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सीतायण

अद्भुत सत्य विशेषांक

सीता के दिव्य रहस्य — वाल्मीकि, अद्भुत रामायण, अध्यात्म रामायण, कम्ब रामायण एवं अन्य परंपराओं के आलोक में



जनकपुर से जगद्गुरु भारत @2047

कौटिल्य का भारत दैनिक

भूमिका — क्यों आवश्यक हैं ये अद्भुत सत्य?


भारतीय जनमानस में सीता की छवि प्रायः अत्यंत संकुचित रूप में स्थापित हो गई है — मौन सहनशीलता, निरंतर परीक्षा और अंततः त्याग की प्रतिमूर्ति। यह छवि पूर्णतः असत्य नहीं, किन्तु अपूर्ण अवश्य है। वाल्मीकि रामायण से लेकर अद्भुत रामायण, अध्यात्म रामायण, आनंद रामायण और दक्षिण भारत की समृद्ध काव्य-परंपराओं तक — प्रत्येक ग्रंथ सीता के चरित्र की एक नई परत खोलता है, जिनमें से अधिकांश आधुनिक लोकचेतना में विस्मृत हो चुकी हैं।

इस विशेषांक में हम तेरह ऐसे अद्भुत सत्यों का संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं जो सीता को केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, अपितु भारतीय सभ्यता की जीवंत आदि शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि प्रत्येक तथ्य का स्रोत-ग्रंथ पृथक् रूप से उद्धृत किया गया है — वाल्मीकि की प्रामाणिक संहिता को परवर्ती पुराण-परंपराओं के साथ कहीं भी मिश्रित नहीं किया गया है। यही सीतायण की मौलिक कार्यपद्धति रही है, और इसी अनुशासन के साथ यह विशेषांक भी प्रस्तुत है।


सत्य 1 — भूमिजा और अयोनिजा: सीता की अलौकिक उत्पत्ति


सीता का जन्म सामान्य मानवीय जन्म-प्रक्रिया से नहीं हुआ — यह स्वयं वाल्मीकि रामायण का प्रत्यक्ष कथन है। मिथिला-नरेश जनक जब यज्ञ हेतु भूमि जोत रहे थे, तब हल की नोक से भूमि विदीर्ण हुई और उसी विदर से एक कन्या प्रकट हुई। यह घटना सीता को 'भूमिजा' और 'अयोनिजा' — अर्थात् गर्भ से नहीं, धरती से उत्पन्न — सिद्ध करती है। यह तथ्य आधुनिक जनमानस में प्रायः अल्पचर्चित रहता है, जबकि यह सीता की मौलिक पहचान का आधार-स्तंभ है।

अथ मे कृषतः क्षेत्रं लाङ्गलादुत्थिता ततः।

क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता।।

अर्थ: हल से भूमि जोतते समय हल की रेखा से यह कन्या प्रकट हुई; भूमि-शोधन के समय प्राप्त होने के कारण इसका नाम 'सीता' (हल-रेखा) पड़ा।

— वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग 66


इस श्लोक में एक और अद्भुत सत्य छिपा है — सीता का नामकरण किसी दैवी संकेत या ज्योतिषीय गणना से नहीं, अपितु उस कर्म से हुआ जिसमें वे प्रकट हुईं। 'सीता' शब्द का शाब्दिक अर्थ ही 'हल-रेखा' है। इस प्रकार सीता का नाम स्वयं भूमि, कृषि और सृजन से जुड़ा है — वे किसी राजकुमारी के रूप में नहीं, धरती की सन्तान के रूप में जगत् में आईं। पुराण-परंपरा में इसी आधार पर सीता को भूदेवी (पृथ्वी) का साक्षात् स्वरूप माना गया है, और यही कारण है कि उनका अंतिम प्रस्थान भी भूमि में समाहित होकर हुआ — जन्म और अंत, दोनों भूमि से।

जो धरती से उपजी, वह धरती में ही लौट गई — सीता का जीवन-चक्र स्वयं एक भौगोलिक और आध्यात्मिक रूपक है।


