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विशेष प्रसंग
अशोक वाटिका में सीता,वेदना के वृक्ष तले तेज की प्रतिमा — पाँच काव्य-परम्पराओं में सीता का मार्मिक चित्रण
न हि सीता त्वया द्रष्टुं दर्शनेऽप्यस्य कर्हिचित्।
शक्या सूर्यप्रभेव उग्रा प्रविष्टा वालमेखलाम्॥
(वाल्मीकि रामायण, सुन्दरकाण्ड — शोकाग्नि में तपी सीता का तेज सूर्य-प्रभा-सम अवर्णनीय है)

 अशोक वाटिका — वेदना और तेज की भूमि::लंका के स्वर्ण-प्राचीरों के भीतर, रावण के अंतःपुर से सटी हुई, एक वाटिका थी — अशोक वाटिका। नाम में ही विडम्बना छिपी थी: 'अशोक' अर्थात् शोक-रहित, किन्तु उसी वाटिका में विश्व-इतिहास का सबसे गहन शोक अपनी चरम अवस्था में प्रकट हुआ। शिंशपा वृक्ष के नीचे, मैली धोती में, भूमि पर बैठी हुई, राक्षसियों से घिरी हुई सीता — यह दृश्य भारतीय काव्य-परम्परा का सबसे अधिक चित्रित, सबसे अधिक गाया और सबसे अधिक रोया गया दृश्य है। किन्तु यह केवल वेदना का चित्र नहीं है। प्रत्येक कवि ने, अपनी-अपनी भाषा और अपने-अपने युग की दृष्टि से, इसी वेदना के भीतर एक अदम्य तेज को भी देखा — वह तेज जो किसी बाह्य आक्रमण से टूटता नहीं, बल्कि और सघन होता जाता है।
इस लेख में हम पाँच महाकवियों — वाल्मीकि, तुलसीदास, कंबन, कालिदास और अद्भुत रामायण के अज्ञात रचयिता — की दृष्टि से अशोक वाटिका के सीता-चित्रण को देखेंगे। प्रत्येक परम्परा को उसके मौलिक स्वरूप में, बिना परस्पर घुलाए-मिलाए, प्रस्तुत किया जाएगा — क्योंकि प्रत्येक कवि का अपना दर्शन है, अपनी भाषा-दृष्टि है, और सीता के प्रति अपनी विशिष्ट भक्ति-भावना है।अशोक वाटिका केवल बंदीगृह नहीं थी — वह वह तपोभूमि थी जहाँ सीता का 'वैदेही' स्वरूप 'आदि शक्ति' स्वरूप में रूपांतरित होता दिखाई देता है।


 वाल्मीकि रामायण — आदिकवि की मूल दृष्टि::वाल्मीकि के सुन्दरकाण्ड में अशोक वाटिका का वर्णन सर्ग १४ से लेकर सर्ग ३६ तक विस्तृत रूप से आता है। हनुमान जब शिंशपा वृक्ष पर बैठकर वाटिका को निहारते हैं, तो कवि की दृष्टि पहले वाटिका के वैभव पर पड़ती है — मणि-जटित सोपानों वाली बावड़ियाँ, स्वर्णमय वृक्ष, मोती और मूँगे की बालुका — और फिर उसी वैभव के मध्य एक दीन, कृशकाय स्त्री पर।
सीता की प्रथम झलक
तां समीक्ष्य विशालाक्षीं शोकोपहतचेतसम्।
एककेशपाशाशोकवृक्षसमाश्रयाम्॥
(सुन्दरकाण्ड, सर्ग १५ — विशाल नेत्रों वाली, शोक से आहत-चित्त, एकवेणी धारण किए, अशोक वृक्ष का आश्रय लिए सीता को देखकर)

