पौराणिक-सांस्कृतिक आख्यान श्रृंखला
सीतायण
तृतीय अध्याय : स्वयंवर — शिव-धनुष का टूटना और मिथिला का गौरव
मिथिला की धरती पर एक ऐसा प्रभात उगा, जो युगों तक स्मरण किया जाएगा। जनकपुर की गलियाँ, जो कल तक साधारण उत्सव की सजावट में लिपटी थीं, आज असाधारण नियति की साक्षी बनने को उद्यत थीं। राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के लिए जो प्रतिज्ञा रखी थी, वह कोई साधारण शर्त नहीं थी — वह मानो सृष्टि की कसौटी थी, यह जाँचने की कसौटी कि शक्ति और शील का संतुलन साधने वाला पुरुष पृथ्वी पर शेष है भी या नहीं। शिव-धनुष, जो सैकड़ों वर्षों से मिथिला के राजकोष में मौन पड़ा था, स्वयं एक प्रश्नचिह्न बन चुका था। बड़े-बड़े राजाओं, महारथियों और अहंकार से भरे वीरों ने उसे उठाने का साहस किया और लौटे तो केवल अपमान की गठरी लेकर। यह धनुष केवल भार से भारी नहीं था — वह उस मर्यादा से भारी था, जिसे उठाने के लिए बाहुबल नहीं, आत्मबल चाहिए था।
इतिहास साक्षी है कि जब-जब सत्ता ने बल को ही सर्वोच्च माना है, तब-तब सभ्यताएँ खोखली होकर ढह गई हैं। किंतु मिथिला की यह परीक्षा किसी सत्ता-लोलुपता की उपज नहीं थी — यह उस सांस्कृतिक चेतना की देन थी, जो शासक में केवल शक्ति नहीं, संयम भी माँगती थी। राजा जनक स्वयं दार्शनिक थे, विदेह कहलाते थे — देह के बंधनों से परे — और उनकी यह प्रतिज्ञा उनके ही जीवन-दर्शन का विस्तार थी।
सभा का दृश्य : अहंकार की परीक्षा::स्वयंवर सभा में जब एक-एक कर देशों के नरेश आगे बढ़े, तो जनकपुर की प्रजा ने प्रथम बार देखा कि सत्ता का दंभ और वास्तविक सामर्थ्य में कितना बड़ा अंतर होता है। मुकुट पहनने से कोई सम्राट नहीं बनता, यह सत्य उस दिन धनुष के अडिग रहने से बार-बार सिद्ध हुआ। राजा जनक की आँखों में जो चिंता थी, वह पिता की चिंता कम, आर्यावर्त के भविष्य की चिंता अधिक थी — क्या इस मृत्युलोक में अब भी ऐसा तेज शेष है, जो प्रण को प्रतिष्ठा से ऊपर रखे?एक-एक कर वे राजा, जो अपनी सेनाओं और स्वर्ण-रथों के दंभ में सभा में प्रविष्ट हुए थे, धनुष के समक्ष नतमस्तक होकर लौट गए। किसी ने बल-प्रदर्शन में अपनी समस्त शक्ति झोंक दी, किसी ने मंत्र-तंत्र का सहारा लिया, किसी ने क्रोध में धनुष को शाप तक दे डाला। किंतु धनुष अडिग रहा — मानो वह प्रत्येक असफल प्रयास से यह उद्घोषित कर रहा हो कि अहंकार, चाहे वह कितना भी विशाल क्यों न हो, मर्यादा के समक्ष सदैव बौना ही रहता है। सभा में उपस्थित हजारों नेत्र अब निराशा और आशंका के मिश्रित भाव से एक-दूसरे को देखने लगे थे।
तभी, सभा के एक कोने से, बिना किसी घोषणा या आडंबर के, दो तेजस्वी युवक आगे बढ़े। उनके साथ न सेनाओं की गर्जना थी, न स्वर्ण-आभूषणों की चमक। था तो केवल एक गुरु के प्रति समर्पण और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा। राम, जिनका रूप शांत था किंतु नेत्रों में एक अलौकिक दृढ़ता थी, गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से धनुष की ओर बढ़े। लक्ष्मण, जो अपने अग्रज की छाया की भाँति सदैव उनके साथ रहते थे, उस क्षण मानो सम्पूर्ण सृष्टि की साँसें रुक गई हों, ऐसी शांति में खड़े थे। गुरु विश्वामित्र, जिन्होंने राम को ताड़का-वध से लेकर यज्ञ-रक्षा तक अनेक कठिन परीक्षाओं से निखारा था, जानते थे कि यह क्षण केवल एक धनुष उठाने का नहीं, अपितु उस संपूर्ण तपस्या के फलीभूत होने का था, जो उन्होंने राम में वर्षों तक सींची थी। उनकी दृष्टि में संतोष था, किंतु मुख पर वही तपस्वी-गंभीरता, जो किसी भी परिणाम से पूर्व विचलित नहीं होती।“जो शक्ति विनम्रता से निकलती है, वही सृष्टि को धारण करने योग्य होती है — शेष सब भार है, बल नहीं।”
