जब तक सीता को उचित सम्मान नहीं मिलता, तब तक राम-राज्य अधूरा है
राजेन्द्र नाथ तिवारी, 272001
जब तक सीता को उचित सम्मान नहीं मिलता, तब तक राम-राज्य अधूरा है,राम-राज्य—हमारे सामूहिक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कल्पनों का एक ऐसा आदर्श है जो न्याय, नैतिकता और शासकीय कर्तव्य का परिचायक माना जाता है। परंतु जब हम इस शब्द को मात्र एक आदर्श वाक्य या राजनैतिक नारे तक सीमित कर देते हैं, हम उसकी गहराई खो देते हैं। राम-राज्य का असली मानक यह नहीं कि शहर स्वच्छ हैं, कर व्यवस्था सुव्यवस्थित है या कानून लागू होते हैं; असली मानक यह है कि समाज अपनी सबसे नाजुक आवाज़ों—उनकी गरिमा, सुरक्षा और सम्मान—को किस तरह सुनता और संरक्षित करता है। और यदि सीता, जो सत्य और धैर्य की प्रतिमूर्ति है, को उचित सम्मान न मिले, तो उस राम-राज्य की आत्मा ही अधूरी है।सीता का प्रश्न कालजयी है। रामायण में उसके साथ हुए घटनाक्रमों ने सदियों से हमारी नैतिक बहसें और सामाजिक मानदण्ड प्रभावित किए हैं। पर इस कथानक का शाब्दिक पढ़ना ही पर्याप्त नहीं; उसे एक प्रतीकात्मक और व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य दोनों से देखना ज़रूरी है। सीता वह हर महिला है जिसे समाज ने कभी — प्रत्यक्ष या वैधानिक रूप से — अपमानित, बेवकूफ़ या दोषी ठहराया; वह वह हर व्यक्ति है जिसकी पीड़ा को तुच्छ मान लिया गया। जब राम-राज्य इन पीड़ितों के सम्मान की रक्षा में विफल रहता है, तब वह केवल एक पौराणिक कल्पना बनकर रह जाता है।समाज के स्तर पर यह विफलता कई रूप लेती है:सांस्कृतिक नॉर्म्स जो महिलाओं की आवाज़ को छोटा कर दें या उनके अनुभवों को अनदेखा कर दें।
कानूनी ढाँचे जिनमें प्रक्रियाएँ लंबी, अपमानजनक या असमान हों; प्रवृत्ति जो पीड़ित को बदतर स्थिति में डाल दे।आर्थिक और शैक्षिक असमानताएँ जो महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने से रोकती हैं, जिससे वे असुरक्षित बनी रहती हैं।मीडिया और सार्वजनिक विमर्श जो दोषारोपण, कलंक या शोषक रूढ़ियों को दोहराते हैं और संवेदनशीलता का अभाव दिखाते हैं।इनमें से हर एक आयाम राम-राज्य की सच्ची प्रकृति पर सवाल उठाता है। आदर्श तभी सच्चा होगा जब वह संस्थागत और व्यक्तिगत दोनों स्तरों पर परीक्षण में खरा उतरे। सिर्फ प्रतीकात्मक सम्मान, मंदिरों में पूजा या ऐतिहासिक कथाओं की महिमा करना पर्याप्त नहीं — सम्मान वह व्यवहार है जो रोज़ाना के फैसलों, नीतियों और संस्कारों में दिखाई देता है।सतही सुधारों पर निर्भर रहकर हम केवल आभास बदलते हैं। असली परिवर्तन तब होता है जब हम संरचनात्मक असमानताओं की जड़ तक पहुँचकर उन्हें बदलते हैं:शिक्षा में परिवर्तन: स्कूलों और कॉलेजों में लैंगिक संवेदनशीलता और सम्मान पर प्रशिक्षण अनिवार्य करना। बच्चों को समानता और सहानुभूति के सिद्धांत सिखाना ताकि अगली पीढ़ी में स्वाभाविक रूप से गरिमा का सम्मान अंकित हो।न्याय प्रणाली के सुधार: पीड़ितों के लिए त्वरित, संवेदनशील और सम्मानजनक प्रक्रियाएँ। मान-हानि और शील-ह्रास से जुड़ी सुनवाईयों से बचाने के उपाय। कानूनी सहायता और संरक्षण के वास्तविक साधन।आर्थिक सशक्तिकरण: महिलाओं को जीवन-निर्वाह और निर्णय लेने की क्षमता देने वाले अवसर—रोज़गार, सक्षम वित्तीय पहुँच, संपत्ति अधिकार—ताकि वे निर्भरता की स्थितियों से बाहर निकल सकें।