जानकी सहस्रनाम
सहस्रमुख रावण के संहार के पश्चात् श्रीराम द्वारा शक्ति-स्वरूपा सीता की स्तुति — अद्भुत रामायण के आलोक
विजयोपरांत मुस्कान का रहस्य::वाल्मीकि रचित अद्भुत रामायण — जो 27 सर्गों और 1353 श्लोकों में निबद्ध है — रामकथा की उस अनकही परत को उद्घाटित करती है, जिसमें सीता को केवल सहनशीलता की प्रतिमूर्ति नहीं, अपितु साक्षात् आदि शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। कथा तब आरम्भ होती है जब राज्याभिषेक के उपरांत मुनिगण श्रीराम की शौर्य-गाथा का गुणगान कर रहे थे। इसी क्षण सीता मुस्करा उठीं — एक ऐसी मुस्कान जिसने सम्पूर्ण सभा को विस्मित कर दिया।कारण पूछे जाने पर सीता ने स्पष्ट किया कि श्रीराम ने केवल दशमुख रावण का वध किया है; उसका भ्राता सहस्रमुख रावण अब भी जीवित है, और उसका पराभव हुए बिना यह शौर्यगाथा अपूर्ण ही रहेगी। यह कथन स्वयं में एक सम्पादकीय संकेत है — सीता का ज्ञान, दूरदृष्टि और सत्य-कथन का साहस, जो उन्हें केवल अनुगामिनी नहीं अपितु समान अधिकार-सम्पन्न सहभागिनी सिद्ध करता है।
सहस्रमुख रावण-वध : काली-रूपा जानकी::इस चुनौती को स्वीकार कर श्रीराम ने विभीषण, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न एवं हनुमान सहित चतुरंग सेना के साथ समुद्र पार कर सहस्रस्कंध पर आक्रमण किया। सीता भी इस अभियान में साथ थीं। किन्तु रणभूमि में सहस्रमुख रावण ने एक ही बाण से सम्पूर्ण वानर-सेना और वीरों को अयोध्या तक फेंक दिया — केवल राम और सीता रणक्षेत्र में शेष रह गए। इसी क्षण श्रीराम मूर्च्छित हो गए।यहीं कथा अपने चरम पर पहुँचती है — सीता ने असिता अर्थात् महाकाली का उग्र रूप धारण कर एक ही निमेष में सहस्रमुख रावण का शिरच्छेदन कर दिया और उसकी सम्पूर्ण सेना का संहार किया। किन्तु देवी का क्रोध इतने से शान्त नहीं हुआ — उनके रोम-रोम से असंख्य मातृकाएँ प्रकट हुईं, और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड कम्पित होने लगा। ब्रह्मादि देवगणों ने मिलकर उस आदि शक्ति की स्तुति की, तब कहीं जाकर देवी का रोष शान्त हुआ।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति-रूप में स्थित हैं, उन्हें बारम्बार नमस्कार है।
— शाक्त परम्परा का सुप्रसिद्ध स्तुति-सूत्र, आदि शक्ति की सार्वभौमिक उपासना का प्रतिनिधि
जानकी सहस्रनाम : राम द्वारा शक्ति की स्तुति::देवी का रोष शान्त होने पर श्रीराम भी चैतन्य को प्राप्त हुए। इसके पश्चात् उन्होंने साक्षात् शक्ति-स्वरूपा सीता की स्तुति सहस्रनाम से की — जो अद्भुत रामायण के पच्चीसवें सर्ग में 'जानकी सहस्रनाम' के नाम से प्रतिष्ठित है। विद्वानों ने इसकी तुलना ललिता सहस्रनाम स्तोत्र से की है, क्योंकि दोनों में देवी के सहस्र नामों के माध्यम से उनके ब्रह्माण्ड-व्यापी स्वरूप का वर्णन है।