सत्य 2 — वेदवती का पुनर्जन्म: सीता के पूर्वजन्म का रहस्य


उत्तरकाण्ड-परंपरा और अद्भुत रामायण दोनों में एक कथा मिलती है जो सीता के चरित्र को और गहराई देती है — वेदवती की कथा। वेदवती एक तपस्विनी थीं जो विष्णु को पति रूप में पाने हेतु घोर तप कर रही थीं। रावण ने उनका अपमान करने का प्रयत्न किया, जिस पर वेदवती ने स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया और शाप दिया कि वे पुनर्जन्म लेकर रावण के विनाश का कारण बनेंगी। यही वेदवती आगे चलकर सीता के रूप में अवतरित हुईं। यह कथा वाल्मीकि की मूल संहिता से भिन्न परंपरा में है, अतः इसे उत्तरकालीन पुराण-परंपरा के रूप में ही ग्रहण करना उचित है, वाल्मीकि के प्रत्यक्ष कथन के समतुल्य नहीं।

इस कथा का महत्त्व यह है कि यह सीता के रावण-वध में निहित भूमिका को जन्मांतरीय स्तर पर स्थापित करती है — रावण का अंत सीता के प्रति किए गए अपराध का ही सुनिश्चित परिणाम था, चाहे वह किसी भी जन्म में क्यों न हो। यह सीता को नियति-निर्धारक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, न कि केवल एक पीड़िता के रूप में — जो सीतायण की मूल दृष्टि से पूर्णतः संगत है।


सत्य 3 — अद्भुत रामायण का सर्वाधिक विस्मयकारी सत्य: सीता स्वयं महाकाली


अद्भुत रामायण की सबसे चौंकाने वाली कथा वह है जिसमें सीता स्वयं युद्ध करती हैं। इस ग्रन्थ के अनुसार, साधारण दशानन रावण से भी भयंकर 'सहस्रमुखी रावण' नामक असुर का सामना राम को करना पड़ता है, और उसके समक्ष स्वयं राम भी शक्तिहीन प्रतीत होने लगते हैं। उस क्षण सीता अपने वास्तविक स्वरूप — महाकाली — में प्रकट होती हैं और सहस्रमुखी रावण का संहार स्वयं करती हैं। यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण में नहीं है; यह विशुद्ध रूप से अद्भुत रामायण की अपनी मौलिक कथा-परंपरा है, और इसे उसी रूप में उद्धृत किया जाना चाहिए, वाल्मीकि की घटना बताकर नहीं।

यह प्रसंग सीतायण की केन्द्रीय दृष्टि — सीता आदि शक्ति हैं, केवल अनुगामिनी नहीं — का सर्वाधिक प्रत्यक्ष शास्त्रीय प्रमाण है। जहाँ लोकचेतना में सीता को प्रायः धैर्य और सहनशीलता की प्रतिमूर्ति तक सीमित कर दिया जाता है, वहीं अद्भुत रामायण स्पष्ट करती है कि वही शक्ति, जब आवश्यक हो, संहारकारी रूप भी धारण कर सकती है। यह प्रसंग नारी-शक्ति के उस प्राचीन भारतीय दर्शन को पुनर्स्थापित करता है जिसमें सृजन और संहार दोनों एक ही स्त्रोत — आदि शक्ति — से उद्भूत माने गए हैं।

जिस शक्ति ने रावण के लिए राम को भेजा, वही आवश्यकता पड़ने पर स्वयं रणभूमि में उतर आई — यही सीता का अद्भुततम सत्य है।


सत्य 4 — छाया सीता: अग्निपरीक्षा के पीछे का गूढ़ रहस्य


अध्यात्म रामायण तथा देवीभागवत जैसे ग्रंथों में एक अत्यंत गूढ़ प्रसंग मिलता है — छाया सीता का। इस परंपरा के अनुसार, रावण द्वारा हरण से पूर्व ही सीता ने स्वयं को अग्निदेव के संरक्षण में सौंप दिया था, और उनकी 'छाया' अर्थात् प्रतिरूप ही अशोक वाटिका में बंदी रहा, जबकि वास्तविक सीता अग्नि-लोक में सुरक्षित रहीं। लंका-विजय पश्चात् अग्नि-परीक्षा के समय यह छाया-रूप पुनः अग्नि में लीन हो गया और वास्तविक सीता प्रकट हुईं। यह कथा वाल्मीकि रामायण में नहीं है — वहाँ अग्निपरीक्षा एक प्रत्यक्ष, अशमित घटना है। अतः यह भेद सदैव स्पष्ट रखा जाना चाहिए।

