दशग्रीव रावण का वध और सीता
दशग्रीव रावण का वध और सीता
विजय किसकी थी — राम की, या उस आदि-शक्ति की जिसके लिए सृष्टि ने करवट ली?
सीतायण-प्रसंग विशेष संपादकीय
खंड १ जिस युद्ध का नाम केवल राम के साथ जुड़ा
लंका के युद्ध का स्मरण जब भी होता है, चित्र में सबसे आगे धनुर्धारी राम खड़े मिलते हैं , शर-संधान करते, सेतु बाँधते, वानर-सेना का नेतृत्व करते। रावण-वध को ‘राम की विजय’ कहा गया, दशहरे के रूप में मनाया गया, और सहस्राब्दियों तक यह मर्यादा-पुरुषोत्तम के पराक्रम की कथा बनकर जन-मानस में बैठ गया। रामलीलाओं में पुतला जलता है, जय-जयकार गूँजती है, और उत्सव के केंद्र में सदा राम रहते हैं ,यह उचित भी है, क्योंकि धनुष उन्हीं के हाथ में था। किंतु एक प्रश्न सहस्राब्दियों से उपेक्षित रहा — यह युद्ध आरंभ ही क्यों हुआ था, और किसके लिए हुआ था?
उत्तर सर्वविदित है, फिर भी बार-बार दुहराया जाना आवश्यक है — यह युद्ध सीता के अपहरण के प्रतिकार में लड़ा गया था। रावण ने जो अपराध किया, वह राम के विरुद्ध नहीं, सीता के विरुद्ध था — उसने एक स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध हर लिया, उसे उसके घर और स्वतंत्रता से वंचित किया, अशोक वाटिका में मास पर मास बंदी बनाए रखा। तब यह युद्ध, मूलतः और अनिवार्यतः, सीता का युद्ध था — उनकी गरिमा, उनकी स्वतंत्रता और उनके न्याय की पुनर्स्थापना का संग्राम। लक्ष लक्ष वानर-भालुओं ने प्राण इसलिए नहीं गँवाए कि राम को सिंहासन प्राप्त हो, अपितु इसलिए कि एक स्त्री को उसका सम्मान और स्वतंत्रता लौटाई जाए।
यदि इस दृष्टि से देखा जाए, तो समूचा युद्ध-वर्णन एक भिन्न अर्थ ग्रहण कर लेता है। सेतु-बंधन सीता तक पहुँचने का मार्ग था, अंगद का दूत बनकर जाना सीता की मुक्ति की माँग थी, हनुमान का लंका-दहन सीता की पीड़ा का प्रतिकार था। संपूर्ण युद्ध की धुरी में सीता थीं — फिर भी इतिहास ने इस समग्र आख्यान को ‘रामायण’ कहा, ‘सीतायण’ नहीं। यह नामकरण स्वयं उस दृष्टिकोण का प्रमाण है, जिसे यह संपादकीय चुनौती देना चाहता है।
खंड २ : रावण का अपराध — बल का नहीं, अधिकार का प्रश्न
रावण का बल असाधारण था, उसका ज्ञान अगाध था, वह शिव का परम भक्त, सामवेद का ज्ञाता और लंका जैसे वैभवशाली राज्य का अधिपति था — यह सब वाल्मीकि स्वयं स्वीकार करते हैं। किंतु उसका पतन उसके बल में नहीं, इस भ्रम में था कि बल और वैभव के आधार पर किसी स्त्री की इच्छा को कुचला जा सकता है। पंचवटी से सीता का हरण छल से हुआ — स्वर्ण-मृग का प्रलोभन, लक्ष्मण-रेखा का उल्लंघन करवाने की युक्ति, और तत्पश्चात साधु के वेश में छद्म। यह समूचा षड्यंत्र दर्शाता है कि रावण जानता था, वह सीता को उनकी सहमति से कभी प्राप्त नहीं कर सकता। यही ज्ञान उसके अपराध को क्षमा से परे और गहन बना देता है — यह आवेग का अपराध नहीं, नियोजित अपराध था।