धनुष का टूटना : मर्यादा की उद्घोषणा::राम ने धनुष को स्पर्श किया — न अहंकार से, न प्रदर्शन की भूख से, अपितु उस सहजता से, जैसे कोई पुत्र अपने पिता के आशीर्वाद को छूता है। उन्होंने धनुष को उठाया, प्रत्यंचा चढ़ाई, और फिर, एक क्षण में, जो ध्वनि सम्पूर्ण मिथिला में गूँजी, वह केवल काष्ठ और प्रत्यंचा के टूटने की ध्वनि नहीं थी — वह उस युग की उद्घोषणा थी कि सच्चा नेतृत्व बल-प्रदर्शन से नहीं, संयम और धर्म से उपजता है। उस निनाद ने न केवल मिथिला की प्राचीरों को, अपितु दूर-दूर तक तपस्यारत ऋषियों के आश्रमों को भी कंपायमान कर दिया। जनश्रुति है कि उस ध्वनि को सुनकर परशुराम, जो स्वयं शिव-धनुष के परम भक्त थे, क्रोधित होकर सभा में पधारे — यह प्रसंग स्वयं इस बात का प्रमाण है कि यह घटना कोई साधारण प्रतियोगिता नहीं, अपितु दो युगों — भार्गव-परंपरा के प्रचंड क्रोध और राम-मर्यादा की शांत दृढ़ता — के मिलन का सूत्रपात थी। राम ने उस क्रोध का सामना भी उसी विनम्रता से किया, जिससे उन्होंने धनुष उठाया था, और यही उनकी सबसे बड़ी विजय थी। यह घटना केवल एक विवाह-प्रसंग नहीं, भारतीय सभ्यता के उस मूल दर्शन का प्रतीक है, जहाँ शक्ति को शील की सेवा में लगाया जाता है, न कि शील को शक्ति की दासी बनाया जाता है। सीता, जो अब तक मौन खड़ी इस परीक्षा को देख रही थीं, उनके नेत्रों में जो संतोष उभरा, वह केवल एक वर के मिलने का संतोष नहीं था — वह इस विश्वास की पुनर्स्थापना का संतोष था कि धरती पर धर्म अभी जीवित है। गौर करने योग्य है कि सीता के लिए यह क्षण केवल प्रतीक्षा का नहीं, अपितु गहन अंतर्द्वंद्व का भी था। भूमि-पुत्री, जो स्वयं धरती से प्रकट हुई थीं, जानती थीं कि उनका वर कोई साधारण राजकुमार नहीं, अपितु उस मर्यादा का साकार रूप होगा, जिसे उन्होंने बचपन से अपने पिता के दर्शन में देखा था। जब उन्होंने राम के मुख पर वह अडिग शांति देखी, तो मानो उनकी वर्षों की प्रतीक्षा एक क्षण में सार्थक हो गई।
सीता का चयन : स्वतंत्र इच्छा का सम्मान:: स्वयंवर की परंपरा स्वयं इस बात की गवाह है कि प्राचीन भारत में स्त्री की इच्छा और गरिमा को केंद्रीय स्थान प्राप्त था — यह कोई पश्चिमी अवधारणा नहीं, अपितु हमारी अपनी सांस्कृतिक जड़ें है सीता ने जयमाला राम के गले में केवल विजय के कारण नहीं डाली, अपितु उस मर्यादा-पुरुषोत्तम गुण के प्रति आकर्षित होकर डाली, जो राम के प्रत्येक कर्म में झलकता था। यह प्रसंग स्मरण कराता है कि नारी सशक्तिकरण कोई आधुनिक आविष्कार नहीं — यह हमारे पुराणों में सहस्रों वर्ष पूर्व से अंकित मूल्य है, जिसे हमें पुनः आत्मसात करना है। राजा जनक ने भी इस अवसर पर यह स्पष्ट किया कि विवाह कोई राजनीतिक सौदा नहीं, अपितु दो आत्माओं के मध्य वह सेतु है, जो गुण और चरित्र की कसौटी पर ही बनना चाहिए — सत्ता, धन अथवा कुल की महत्ता इसमें गौण है। सखियों के मध्य खड़ी सीता का वह लजाया किंतु दृढ़ मुस्कान, जो उन्होंने जयमाला अर्पण के क्षण धारण की थी, आज भी भारतीय चित्रकला और लोकगीतों में उस आदर्श क्षण के प्रतीक रूप में अमर है, जब नारी का विवेक और हृदय दोनों एकमत हो जाते हैं।