यह प्रसंग रामकथा के परम्परागत बोध को एक नई दिशा देता है — यहाँ राम स्वयं स्तोता हैं और सीता स्तुत्या। यह सम्बन्ध शिव-शक्ति के उस तात्त्विक सिद्धांत का प्रतिबिम्ब है, जिसमें ब्रह्म और शक्ति परस्पर अभिन्न होते हुए भी अपनी-अपनी भूमिकाओं में प्रतिष्ठित हैं। ग्रन्थ में यह भी उल्लेख है कि जो कोई इस स्तोत्र — जिसे 'अद्भुत स्तोत्र' भी कहा गया है — का पाठ करता या कराता है, वह परम पद को प्राप्त होता है।“राम का माहात्म्य ब्रह्म-तत्त्व में है, किन्तु उस माहात्म्य की सार्थकता सीता के शक्ति-तत्त्व से ही सिद्ध होती है — यही जानकी सहस्रनाम का मूल सन्देश है।”
परम्परा-भेद : वाल्मीकि रामायण बनाम अद्भुत रामायण:: ईमानदारी की माँग है कि अद्भुत रामायण की इस कथा को वाल्मीकि रामायण के मूल आख्यान से पृथक् रखा जाए। दोनों ग्रन्थ भिन्न कालखण्ड, भिन्न उद्देश्य और भिन्न दार्शनिक आग्रह से रचित हैं — एक का केंद्र राम का मर्यादा-पुरुषोत्तम स्वरूप है, तो दूसरे का केंद्र सीता का शक्ति-स्वरूप। दोनों की तुलना नीचे प्रस्तुत है:
आधार,वाल्मीकि रामायण (मूल)अद्भुत रामायण
रावण-वध का कर्ताश्रीराम स्वयं दशानन रावण का वध करते हैं,सीता, काली-रूप धारण कर सहस्रमुख रावण का वध करती हैं,सीता की भूमिका,धैर्य, शील और सतीत्व की प्रतिमूर्ति — मुख्यतः सहनशीलता में केंद्रित,साक्षात् आदि शक्ति — संहारकारिणी, स्वयं युद्ध का निर्णायक तत्त्स्तु,ति-प्रसंग,राम की वीरता की प्रशस्ति प्रमुख विषय
राम स्वयं सीता की 'जानकी सहस्रनाम' से स्तुति करते हैं::ग्रन्थ की प्रकृतिआदिकाव्य — 24,000 श्लोक, 7 काण्ड
परवर्ती शाक्त-प्रभावित रचना — 27 सर्ग, 1353 , दृष्टिकोण : जनकपुर से जगद्गुरु भारत,जानकी सहस्रनाम केवल एक शाक्त स्तोत्र नहीं, अपितु भारतीय सभ्यता की उस मूल चेतना का प्रमाण है जिसमें नारी को सहनशीलता तक सीमित नहीं, अपितु संहारकारिणी शक्ति के रूप में भी स्वीकार किया गया। सीतायण की मूल स्थापना — कि सीता आदि शक्ति हैं, न कि केवल एक निष्क्रिय पात्र — इसी परम्परा से पुष्ट होती है। यह प्रसंग हमें स्मरण कराता है कि जनकपुर की राजकुमारी में जो शक्ति अन्तर्निहित थी, वह अयोध्या की गृहस्थी में भी लुप्त नहीं हुई — अवसर आने पर वह प्रकट होकर सृष्टि की रक्षा करती है।,आज जब भारत अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर पुनः उन्मुख हो रहा है, जानकी सहस्रनाम जैसे प्रसंग यह स्मरण कराते हैं कि नारी-शक्ति का सम्मान भारतीय चिन्तन का कोई आधुनिक आविष्कार नहीं, अपितु सहस्राब्दियों पुरानी सभ्यतागत निधि है। जनकपुर से जगद्गुरु भारत @2047 की यात्रा में यह चेतना ही मार्गदर्शक बने — यही इस सम्पादकीय का उद्देश्य है।
सन्दर्भ : अद्भुत रामायण (सर्ग 24–26, जानकी सहस्रनाम-प्रसंग एवं काली-सीता पुनरागमन)। मूल