वाल्मीकि लिखते हैं कि सीता कृशकाय हैं, उनके सिर पर एक ही वेणी है (जो विरहिणी और तपस्विनी नारी का प्रतीक है), और वे निरंतर हृदय में राम के गुणों का जप करती रहती हैं — 'कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥' यह तुलसी की चौपाई है, किंतु भाव मूलतः वाल्मीकि का ही है — तपस्विनी की छवि, भोगिनी की नहीं।
रावण के समक्ष सीता का तेज,सर्ग १९-२१ में जब रावण अशोक वाटिका में आकर सीता को प्रलोभन और भय दोनों दिखाता है, तब सीता का उत्तर उनके आंतरिक तेज को उद्घाटित करता है। वे तिनके की ओट लेकर रावण से बात करती हैं — यह तिनका केवल लोकलाज का प्रतीक नहीं, अपितु यह सूचित करता है कि सीता अपने और रावण के बीच धर्म की एक अलंघ्य रेखा खींच चुकी हैं। वे रावण को स्पष्ट कहती हैं कि वह अपने भाई खर की भाँति युद्धभूमि में नहीं, बल्कि चोर की भाँति उन्हें हर लाया है, और यही उसके विनाश का कारण बनेगा।
वाल्मीकि की सीता भयभीत बंदिनी नहीं, अपितु नैतिक निर्णायक की भूमिका में हैं — वे रावण के भविष्य की भविष्यवाणी स्वयं करती हैं, रावण उनके भविष्य की नहीं।

त्रिजटा-स्वप्न और आशा का प्रकाश::राक्षसियों के बीच त्रिजटा एकमात्र ऐसी राक्षसी है जो सीता के प्रति करुणा रखती है। उसका स्वप्न — जिसमें राम की विजय और रावण के विनाश की सूचना है — सीता को उस क्षण में भी आशा से भर देता है जब आत्महत्या का विचार उन्हें घेर चुका था। वाल्मीकि यहाँ एक सूक्ष्म किंतु गहन बात कहते हैं: सीता का धैर्य केवल उनकी निजी शक्ति नहीं, बल्कि सृष्टि की समस्त शुभ शक्तियाँ उनके पक्ष में सक्रिय हैं।
हनुमान-दर्शन और मुद्रिका-प्रसंग,सर्ग ३० में हनुमान जब शिंशपा वृक्ष से उतरकर स्वयं को राम-दूत बताते हैं, तो सीता के मन में पहले संशय होता है — कहीं यह रावण की माया तो नहीं? किंतु राम की मुद्रिका देखते ही उनका शोक क्षण भर के लिए हर्ष में बदल जाता है। सर्ग ३६ में हनुमान जब राम के विरह-वर्णन में कहते हैं कि राम अन्न और मधु का त्याग कर वन्य फलाहार पर हैं, तो सीता का अपना शोक क्षणिक रूप से हर्ष में बदलता है, किन्तु राम की पीड़ा सुनकर वे पुनः शोकमग्न हो जाती हैं — कवि इस मनोदशा की तुलना शरद ऋतु की उस रात्रि से करते हैं जिसमें मेघ और चन्द्रमा दोनों एक साथ विद्यमान हों। यह वाल्मीकि की मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता का चरम उदाहरण है — हर्ष और शोक का यह सहअस्तित्व।
हर्षशोकौ समापन्ना वैदेही जनकात्मजा।
शारदीव निशा देवी तारकाचन्द्रसंयुता॥
(सुन्दरकाण्ड, सर्ग ३६.४२ — शरद-निशा की भाँति हर्ष और शोक दोनों से युक्त वैदेही)

अंततः सीता का संदेश हनुमान को — 'मैं केवल एक मास तक जीवित रहूँगी, उसके पश्चात् नहीं' — इस बात का प्रमाण है कि उनका धैर्य असीम नहीं, अपितु समयबद्ध है। यही सीमा उनके तप को और भी मार्मिक बना देती है — वे अनंत काल तक प्रतीक्षा करने वाली निष्क्रिय नायिका नहीं, अपितु एक निश्चित अवधि तक धर्म पर अडिग रहने वाली सक्रिय संकल्प-शक्ति हैं।