सामाजिक-राजनैतिक जिम्मेदारी: सरकारी नीतियाँ और राजनीतिक नेतृत्व स्पष्ट नीतिगत प्रतिबद्धता दिखाएं—डांटिंग बयानबाज़ी नहीं, बल्कि विनिर्माण-स्तर की योजनाएँ और उनके सक्षम क्रियान्वयन।मीडिया और सार्वजनिक विमर्श की ज़िम्मेदारी: रिपोर्टिंग में सहानुभूति और निष्पक्षता; हिंसा और उत्पीड़न की कहानियों को न करना; नायक-नायिकाओं के क्लिच्ड चित्र से परे वास्तविक मानव अनुभव प्रस्तुत करना।
इन नीतिगत और व्यवहारिक सुधारों के साथ-साथ सामाजिक चेतना का परिवर्तन भी अनिवार्य है। सहानुभूति पर आधारित संस्कृति का निर्माण तभी संभव है जब हम परंपरागत पुरुषत्व के सख्त मॉडलों, लज्जा-आधारित कलंक और चुप्पी के सांस्कृतिक दबाव को चुनौती दें। सम्मान देने का अर्थ केवल बाहरी व्यवहार नहीं है—यह आंतरिक पहचान का भी सवाल है: किसी के अनुभव को मानना, उसकी पीड़ा को तुच्छ न समझना, और उसके साथ इंसाफ़ की व्यवहारिक रूपरेखा स्थापित करना।राम की व्यक्तित्व-छवि और राम-राज्य की अवधारणा तब तक सार्थक नहीं रह सकती जब तक राम स्वयं की भूमिका के अर्थ पर प्रश्न न उठे। क्या राम का नायकत्व केवल नियमों और परंपराओं के पालन में निहित है? या उसका असली परख इस बात में है कि वह जब गलतियों का सामना करे तब न्याय और गरिमा के लिए विरोध करने, सुधार करने और जवाबदेही स्वीकार करने का साहस दिखाए?
सच्चा नेतृत्व उसी कार्य में दिखता है: जब नेता अपने प्रिय जन की तकलीफ़ और सामाजिक असंतुल्यताओं को पहचानते हुए समय पर निर्णय लेते हैं, और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा बचाने के लिए सच्चाई की बलि नहीं चढ़ाते।यह विषय व्यक्तिगत और सार्वजनिक दोनों स्तरों पर संघर्ष चाहता है। परिवारों में यह दृष्टिकोण जरूरी है—घर के निर्णयों में महिलाओं की सहमति और स्वायत्तता का सम्मान। समुदायों में यह जरूरी है—युवाओं को समानता और सहानुभूति की शिक्षा। संस्थानों में यह जरूरी है—कठोर नीतियाँ और उनके निष्पादन। और राष्ट्र-स्तर पर यह जरूरी है—ऐसी राजनीति जो मुद्दों को उपयुक्त प्राथमिकता दे। जब तक इन स्तरों पर समन्वित प्रयास नहीं होंगे, तब तक राम-राज्य का वादा अधूरा रहेगा।अंततः, सीता को सम्मान देना केवल एक नैतिक फ़र्ज़ नहीं; यह सामाजिक बुद्धिमत्ता और दीर्घकालिक स्थिरता का प्रश्न है। समाज जो अपने कमजोर सदस्यों के सम्मान की रक्षा करता है, वह अधिक न्यायसंगत, अधिक स्थायी और अधिक मानवीय होता है। राम-राज्य तभी पूर्ण होगा जब वह संवेदनशीलता, साहस और जवाबदेही का पर्याय बने — और यह तब ही संभव है जब सीता जैसे हर व्यक्ति को न सिर्फ औपचारिक बल्कि वास्तविक, रोज़मर्रा के सम्मान के रूप में स्थान मिले।इस निबन्ध का समापन एक चुनौती और आह्वान है: इतिहास और परंपरा के आदर्शों को केवल यादगार कथाओं तक सीमित न रखें; उन्हें अपने वर्तमान व्यवहार, नीतियों और निर्णयों में साकार कीजिए। सीता के सम्मान से ही राम-राज्य की पूर्णता नापी जाएगी—और यदि हम वास्तव में वह समाज चाहते हैं जिसकी कल्पना हमारी पीढ़ियाँ करती आई हैं, तो निस्संदेह, हमें इस काम को अभी, आज से, शुरू करना होगा।
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