यह छाया-सीता प्रसंग परवर्ती भक्ति-परंपरा में इसलिए लोकप्रिय हुआ क्योंकि इसने अग्निपरीक्षा के औचित्य पर उठने वाले प्रश्नों को एक आध्यात्मिक व्याख्या प्रदान की। परन्तु सीतायण की दृष्टि से यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वाल्मीकि की मूल कथा में सीता स्वयं अपनी अग्निपरीक्षा को अस्वीकार करते हुए राम के समक्ष तीव्र प्रतिरोध व्यक्त करती हैं — यह उनका मौलिक तेज है, जिसे छाया-सिद्धांत भी न्यूनतम नहीं कर सकता।


सत्य 5 — बाल सीता और शिव-धनुष: आनंद रामायण का अनूठा प्रसंग


आनंद रामायण की परंपरा में एक अत्यंत मनोहर एवं अद्भुत प्रसंग वर्णित है — बाल्यावस्था में सीता ने खेल-खेल में उसी शिव-धनुष को, जिसे उठाना बड़े-बड़े राजाओं के लिए असंभव था, एक हाथ से उठाकर स्थान से हटा दिया था, यह न जानते हुए कि यह कितना असाधारण कृत्य है। जनक ने यह दृश्य देखकर ही निश्चय किया कि जो भी इस धनुष को उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, वही सीता के योग्य वर होगा। इस प्रकार स्वयंवर की शर्त सीता के अपने बाल्यकालीन बल-प्रदर्शन से उपजी — न कि किसी बाह्य दैवी आदेश से।

यह प्रसंग एक गहन सत्य उजागर करता है — वह परीक्षा जिसे परवर्ती काल में केवल 'वर की योग्यता की कसौटी' के रूप में देखा गया, वास्तव में सीता की अपनी शक्ति की अनजाने प्रकटीकरण से जन्मी थी। धनुष उठाना राम के लिए पराक्रम था; वही कार्य बाल सीता के लिए सहज क्रीड़ा थी। यह भेद सीता की अंतर्निहित शक्ति के स्तर को स्पष्ट करता है।


सत्य 6 — कम्ब रामावतारम्: दक्षिण भारत की अनूठी दृष्टि


तमिल कवि कम्बन् द्वारा रचित 'रामावतारम्' सीता के चरित्र को उत्तर भारतीय परंपरा से भिन्न, किन्तु समान रूप से गहन भावनात्मक दृष्टि से चित्रित करता है। कम्बन् की सीता में वात्सल्य, विरह और आत्म-सम्मान की अभिव्यक्ति विशिष्ट काव्यात्मक सघनता के साथ हुई है। दक्षिण भारत की इस काव्य-परंपरा में सीता को केवल उत्तर की कथा का दक्षिणी अनुवाद मात्र नहीं, अपितु एक स्वतंत्र सांस्कृतिक पुनर्रचना के रूप में देखा जाना चाहिए — जिसमें तमिल भूमि की भावभूमि और भक्ति-परंपरा का अपना विशिष्ट रंग है।

यह विविधता ही भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रमाण है — एक ही सीता, विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों में, भिन्न-भिन्न किन्तु समान रूप से गहन रूपों में पूजित एवं वर्णित हैं। नीचे दी गई तालिका प्रमुख परंपराओं के अनूठे तत्त्वों को संक्षेप में प्रस्तुत करती है:


ग्रंथ / परंपरा

अनूठा तत्त्व

सीतायण हेतु महत्त्व

वाल्मीकि रामायण

भूमिजा उत्पत्ति; प्रत्यक्ष अग्निपरीक्षा; भूमि-प्रवेश

मूल एवं प्रामाणिक आधार-ग्रंथ

अद्भुत रामायण

सीता द्वारा सहस्रमुखी रावण वध; महाकाली स्वरूप

आदि शक्ति सिद्धान्त का प्रत्यक्ष प्रमाण

अध्यात्म रामायण

छाया सीता सिद्धान्त

अग्निपरीक्षा की आध्यात्मिक व्याख्या

आनंद रामायण

बाल सीता द्वारा धनुष उठाना

स्वयंवर-शर्त का वास्तविक स्रोत

कम्ब रामावतारम् (तमिल)