रामचरितमानस — तुलसी की भक्ति-दृष्टि::गोस्वामी तुलसीदास का सुन्दरकाण्ड अशोक वाटिका के प्रसंग को भक्ति के रंग में रँगता है। जहाँ वाल्मीकि की सीता वीरांगना और नीति-निपुण हैं, वहाँ तुलसी की सीता में भक्त-हृदय की कोमलता और समर्पण अधिक मुखर होकर सामने आता है — किन्तु यह कोमलता दुर्बलता नहीं, भक्ति की प्रगाढ़ता है।
हनुमान का प्रथम दर्शन
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ॥
कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥
(रामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड — दोहा ८ के पूर्व की चौपाई)
तुलसी की यह पंक्ति सीता के तप का सम्पूर्ण चित्र दो पंक्तियों में खींच देती है — कृश शरीर, एक वेणी में बंधी जटा, और हृदय में निरंतर राम-गुण-कीर्तन। यह छवि किसी असहाय बंदिनी की नहीं, अपितु एक तपस्विनी साधिका की है जिसने अपने कष्ट को साधना में बदल दिया है।
रावण को सीता की फटकार तुलसी की सीता रावण के समक्ष अद्भुत आत्मविश्वास से भरी हैं। वे रावण की तुलना खद्योत (जुगनू) से और राम की तुलना सूर्य से करती हैं — यह उपमा रावण के अहंकार पर सबसे तीखा प्रहार है।
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥
(रामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा ९ के पूर्व)
जुगनू के प्रकाश से क्या कभी कमलिनी खिलती है? — यह प्रश्न सीता के मुख से रावण के समस्त वैभव और बल को एक क्षण में तुच्छ कर देता है।

मास-दिवस का प्रण और राक्षसियों का उत्पीड़न:रावण के क्रोधित होकर तलवार निकालने पर मंदोदरी हस्तक्षेप करती है, और रावण राक्षसियों को आदेश देता है कि वे सीता को भाँति-भाँति से भयभीत करें। तुलसी इस प्रसंग को अत्यंत करुण किन्तु संक्षिप्त रूप में चित्रित करते हैं — सीता का धैर्य राक्षसियों के प्रतिदिन के आतंक के सामने भी अडिग रहता है। तुलसी यहाँ भक्ति का एक गूढ़ सिद्धांत रचते हैं: बाह्य कष्ट जितना बढ़ता है, आंतरिक राम-स्मरण उतना ही सघन होता जाता है — सीता का चरित्र इस सिद्धांत का जीवंत प्रमाण बनकर उभरता है।
अशोक वाटिका उजाड़ना और सीता की करुणा,आगे के प्रसंग में जब हनुमान अशोक वाटिका को उजाड़ते हैं और लंका दहन करते हैं, तब भी सीता के हृदय में हनुमान के प्रति करुणा जागृत होती है — वे हनुमान की पूँछ में लगी आग को लेकर चिंतित होती हैं और शीतलता की कामना करती हैं। यह विवरण मूलतः वाल्मीकि में भी है, किन्तु तुलसी इसे भक्त-भाव से इतना कोमल बना देते हैं कि सीता का मातृ-हृदय हनुमान के प्रति करुणा से भर उठता प्रतीत होता है — यहीं से सीता 'जानकी माता' के रूप में लोकमानस में प्रतिष्ठित होती हैं।

