ केवल बाहरी सौंदर्य नहीं बल्कि आंतरिक स्वच्छता का प्रतीक भी है ।यह पर्व व्यापारियों के लिए नए वर्ष के आरंभ का प्रतीक है और गृहस्थों के लिए आर्थिक एवं आध्यात्मिक संतुलन का अवसर। लक्ष्मी और गणेश की संयुक्त पूजा मानव को सिखाती है कि विवेक (गणेश) के बिना धन (लक्ष्मी) स्थायी नहीं रह सकता ।सार्वभौमिक संदेशदीपावली धर्म से परे आस्था का उत्सव है—सच्चाई, करुणा, ज्ञान और एकता का प्रतीक। यह हमें सिखाती है कि जैसे प्रकाश अंधकार का अंत करता है, वैसे ही सत्य और धर्म से अन्याय का नाश होता है ।यह पर्व मानवता का, आशा का और आत्मबल का प्रतीक है—जब हर हृदय में दीप प्रज्ज्वलित होता है, तब समाज सामूहिक आलोक में जगमगाता है। अतः दीपावली केवल दीपों की पंक्ति नहीं, बल्कि आत्मा और ब्रह्म के मिलन का महामहोत्सव है, जो जीवन को लौकिक और पारलौकिक दोनों स्तरों पर प्रकाशित करता है.
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रविवार, 19 अक्टूबर 2025
तमसो मा ज्योतिर्गमय, दीपावली परमात्तम अध्यात्म और लौकिक महत्व 🙏
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# दीपावली का वैदिक महत्व
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About राजेंद्र नाथ तिवारी
दीपावली का वैदिक महत्व
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कौटिल्य का भारत दैनिक के संपादक एवं प्रकाशक राजेंद्र नाथ तिवारी भारत–नेपाल संबंधों के प्रखर विश्लेषक और राष्ट्रवादी विचारधारा के मुखर प्रतिनिधि हैं। भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय सुरक्षा और सनातन चेतना पर उनके चिंतन को व्यापक सम्मान मिला है। कबीर सम्मान प्राप्त तिवारी कई महत्वपूर्ण पुस्तकों के लेखक हैं। उनके विचार, लेखन और वक्तव्य राष्ट्रगौरव, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और भारत @2047 की दृष्टि को सशक्त रूप से प्रेरित करते हैं।
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