सीता के प्रति भावनात्मक गहराई, तमिल सांस्कृतिक संदर्भ

क्षेत्रीय परंपराओं की विविधता

तेलुगु / कन्नड़ रामायण-परंपराएँ

स्थानीय लोक-कथाओं का समावेश

सीता-कथा की अखिल भारतीय व्याप्ति


सत्य 7 — भूमि-प्रवेश: सीता की अंतिम एवं सर्वाधिक अद्भुत घोषणा


वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में वर्णित अंतिम प्रसंग स्वयं में सर्वाधिक अद्भुत सत्य है। जब पुनः लोकापवाद के कारण सीता की शुचिता पर प्रश्न उठाया गया, तब सीता ने किसी परीक्षा में बैठने के स्थान पर सीधे धरती माता का आह्वान किया — यदि वे सदैव पवित्र रहीं हों, तो पृथ्वी उन्हें अपने में समा ले। इसके उत्तर में धरती वस्तुतः विदीर्ण हुई और स्वयं भूदेवी ने प्रकट होकर सीता को अपनी गोद में स्थान दिया।

यदि शुद्धाहमेतस्मात्तातेत्यन्यन्न भाषितम्।

देवि वसुन्धरे देहि मे विवरं भूमि पुनः।।

अर्थ: यदि मैं (सीता) सर्वथा शुद्ध रही हूँ, तो हे वसुन्धरे! मुझे पुनः अपने में स्थान दीजिए।

— वाल्मीकि रामायण, उत्तरकाण्ड (परंपरागत उद्धरण)


यह घटना कोई पलायन नहीं, अपितु सीता का अंतिम और सर्वोच्च आत्मनिर्णय है। उन्होंने किसी बाह्य प्रमाण की प्रतीक्षा नहीं की — उन्होंने स्वयं निर्णय लिया कि अब आगे किसी और परीक्षा से नहीं गुजरना है। जो भूमि से उत्पन्न हुई, उसने स्वयं ही अपनी वापसी का क्षण और मार्ग चुना। यही सीतायण की केंद्रीय स्थापना है — सीता कथा के आरंभ से अंत तक कभी भी पूर्णतः असहाय नहीं रहीं; उनकी सहनशीलता चयन थी, विवशता नहीं।

अग्निपरीक्षा दूसरों ने माँगी थी; भूमि-प्रवेश सीता का अपना निर्णय था — यही भेद उन्हें पीड़िता से आदि शक्ति के पद पर प्रतिष्ठित करता है।


सत्य 8 — एकाकी माता-गुरु: वाल्मीकि आश्रम में सीता का अप्रतिम कार्य


वनवास के अंतिम पर्व में सीता वाल्मीकि आश्रम में अकेली रहती हैं — बिना राजसी सहायता, बिना पति के साथ, बिना किसी परिवार-तंत्र के। यहीं लव और कुश का जन्म होता है, और यहीं सीता स्वयं उनकी प्रथम शिक्षिका बनती हैं। यद्यपि शस्त्र-शिक्षा का श्रेय परंपरागत रूप से वाल्मीकि तथा उनके आश्रम को दिया जाता है, किंतु यह तथ्य अल्पचर्चित रहता है कि राजकुमारों का प्रारंभिक चरित्र-निर्माण, भाषा, संस्कार और मूल्यबोध पूर्णतः सीता की एकाकी संरक्षकता में हुआ। एक परित्यक्त राजकुमारी ने ऐसे दो पुत्रों को जन्म दिया और सींचा जो आगे चलकर स्वयं अपने पिता के विरुद्ध रणभूमि में खड़े होने का साहस रखते थे।

यह प्रसंग सीता की स्वावलंबन-क्षमता का सर्वाधिक मार्मिक प्रमाण है। राजमहल से निर्वासित होकर भी वे न तो टूटीं और न ही निष्क्रिय हुईं — उन्होंने प्रतिकूलतम परिस्थिति में भी अगली पीढ़ी को इतना सशक्त बनाया कि वह स्वयं अयोध्या के सिंहासन को चुनौती देने में समर्थ हो सकी। यह घटना अकेले ही सीता के 'असहाय पीड़िता' वाले स्टीरियोटाइप को ध्वस्त करने के लिए पर्याप्त है।


सत्य 9 — रामायण की प्रथम श्रोता नहीं, प्रथम प्रेरणा-स्रोत


एक अत्यंत रोचक किन्तु प्रायः अनदेखा तथ्य यह है कि वाल्मीकि द्वारा रचित 'रामायण' महाकाव्य का प्रथम सार्वजनिक गायन लव-कुश द्वारा स्वयं राम की राजसभा में हुआ, ऐसे समय में जब सीता आश्रम में विद्यमान थीं और उन्हीं की उपस्थिति की शर्त पर उन्हें पुनः अयोध्या बुलाया गया। दूसरे शब्दों में, विश्व की यह आदि काव्य-रचना अस्तित्व में ही इसलिए आई क्योंकि वाल्मीकि ने सीता को आश्रय दिया और उनकी कथा को अपनी तपस्या से शब्द दिए। सीता केवल कथा की नायिका नहीं, अपितु उस परिस्थिति का केंद्र-बिंदु हैं जिसने इस महाकाव्य के सृजन को संभव बनाया।