 कंब रामायण (रामावतारम्) — तमिल भावभूमि की सीता::
बारहवीं शताब्दी के तमिल महाकवि कंबन ने अपने रामावतारम् में अशोक वाटिका के प्रसंग को अपनी मौलिक कल्पना से समृद्ध किया है। कंबन वाल्मीकि का अनुवाद नहीं करते, अपितु घटनाओं में सैकड़ों नए आयाम जोड़ते हैं — विशेषकर सीता के आंतरिक भावों के चित्रण में।
भूमि सहित हरण — कंबन की मौलिक कल्पना ,जहाँ शेष सभी रामायण-परम्पराओं में रावण सीता को पकड़कर ले जाता है, वहाँ कंबन एक विलक्षण कल्पना करते हैं — रावण सीता के स्पर्श का साहस नहीं कर पाता, क्योंकि ब्रह्मा के शाप के कारण वह सीता को स्पर्श नहीं कर सकता। अतः वह सीता सहित सम्पूर्ण भूमि-खंड को ही उठा ले जाता है। यह कल्पना सीता की अस्पृश्य पवित्रता को काव्यात्मक रूप से स्थापित करती है — रावण का बल असीम होकर भी सीता के सतीत्व के समक्ष असमर्थ है।कंबन कहते हैं कि सीता केवल लंका में बंदी नहीं थीं — वे रावण के हृदय में भी बंदी थीं। यह कल्पना रावण के पतन की गहनतम व्याख्या करती है: वासना स्वयं वासी को बंदी बना लेती है।

हनुमान से सीता का संवाद — प्रेम की अव्याख्येयता
कंबन के अनुसार, राम से बिछुड़कर अशोक वन में स्मृतियों के सहारे दिन बिताती सीता हनुमान से कहती हैं कि उनका और राम का प्रेम शरीर और प्राण के संबंध के समान अविभाज्य है — यह बताना कठिन है कि कौन शरीर है और कौन प्राण। तमिल भक्ति-परम्परा में यह उपमा अत्यंत लोकप्रिय हुई, क्योंकि यह दाम्पत्य-प्रेम को आत्मिक एकत्व के स्तर पर प्रतिष्ठित करती देह-सम्बन्ध नहीं, प्राण-सम्बन्ध।स्पर्श की पवित्रता पर सीता का कथन,कंबन की सीता वाल्मीकि की सीता से एक कदम आगे बढ़कर कहती हैं — यदि कोई पर पुरुष उनका बलपूर्वक स्पर्श करे, तो उनके प्राण उसी क्षण देह त्याग देंगे। यही कारण था कि दुष्ट रावण उन्हें भूमि सहित उठा ले गया, प्रत्यक्ष स्पर्श करने का साहस उसमें नहीं था। कंबन का यह चरित्र-चित्रण सीता की देह को नहीं, अपितु उनके तेज को अलंघ्य सिद्ध करता है — यह तेज ही उनकी वास्तविक रक्षा-कवच है, कोई बाह्य शस्त्र नहीं।