अशोक वाटिका में रावण ने बारंबार सीता के समक्ष अपने वैभव, अपनी शक्ति और अपने राज्य का प्रलोभन रखा, और असफल होने पर भय भी दिखाया। सीता का उत्तर हर बार एक ही रहा — दृढ़, निर्भीक, अडिग। एक बंदिनी होकर भी उन्होंने कभी अपनी अस्मिता से समझौता नहीं किया, न धन से प्रलोभित हुईं, न मृत्यु के भय से विचलित। उन्होंने रावण को स्पष्ट कहा कि जिस प्रकार सिंहनी का भाग सियार न हो सके, उसी प्रकार राम की भार्या किसी अन्य की नहीं हो सकती। यह प्रसंग स्वयं में सीता के चरित्र की उस शक्ति का प्रमाण है, जिसे ‘असहाय बंदिनी’ के रूप में चित्रित करना इतिहास की सबसे बड़ी भूल रही है।
ध्यान देने योग्य है कि सीता के पास त्रिजटा के स्वप्न और अपने तप-बल से यह सामर्थ्य था कि वे चाहतीं तो रावण को भस्म कर सकती थीं — पातिव्रत्य की शक्ति से उत्पन्न तेज इतना प्रबल था। किंतु उन्होंने संयम रखा, क्योंकि उनका विश्वास था कि न्याय स्वयं धर्म की मर्यादा में होकर आएगा। यह संयम दुर्बलता नहीं था, यह शक्ति का सर्वोच्च रूप था — जो शक्ति विनाश कर सकती है, पर धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करती है, वही वास्तविक शक्ति कहलाती है।
खंड ३ : महिषासुर और रावण , शक्ति के समक्ष अहंकार का पतन
भारतीय परंपरा में यह कोई नई कल्पना नहीं कि दुर्दांत असुरों का अंत किसी स्त्री-शक्ति के निमित्त हुआ हो। महिषासुर का वध देवी दुर्गा के हाथों हुआ, क्योंकि देवताओं का संयुक्त तेज भी उसे परास्त न कर सका था और अंततः उसी तेज ने एक स्त्री-रूप धारण किया। रावण के प्रसंग में प्रत्यक्ष कर्ता राम थे, किंतु सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो निमित्त और प्रेरणा दोनों सीता ही थीं — उनके सतीत्व का तेज, उनकी तपस्या, उनका अडिग धैर्य ही वह अदृश्य शक्ति थी जिसने रावण के अंत की भूमिका रची।
देवी माहात्म्य में दुर्गा के विषय में कहा गया है —
“या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”
अर्थात् — जो देवी समस्त प्राणियों में माता के रूप में विराजमान हैं, उन्हें बारंबार नमन है। सीता का चरित्र इसी मातृ-शक्ति और आदि-शक्ति के समन्वित रूप का प्रतिनिधित्व करता है — वे भूमिपुत्री थीं, अर्थात साक्षात प्रकृति की संतान, और उनका धरती में जन्म तथा धरती में समाहित होना इस बात का प्रतीक है कि वे स्वयं धरा की शक्ति का सगुण रूप थीं। रावण जैसे अहंकारी शासक का अंत, जिसने प्रकृति (सीता) पर बलपूर्वक अधिकार जताने का दुस्साहस किया था, उसी प्रकृति की मूक किन्तु अजेय शक्ति के समक्ष निश्चित था।
“जिस प्रकार महिषासुर देवताओं के शस्त्रों से नहीं, शक्ति के तेज से गिरा, उसी प्रकार रावण का पतन राम के बाणों से पूर्व, सीता की तपस्या और अडिग धैर्य से पूर्वनिश्चित हो चुका था।”
खंड ४ : वध का क्षण — मुक्ति किसकी हुई?