यह तथ्य सीतायण की इस मूल स्थापना को पुष्ट करता है कि सीता का महत्त्व केवल कथानक में घटित घटनाओं तक सीमित नहीं — वे स्वयं उस सांस्कृतिक स्मृति-प्रक्रिया का उद्गम हैं जिसने भारतीय काव्य-परंपरा की नींव रखी। जिस रामायण को हम आज पढ़ते हैं, वह सीता के अस्तित्व और उनकी कथा के बिना संभव ही नहीं थी।

रामायण राम की गाथा कहलाई, परन्तु उसका जन्म ही सीता की उपस्थिति और उनकी संतानों के कंठ से हुआ — यह भी एक अद्भुत सत्य है।


सत्य 10 — पंचवटी में सीता की रेखा: लक्ष्मण-रेखा से आगे का सत्य


'लक्ष्मण-रेखा' शब्द आज भारतीय भाषाओं में मर्यादा और सीमा के पर्याय के रूप में प्रचलित है, किंतु यह ध्यातव्य है कि वाल्मीकि रामायण की मूल संहिता में इस रेखा-कथा का वर्णन नहीं मिलता — यह परवर्ती लोक-परंपरा एवं क्षेत्रीय रामलीला-परंपराओं की देन है, विशेषतः अध्यात्म रामायण एवं उत्तरकालीन भक्ति-साहित्य में इसका विस्तार हुआ। मूल वाल्मीकि कथा में सीता स्वर्ण-मृग के मोह में स्वयं राम को उसके पीछे भेजती हैं, और लक्ष्मण को भी कटु वचन कहकर भेजने पर विवश करती हैं — यह सीता का अपना निर्णय है, बाह्य विवशता नहीं।

यह भेद अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकचेतना में 'रेखा लांघने' के दोष का सम्पूर्ण भार सीता पर डाल दिया गया है, जबकि मूल कथा में निर्णय-शृंखला कहीं अधिक जटिल है — मायावी मारीच का छल, सीता की स्वाभाविक करुणा, और लक्ष्मण की उलझन, तीनों मिलकर घटनाक्रम रचते हैं। सीतायण की दृष्टि यह है कि किसी एक चरित्र, विशेषतः स्त्री-चरित्र, पर सम्पूर्ण उत्तरदायित्व थोपने की परंपरा को पुनर्विचार की आवश्यकता है, और यही इस अद्भुत सत्य का मूल प्रयोजन है — रेखा की कथा को उसके वास्तविक स्रोत और संदर्भ में समझना।


सत्य 11 — सीता की स्वयं की प्रतिज्ञा: हनुमान से पूर्व का आत्म-संवाद


अशोक वाटिका में बंदी सीता के विषय में सामान्य धारणा यह है कि वे केवल प्रतीक्षा करती रहीं जब तक हनुमान नहीं आए। किंतु वाल्मीकि रामायण के सुंदरकाण्ड का सूक्ष्म वाचन दर्शाता है कि सीता ने रावण के समक्ष स्वयं एक निश्चित समय-सीमा घोषित की थी — यदि एक मास के भीतर राम नहीं आए, तो वे प्राण त्याग देंगी। यह कोई निष्क्रिय प्रतीक्षा नहीं, अपितु एक सुनिश्चित, स्वयं-निर्धारित कालावधि थी, जिसे उन्होंने रावण के समक्ष निर्भीक होकर उद्घोषित किया।

यह तथ्य सीता की उस आंतरिक दृढ़ता को उजागर करता है जो बंदी अवस्था में भी क्षीण नहीं हुई। उन्होंने अपने भाग्य को पूर्णतः रावण या राम के हाथों नहीं छोड़ा — उन्होंने स्वयं एक सीमा-रेखा खींची और उसकी घोषणा सार्वजनिक रूप से की। यह आत्म-निर्णय की वही प्रवृत्ति है जो आगे चलकर भूमि-प्रवेश के प्रसंग में पूर्ण रूप से प्रकट होती है — सीता सदैव, हर परिस्थिति में, अपने भाग्य की अंतिम निर्णायक स्वयं रहीं।