 कालिदास का रघुवंश — मौन में निहित मार्मिकता
महाकवि कालिदास का रघुवंश, अपने द्वादश सर्ग में, सीता-हरण और राम-रावण युद्ध की कथा को अत्यंत संक्षिप्त गति से आगे बढ़ाते हैं। कालिदास अशोक वाटिका में सीता के दीर्घ प्रवास का विस्तृत वर्णन नहीं करते — यह उनकी शैलीगत मितव्ययिता (कालिदास की प्रसिद्ध 'अल्पाक्षरत्व' शैली) का परिणाम है, अभाव नहीं।
संकेत की काव्य-शक्ति,कालिदास की विशिष्टता यह है कि वे विस्तार से नहीं, संकेत से मार्मिकता उत्पन्न करते हैं। त्रयोदश सर्ग में, जब राम पुष्पक विमान पर सीता को लंका से अयोध्या लौटते समय दण्डकारण्य और पंचवटी के वे स्थान दिखाते हैं जहाँ सीता की खोज हुई थी, तब विरह और पुनर्मिलन का यह दृश्य पाठक को अशोक वाटिका के संपूर्ण कष्ट-काल का स्मरण दिला देता है — बिना उसे पुनः वर्णित किए। यह कालिदास की काव्य-प्रौढ़ता है: वे वियोग को उसके स्मरण द्वारा, प्रत्यक्ष चित्रण से अधिक तीव्रता से, पाठक तक पहुँचाते हैं।
जहाँ वाल्मीकि, तुलसी और कंबन अशोक वाटिका को प्रत्यक्ष रंगमंच पर लाते हैं, वहाँ कालिदास उसे स्मृति की छाया में रखते हैं — और यह छाया कदाचित् उतनी ही गहरी वेदना कहती है, मौन 
यद्यपि चतुर्दश सर्ग सीता-परित्याग का प्रसंग है — अशोक वाटिका का नहीं — किन्तु उसमें सीता जिस धैर्य और निर्दोष मौन के साथ अपने भाग्य को स्वीकार करती हैं, वह अशोक वाटिका में उनके द्वारा दिखाए गए धैर्य की ही निरंतरता है। कालिदास लिखते हैं कि सीता ने पति के विरुद्ध एक भी दुर्वचन नहीं कहा, बार-बार केवल अपने ही भाग्य को कोसा — यह चरित्र-सातत्य कालिदास की सूक्ष्म दृष्टि का प्रमाण है: अशोक वाटिका में गढ़ा गया धैर्य सीता के सम्पूर्ण जीवन का स्थायी भाव बन जाता है।

अद्भुत रामायण — आदि शक्ति के रूप में पुनर्पाठ
अद्भुत रामायण की मूल कथावस्तु सहस्रानन रावण के वध पर केंद्रित है, जिसमें सीता 'असिता' अर्थात् काली का रूप धारण कर सहस्रमुख रावण का वध करती हैं। यद्यपि यह ग्रंथ अशोक वाटिका के प्रसंग का विस्तृत पृथक् वर्णन नहीं करता, तथापि इसकी सम्पूर्ण दार्शनिक दृष्टि अशोक वाटिका की घटना को एक नए प्रकाश में देखने के लिए बाध्य करती है।
सीता का मूल-स्वरूप — आदि शक्ति,अद्भुत रामायण में सीता के मूल स्वरूप को साक्षात् आदि शक्ति के रूप में प्रतिपादित किया गया है — वही शक्ति जिसके निमेष-उन्मेष मात्र से सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और संहार होता है। इस दृष्टि से देखें, तो अशोक वाटिका में सीता का प्रतीत होने वाला 'असहायपन' वस्तुतः एक लीला है — आदि शक्ति स्वयं संकल्पपूर्वक मानवी वेदना का अनुभव कर रही हैं, ताकि धर्म की पुनर्स्थापना की लीला पूर्ण हो सके।
जानकी सहस्रनाम — देवी सूक्तों में सीता की शक्ति-रूप में स्तुति
(अद्भुत रामायण, सर्ग २५ — काली का पुनः सीता-रूप में प्रत्यावर्तन तथा जानकी सहस्रनाम-स्तवन,अद्भुत रामायण की दृष्टि से अशोक वाटिका का शिंशपा वृक्ष कोई निर्बल आश्रय नहीं था — वह वह स्थान था जहाँ आदि शक्ति ने संसार को यह सिखाया कि सहनशीलता स्वयं में सबसे प्रचंड शक्ति है।

तेज की निरंतरता — सहस्रानन-वध का पूर्वाभास
अद्भुत रामायण में आगे चलकर जब राम स्वयं सहस्रानन के समक्ष मूर्च्छित हो जाते हैं और सीता काली-रूप धारण कर उसका वध करती हैं, तब यह घटना अशोक वाटिका के प्रसंग की पूर्वपीठिका के रूप में समझी जानी चाहिए — जो शक्ति अशोक वाटिका में संयमित और मौन रूप में रावण के समक्ष प्रकट हुई थी, वही शक्ति समय आने पर संहारकारिणी रूप में प्रकट होती है। यही कारण है कि हमारी सीतायण-दृष्टि सीता को कभी भी केवल 'पीड़िता' के रूप में नहीं, अपितु संकल्पपूर्वक धैर्य धारण करने वाली सचेतन शक्ति के रूप में देखती है।