अयोध्या से आगमन : पिता का हर्ष, राष्ट्र का उल्लास:: जब यह मंगल-समाचार दूत द्वारा अयोध्या पहुँचा, तो राजा दशरथ की वृद्ध आँखों में जो अश्रु छलके, वे केवल पितृ-स्नेह के नहीं थे — वे इस संतोष के भी थे कि उनके पुत्रों ने कुल की मर्यादा को नए शिखर तक पहुँचाया है। समस्त अयोध्या में उत्सव की लहर दौड़ पड़ी। राजा दशरथ स्वयं अपने मंत्रियों, कुल-गुरु वशिष्ठ और विशाल बारात के साथ मिथिला की ओर प्रस्थान कर गए, क्योंकि यह अवसर केवल राम का नहीं, अपितु उनके तीनों अन्य पुत्रों — भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न — के विवाह का भी संयोग बना, जब उर्मिला, माण्डवी और श्रुतकीर्ति क्रमशः इन भ्राताओं की जीवन-संगिनी बनीं। यह चतुर्विध विवाह-प्रसंग स्वयं में इस बात का प्रतीक है कि रघुकुल और मिथिला के मध्य जो सम्बन्ध स्थापित हुआ, वह केवल एक पीढ़ी का नहीं, अपितु दो सभ्यताओं के संपूर्ण भावी सम्बन्धों की आधारशिला थी। वैदिक मंत्रोच्चार के मध्य, अग्नि को साक्षी मानकर जब यह चारों जोड़े परिणय-सूत्र में बँधे, तो उपस्थित हजारों प्रजाजनों ने अनुभव किया कि वे किसी साधारण उत्सव के नहीं, अपितु इतिहास के एक स्वर्णिम अध्याय के साक्षी बन रहे हैं।
जनकपुर का उल्लास : राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक::जब यह समाचार मिथिला की सीमाओं से बाहर फैला, तो केवल जनकपुर ही नहीं, अपितु अयोध्या से लेकर काशी तक के लोगों में एक नई आशा का संचार हुआ। यह विवाह मात्र दो राजवंशों का मिलन नहीं था — यह दो आदर्शों का, दो संस्कृतियों की श्रेष्ठताओं का, ऐसा संगम था, जिसने आने वाली पीढ़ियों के लिए मर्यादा की एक अमिट परिभाषा गढ़ दी। मिथिला की सड़कों पर दीप जले, तोरणद्वार सजे, और नगरवासियों ने अपने घरों को पुष्प-वंदनवारों से अलंकृत किया। यह उल्लास केवल राजसी आयोजन का उल्लास नहीं था — यह उस सामूहिक चेतना का उद्घोष था, जिसने अनुभव किया कि उनकी राजकुमारी को वह वर मिला है, जो उसके योग्य है। लोकगीतों में आज भी इस प्रसंग की गूँज सुनाई देती है — बिहार और पूर्वांचल के विवाह-उत्सवों में गाए जाने वाले सोहर और मंगल-गीत इसी स्मृति की अमर धरोहर हैं, जो सिद्ध करते हैं कि यह घटना केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रही, अपितु जन-जन के हृदय में रच-बस गई। आज जब हम अपने समाज में मूल्यों के क्षरण की चर्चा करते हैं, तो सीतायण का यह अध्याय हमें बार-बार यह स्मरण कराने के लिए पर्याप्त है कि सच्चा नेतृत्व वही है, जो प्रण निभाए, विनम्रता से शक्ति को साधे और स्त्री की गरिमा को अपने पौरुष से ऊपर रखे। यही वह भारत है, जिसे हमें पुनः जागृत करना है — कौटिल्य के इस भारत में।
वर्तमान संदर्भों में देखें, तो यह प्रसंग हमारे नीति-निर्माताओं, प्रशासकों और नेतृत्व की भूमिका में बैठे प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक दर्पण है। सत्ता का प्रदर्शन नहीं, अपितु सत्ता के भीतर संयम — यही वह गुण है, जो किसी शासक को वास्तविक अर्थों में जननायक बनाता है। जब तक हमारे समाज का नेतृत्व शिव-धनुष उठाने वाले राम की भाँति विनम्रता को अपना आभूषण नहीं बनाएगा, तब तक सच्चे अर्थों में सुशासन की कल्पना अधूरी ही रहेगी।
शिव-धनुष का टूटना केवल एक भौतिक घटना नहीं थी, यह उस शाश्वत सत्य की मुखर घोषणा थी कि इतिहास सदैव उन्हीं के हाथों रचा जाता है, जो शक्ति के साथ शील को, वीरता के साथ विनम्रता को, और अधिकार के साथ कर्तव्य को साथ लेकर चलते हैं। सीतायण की यह गाथा हमें बताती है कि मिथिला का गौरव केवल उसके स्वर्ण-कोष में नहीं, अपितु उसकी उस पुत्री के आत्मबल में था, जिसने संसार को सिखाया कि सच्चा चयन वही है, जो हृदय और धर्म दोनों से स्वीकृत हो।
राजेन्द्र नाथ तिवारी 272001

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