सत्य 12 — चूड़ामणि: सीता की पहचान का अंतिम प्रमाण-चिह्न


जब हनुमान अशोक वाटिका में सीता से भेंट करते हैं और राम की पहचान हेतु कोई चिह्न मांगते हैं, तो सीता किसी आभूषण विशेष का चयन बिना कारण नहीं करतीं। वे अपनी चूड़ामणि — शिरोमणि — प्रदान करती हैं, जो उनके विवाह के समय से जुड़ी एक अत्यंत व्यक्तिगत वस्तु थी। यह चयन प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है — मस्तक पर धारण किया जाने वाला यह आभूषण सीता की प्रज्ञा और आत्म-गौरव का प्रतीक माना जाता है, न कि केवल एक भौतिक पहचान-चिह्न।

इसके साथ सीता हनुमान को एक गुप्त प्रसंग भी सुनाती हैं — काकासुर की कथा — जो केवल राम और सीता के मध्य ज्ञात थी। यह विवरण इस बात का प्रमाण था कि संदेशवाहक वास्तव में सीता से ही मिलकर आया है। इस प्रकार सीता ने अपनी पहचान सिद्ध करने हेतु न केवल भौतिक वस्तु, अपितु एक साझा स्मृति का भी उपयोग किया — यह उनकी बुद्धिमत्ता और सूझबूझ का एक अद्भुत, किंतु प्रायः अनदेखा उदाहरण है।

एक आभूषण और एक गुप्त स्मृति — सीता ने प्रमाण के रूप में वस्तु नहीं, विश्वास चुना।


सत्य 13 — सीता की मौन-प्रतिरोध: शूर्पणखा-प्रसंग में उपेक्षित भूमिका


पंचवटी में शूर्पणखा-प्रसंग सामान्यतः राम-लक्ष्मण के दृष्टिकोण से वर्णित किया जाता है, किंतु इस पूरे प्रकरण में सीता की उपस्थिति और उनकी मौन प्रतिक्रिया एक अद्भुत, अल्पविवेचित आयाम है। वाल्मीकि रामायण में सीता शूर्पणखा के प्रति न तो भय दर्शाती हैं, न ही आक्रामकता — वे संपूर्ण घटनाक्रम की मूक साक्षी बनी रहती हैं, जबकि यह घटना अंततः संपूर्ण युद्ध का कारण बनती है। यह मौन आकस्मिक नहीं था; यह सीता की उस मर्यादा-चेतना का प्रतिबिंब था जिसमें वे किसी अन्य स्त्री के प्रति, चाहे वह शत्रु-पक्ष की ही क्यों न हो, तिरस्कार व्यक्त करने से बचती हैं।

यह संयम विशेष रूप से उल्लेखनीय है जब हम स्मरण करें कि यही शूर्पणखा-प्रसंग अंततः सीता-हरण का प्रत्यक्ष कारण बना। फिर भी सीता कहीं भी शूर्पणखा के प्रति दोषारोपण करती नहीं दिखतीं। यह आत्म-नियंत्रण, प्रतिशोध-रहित दृष्टिकोण, सीता के चरित्र की उस गरिमा को दर्शाता है जो प्रायः उनके 'सहनशीलता' वाले सरलीकृत चित्रण में खो जाती है — यहाँ सहनशीलता कमजोरी नहीं, चयनित मर्यादा है।



इन सातों अद्भुत सत्यों का उद्देश्य किसी एक ग्रंथ को दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करना नहीं, अपितु यह दर्शाना है कि भारतीय परंपरा में सीता का चरित्र कितनी बहुआयामी गहराई में रचा-बसा है। वाल्मीकि की मर्यादा, अद्भुत रामायण का शक्ति-स्वरूप, अध्यात्म रामायण की गूढ़ आध्यात्मिकता, और दक्षिण भारत की भावप्रवण काव्य-परंपरा — ये सब मिलकर सीता को केवल एक पौराणिक चरित्र नहीं, अपितु भारतीय सभ्यता की सामूहिक चेतना का प्रतीक बनाते हैं। सीतायण इसी बहुआयामी सत्य को, प्रत्येक स्रोत की अपनी प्रामाणिकता में सुरक्षित रखते हुए, पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास है।


— सीतायण, कौटिल्य का भारत दैनिक

1 टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही सुन्दर और सराहनीय पहल आदरणीय श्री मान जी।।

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