जब राम की बाणों ने रावण के दसों शीश एक-एक कर छिन्न किए, तो देवताओं ने आकाश से पुष्प-वर्षा की, ऐसा वर्णन मिलता है। यह क्षण धर्म की अधर्म पर विजय का क्षण था। किंतु स्मरण रखना होगा कि यह विजय गीता के उस सिद्धांत की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति थी, जो स्वयं भगवान के मुख से कहा गया —
“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥”
अर्थात् — साधुओं की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ। इस श्लोक में ‘साधुओं की रक्षा’ शब्द पर ध्यान दें — रावण-वध केवल दुष्ट का दंड नहीं था, यह मूलतः एक बंदिनी स्त्री की रक्षा और उसके न्याय की स्थापना थी। यदि सीता न होतीं, यह युद्ध न होता। यदि सीता का अपमान न हुआ होता, दंड का यह विधान अनावश्यक होता। तब न्यायोचित यह होगा कि इस विजय को ‘सीता-न्याय’ के नाम से भी स्मरण किया जाए, केवल ‘राम-विजय’ के नाम से नहीं। यह कोई भाषिक सूक्ष्मता नहीं, यह उस मूल सत्य की पुनर्स्थापना है जिसे इतिहास ने जानबूझकर धुँधला होने दिया।
रावण के पतन के उस क्षण में सीता की मुक्ति निहित थी — शारीरिक बंधन से मुक्ति। विभीषण और वानर-सेना का हर्ष, अयोध्या में बज उठे शंख-नाद, अशोक वाटिका के वृक्षों तले वर्षों से बैठी उस स्त्री के मुख पर उतरी शांति — यह सब उस मुक्ति के अंग थे। किंतु इतिहास की विडंबना यह रही कि शारीरिक मुक्ति के तुरंत पश्चात उन्हें एक और, कहीं अधिक क्रूर परीक्षा से गुजरना पड़ा, जिसकी माँग स्वयं उस समाज ने की जिसके न्याय के लिए यह संपूर्ण युद्ध लड़ा गया था।
जिस स्त्री की मुक्ति के लिए दशग्रीव रावण का समूल नाश हुआ, उसी स्त्री को अपनी शुचिता प्रमाणित करने के लिए अग्नि में प्रवेश करने को कहा गया — यह प्रसंग सीतायण के आगामी अध्यायों में विस्तार से उठाया जाएगा। विजय के जयघोष के मध्य यह विडंबना दब गई, पर इतिहास से यह मिट नहीं सकती, और न मिटनी चाहिए। एक सभ्यता जो अपने नायकों का उत्सव मनाती है, उसे अपनी नायिकाओं के साथ हुए अन्याय का स्मरण भी उतनी ही निष्ठा से रखना चाहिए।
खंड ५ : स्मृति का असंतुलन , मंदिर राम के, मौन सीता का
आज भारत भर में राम के नाम पर सहस्रों मंदिर हैं — अयोध्या से रामेश्वरम तक, हर नगर, हर ग्राम में राम-मंदिर मिलेगा। रामसेतु, राम की पैड़ी, राम-घाट — भूगोल का हर कोना राम के नाम से अलंकृत है। किंतु सीता से जुड़े स्थल — जनकपुर, सीतामढ़ी, पंचवटी की वह कुटिया जहाँ उन्होंने वर्ष बिताए, अशोक वाटिका जिसने उनकी तपस्या देखी, और वह स्थान जहाँ धरती ने उन्हें अंततः अपने भीतर समा लिया — ये सब स्थल तुलनात्मक रूप से उपेक्षित, अल्पज्ञात और जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मिलते हैं। यह असंतुलन संयोग नहीं, यह उसी दृष्टिकोण का विस्तार है, जिसने युद्ध को ‘राम-विजय’ कहा और सीता के योगदान को कोष्ठक में डाल दिया।
यदि रावण-वध सीता के न्याय की स्थापना के लिए हुआ था, तो तर्कसंगत यह होगा कि सीता से जुड़े स्थल भी उतने ही सम्मान और संरक्षण के अधिकारी हों जितने राम से जुड़े स्थल हैं। एक सभ्यता का चरित्र इस बात से भी मापा जाता है कि वह अपनी स्त्री-शक्तियों की स्मृति को कितनी निष्ठा से संजोती है। सीतायण का यह आग्रह है कि आने वाली पीढ़ियाँ रावण-वध को केवल राम के पराक्रम के उत्सव के रूप में नहीं, अपितु सीता के प्रति हुए अन्याय के प्रतिकार और उनके सम्मान की पुनर्स्थापना के रूप में भी स्मरण करें।
