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सोमवार, 6 जुलाई 2026

राष्ट्रवाद के हिमालय, शिक्षा-विद से राष्ट्र-शिखर तक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती पर विशेष

 राष्ट्रवाद  के  हिमालय,

शिक्षा-विद से राष्ट्र-शिखर तक

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती पर विशेष


(जन्म: 6 जुलाई 1901 • बलिदान: 23 जून 1953)

"एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान कभी नहीं चलेंगे"  यह उद्घोष एक व्यक्ति का नहीं, अखण्ड भारत की अन्तरात्मा का था।

आज, 6 जुलाई 2026 को, हम उस विभूति की 125वीं जयंती मना रहे हैं जिसने भारत को केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, एक सांस्कृतिक और राजनीतिक अखण्डता के रूप में गढ़ने का साहस दिखाया ,डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रवाद कोई उद्वेगपूर्ण नारा नहीं, बल्कि विद्वत्ता, त्याग और अटूट संकल्प से गढ़ा गया एक जीवन-दर्शन हो सकता है।

शिक्षा का शिखर: विश्व के सबसे युवा कुलपति,6 जुलाई 1901 को कलकत्ता के प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे श्यामा प्रसाद के पिता सर आशुतोष मुखर्जी स्वयं एक महान शिक्षाविद और कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके थे। पिता की छाया में पले-बढ़े श्यामा प्रसाद ने 1921 में प्रेसीडेंसी कॉलेज से प्रथम श्रेणी में बी.ए., तत्पश्चात एम.ए. और विधि की उपाधियाँ प्राप्त कीं, और 1926 में इंग्लैण्ड से बैरिस्टर बनकर स्वदेश लौटे।

मात्र 33 वर्ष की आयु में, 1934 में, वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त हुए — विश्व के इतिहास में इतनी अल्पायु में इस पद तक पहुँचने वाले वे पहले व्यक्ति थे। 1938 तक इस दायित्व को निभाते हुए उन्होंने पुस्तकालय-सुविधाओं का विस्तार, विज्ञान-अनुसन्धान को प्रोत्साहन, कृषि-शिक्षा का समावेश, और छात्र-कल्याण की अनेक योजनाएँ लागू कीं। उन्होंने विश्वविद्यालय के लिये गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर से एक गीत लिखवाने का अनुरोध किया और 24 जनवरी को विश्वविद्यालय-स्थापना दिवस के रूप में मनाने की परम्परा आरम्भ की , यह उनकी उस दूरदृष्टि का प्रमाण है जो संस्थाओं में केवल प्रशासन नहीं, आत्मीयता और गौरव-बोध रोपना चाहती थी। शिक्षा उनके लिये सत्ता का साधन नहीं, राष्ट्र-निर्माण की प्रथम प्रयोगशाला थी।

विभाजन के अन्धकार में आधे बंगाल की रक्षा,1940 के दशक में जब भारत विभाजन की विभीषिका की ओर बढ़ रहा था, डॉ. मुखर्जी सांस्कृतिक एकता के प्रबल पक्षधर थे और धर्म के आधार पर विभाजन के कट्टर विरोधी। किन्तु जब विभाजन अपरिहार्य बना, तो उन्होंने अद्वितीय व्यावहारिक साहस दिखाया , बंगाल और पंजाब के भी विभाजन की माँग उठाकर उन्होंने प्रस्तावित सम्पूर्ण पाकिस्तान की योजना को विफल कर दिया, और आधा बंगाल, आधा पंजाब भारत के लिये सुरक्षित बचा लिया। यदि यह दूरदर्शिता न होती, तो आज का पश्चिम बंगाल और पंजाब का बड़ा भाग भारत का अंग न होता।

महात्मा गांधी और सरदार पटेल के आग्रह पर वे स्वतन्त्र भारत के प्रथम मन्त्रिमण्डल में सम्मिलित हुए और उद्योग एवं आपूर्ति मन्त्री का दायित्व सम्भाला। परन्तु उनकी राष्ट्रवादी प्रतिबद्धता किसी पद के मोह से बड़ी थी , जब 1950 में नेहरू-लियाकत समझौते ने उन्हें राष्ट्रहित के विरुद्ध प्रतीत हुआ, तो उन्होंने बिना किसी हिचक के मन्त्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया।

भारतीय जनसंघ: एक नई राष्ट्रवादी चेतना,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक गुरु गोलवलकर से विचार-विमर्श कर डॉ. मुखर्जी ने 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ की स्थापना की और इसके प्रथम अध्यक्ष बने। यही संगठन आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी के रूप में विकसित हुआ , आज विश्व के सबसे बड़े सदस्य-आधार वाले राजनीतिक दल के रूप में। 1952 के आम चुनावों में जनसंघ ने संसद में तीन सीटें जीतीं, जिनमें से एक पर स्वयं डॉ. मुखर्जी विजयी हुए।