तुलनात्मक दृष्टि — पाँच काव्य-परम्पराओं का संगम,पाँचों काव्य-परम्पराओं को साथ रखकर देखने पर यह स्पष्ट होता है कि प्रत्येक कवि ने अपनी सांस्कृतिक भूमि और भाषिक संवेदना के अनुरूप अशोक वाटिका के प्रसंग को नए आयाम दिए हैं। कोई भी परम्परा दूसरे की पुनरावृत्ति नहीं है — प्रत्येक अपने आप में सम्पूर्ण दृष्टि है।
तत्व,वाल्मीकि,तुलसीदास,कंबन,कालिदास / अद्भुत रामायण,सीता की भाव-भूमिनीति-निपुण, वीरांगना,भक्त-हृदया, समर्पित,प्राण-सम बद्ध प्रेमिक मौन धैर्य / साक्षात् आदि शक्ति
रावण के प्रति दृष्टि,तार्किक चेतावनी,तिरस्कारपूर्ण फटकार,अस्पृश्य पवित्रता
भावी संहार का बीज,मौलिक अवदान,मूल कथा-आधार,भक्ति-रस, लोक-प्रचलन
भूमि सहित हरण की कल्पना,संकेत-शैली / शक्ति-दर्शन,केंद्रीय भाव
सत्य और धैर्य,भक्ति और करुणा,अद्वैत प्रेम,शक्ति और लीला
यह तुलनात्मक दृष्टि हमें यह सिखाती है कि सीता का चरित्र किसी एक व्याख्या में बंधने वाला नहीं है — वे एक साथ नीति-निपुण भी हैं, भक्ति-मूर्ति भी, अद्वैत-प्रेमिका भी, और आदि शक्ति भी। यही बहुआयामिता उन्हें भारतीय काव्य-चेतना की सबसे जीवंत नायिका बनाती है।

 वेदना के वृक्ष तले तेज की प्रतिमा
::अशोक वाटिका का शिंशपा वृक्ष भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में सबसे अधिक करुण, किन्तु सबसे अधिक गौरवशाली स्थलों में से एक है। यहाँ सीता को पीड़ा भोगते हुए नहीं, अपितु पीड़ा को साधना में परिवर्तित करते हुए देखा जाना चाहिए। पाँचों काव्य-परम्पराएँ, अपने-अपने ढंग से, इसी सत्य की पुष्टि करती हैं — चाहे वह वाल्मीकि का नीति-तर्क हो, तुलसी की भक्ति-करुणा हो, कंबन की अद्वैत-प्रेम-कल्पना हो, कालिदास का मार्मिक मौन हो, या अद्भुत रामायण का शक्ति-दर्शन।'सीतायण' की मूल स्थापना यहीं पुष्ट होती है — सीता कभी भी निष्क्रिय दुःखिनी नहीं थीं। अशोक वाटिका में उनका प्रत्येक क्षण एक सचेतन चुनाव था: धैर्य का चुनाव, सत्य का चुनाव, और अपने भीतर की शक्ति को पहचानने का चुनाव। यही कारण है कि आज भी, सहस्राब्दियों के पश्चात्, यह दृश्य — वृक्ष तले बैठी, मैली धोती में, अश्रुपूरित किन्तु अडिग सीता — भारतीय जनमानस के हृदय में उतनी ही जीवंतता से अंकित है जितनी वह वाल्मीकि के युग में रही होगी।वेदना जिसे तोड़ नहीं सकी, वह तेज ही आदि शक्ति की वास्तविक पहचान है — और अशोक वाटिका वह भूमि है जहाँ यह पहचान संसार के समक्ष सबसे स्पष्ट रूप से प्रकट हुई।






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