खंड ६ : देवी-रूप की पुनः स्थापना
देवी माहात्म्य में शक्ति की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है —
“सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥”
अर्थात् — हे सर्वमंगलों में मंगलकारिणी, कल्याणकारिणी, समस्त अर्थों को सिद्ध करने वाली, शरण देने योग्य नारायणी देवी, आपको नमस्कार है। यह श्लोक शक्ति को ‘शरण्या’ अर्थात शरण देने वाली कहता है, शरण माँगने वाली नहीं। सीता की संपूर्ण गाथा में यही विरोधाभास मूल रूप से प्रकट होता है — जो स्वयं शक्ति का सगुण रूप थीं, संरक्षण की स्रोत थीं, उन्हीं को बारंबार अपने अस्तित्व का प्रमाण देने की स्थिति में ला खड़ा किया गया।
रावण-वध का प्रसंग इस दृष्टि से केवल युद्ध की कथा नहीं, यह प्रश्न है कि शक्ति की रक्षा के पश्चात समाज उस शक्ति को उसका यथोचित सम्मान क्यों नहीं दे पाया। नारायणी शब्द का अर्थ है — नारायण की शक्ति, अर्थात विष्णु की वह ऊर्जा जिसके बिना विष्णु स्वयं अपूर्ण हैं। यदि राम विष्णु के अवतार हैं, जैसा पुराणों में वर्णित है, तो सीता उसी नारायणी शक्ति का सगुण रूप हैं — रावण-वध उनकी अनुपस्थिति में नहीं, उनकी प्रेरणा और उनके तेज से ही संभव हो सका। यह समझना आवश्यक है कि शक्ति के बिना पुरुष-तत्व निष्क्रिय है, और यही सिद्धांत रावण-वध की संपूर्ण घटना में मूर्त होता दिखता है।
खंड ७ : सीतायण की दृष्टि — विजय का पुनर्पाठ
इतिहास को पुनः पढ़ने का अर्थ तथ्यों को बदलना नहीं, अपितु उन्हीं तथ्यों को समग्रता से देखना है। रावण-वध हुआ, राम के बाणों से हुआ, यह असंदिग्ध सत्य है — इसमें कोई परिवर्तन आवश्यक नहीं। किंतु इस सत्य के साथ यह दूसरा सत्य भी उतनी ही दृढ़ता से स्थापित होना चाहिए कि यह युद्ध सीता के लिए, सीता के कारण और अंततः सीता के तेज से संभव हुआ। एक ही घटना के ये दोनों पक्ष परस्पर विरोधी नहीं, परस्पर पूरक हैं — जैसे धनुष और प्रत्यंचा, जैसे शिव और शक्ति, जैसे विष्णु और लक्ष्मी।
जब तक हम रावण-वध को केवल ‘राम-विजय’ के रूप में पढ़ते रहेंगे, तब तक सीता की गाथा अधूरी और एकपक्षीय बनी रहेगी। सीतायण का प्रयास इसी अपूर्णता को पूर्ण करने का है — यह दिखाने का कि जिस स्त्री को समाज ने वर्षों तक ‘अपहृता’, ‘परीक्षित’, ‘त्यक्ता’ जैसे विशेषणों में बाँधे रखा, वही स्त्री वास्तव में उस संपूर्ण गाथा की आधार-शक्ति, प्रेरणा-स्रोत और अंततः विजय की वास्तविक अधिकारिणी थी।
उपादेय विचार —
इतिहास ने रावण-वध को सदा राम-कथा के चरमोत्कर्ष के रूप में पढ़ाया, यह उचित भी है। किंतु यदि इस प्रसंग को सीता की दृष्टि से पढ़ा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि विजय का वास्तविक अधिकार उस अस्मिता का था जिसकी रक्षा के लिए यह संपूर्ण युद्ध लड़ा गया। जब तक हम रावण-वध को ‘सीता-न्याय’ के रूप में भी स्मरण नहीं करते, यह गाथा अधूरी रहेगी। आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाना आवश्यक है कि प्रत्येक विजय के मूल में जो शक्ति निहित होती है, उसका सम्मान विजेता के सम्मान से किसी भी दृष्टि से न्यून नहीं होना चाहिए।
— सीतायण में आगे : लंका-विजय के पश्चात सीता की मनोदशा, अग्निपरीक्षा का प्रश्न, और अयोध्या-वापसी की जटिलता —

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