कश्मीर: अन्तिम संघर्ष और बलिदान,डॉ. मुखर्जी के जीवन का सर्वाधिक तेजस्वी और अन्ततः सर्वाधिक करुण अध्याय जम्मू-कश्मीर के प्रश्न से जुड़ा है। उन्होंने अनुच्छेद 370 को भारत के बाल्कनीकरण की संज्ञा दी और शेख अब्दुल्ला के त्रि-राष्ट्र सिद्धान्त का प्रबल विरोध किया। "एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चल सकते" यह उद्घोष उनके राजनीतिक जीवन का सार बन गया।

अनुच्छेद 370 और परमिट-व्यवस्था के विरुद्ध उन्होंने जनसंघ, हिन्दू महासभा और रामराज्य परिषद के सहयोग से सत्याग्रह आरम्भ किया। बिना अनुमति-पत्र के जम्मू-कश्मीर में प्रवेश कर उन्होंने इस भेदभावपूर्ण व्यवस्था को सीधी चुनौती दी।,11 मई 1953 को उन्हें गिरफ़्तार कर श्रीनगर में नज़रबन्द रखा गया, और 23 जून 1953 को हिरासत में ही, रहस्यमय परिस्थितियों में, उनका निधन हो गया।


उनकी माता जोगमाया देवी ने उनकी मृत्यु की सत्य परिस्थितियों की जाँच हेतु आजीवन संघर्ष किया, परन्तु यह रहस्य आज भी अनुत्तरित है। इससे पूर्व भी नियति ने उन्हें कम आघात नहीं दिये थे , उन्होंने अपने एक शिशु-पुत्र को खोया, फिर अपनी पत्नी को भी , फिर भी राष्ट्रसेवा के प्रति उनका संकल्प कभी शिथिल नहीं हुआ।


प्रासंगिकता: आज के भारत में डॉ. मुखर्जी,डॉ. मुखर्जी की 125वीं जयंती ऐसे समय पड़ रही है जब उनका सबसे बड़ा स्वप्न ,जम्मू-कश्मीर का भारत में सम्पूर्ण संवैधानिक एकीकरण ,अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण के साथ साकार हो चुका है। जिस अखण्डता के लिये उन्होंने अपना जीवन अर्पित किया, वह आज संविधान के पन्नों में अंकित सत्य बन चुकी है। यह केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं, अपितु एक शिक्षाविद के उस विश्वास की पूर्ति है कि राष्ट्र की एकता किसी परिस्थितिजन्य समझौते पर नहीं, अटल सिद्धान्त पर टिकनी चाहिये।

परन्तु डॉ. मुखर्जी की प्रासंगिकता केवल कश्मीर तक सीमित नहीं है। आज जब शिक्षा-संस्थान राजनीतिक दबावों और वैचारिक ध्रुवीकरण के बीच अपनी स्वायत्तता खोजने का संघर्ष कर रहे हैं, तब उनका वह उदाहरण स्मरणीय है जिसमें एक शिक्षाविद ने विश्वविद्यालय को राजनीति से ऊपर, राष्ट्र-निर्माण का मन्दिर बनाया। जब सार्वजनिक जीवन में सिद्धान्तों के लिये पद त्यागने का साहस दुर्लभ होता जा रहा है, तब उनका मन्त्रिमण्डल-त्याग एक कालातीत आदर्श प्रस्तुत करता है।

डॉ. मुखर्जी का जीवन यह भी सिखाता है कि राष्ट्रवाद और बौद्धिकता परस्पर विरोधी नहीं , वरन एक शिक्षित, तर्कशील मस्तिष्क ही राष्ट्र के प्रति सर्वाधिक प्रगाढ़ और स्थायी प्रतिबद्धता विकसित कर सकता है। शिक्षा-विद से राष्ट्र के उच्चतम शिखर तक की उनकी यात्रा किसी सत्ता-लालसा से नहीं, अपितु ज्ञान से उपजे कर्तव्य-बोध से प्रेरित थी।

जिस व्यक्ति ने विश्वविद्यालय के कुलपति-पद को राष्ट्र-सेवा की प्रथम पाठशाला बनाया, उसी ने बलिदान को अन्तिम पाठ के रूप में स्वीकार किया यही डॉ. मुखर्जी की यात्रा का सार है।

राजेन्द्र नाथ तिवारी

 


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