राजनीति और मत्स्य न्याय - कौटिल्य का भारत

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शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

राजनीति और मत्स्य न्याय

 

राजनीति और मत्स्य न्याय

टीम  कौटिल्य, 272001

"मत्स्य न्याय" केवल एक प्राचीन उपमा नहीं, बल्कि मानव समाज की सबसे कठोर राजनीतिक वास्तविकता है। इसका अर्थ है—जब राज्य दुर्बल हो जाए, कानून निष्प्रभावी हो जाए और शासन पक्षपाती हो जाए, तब शक्तिशाली व्यक्ति, वर्ग या समूह निर्बलों का अधिकार छीनने लगता है। जैसे जल में बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है, वैसे ही अराजक समाज में बलवान निर्बलों को निगल जाते हैं।कौटिल्य ने इस सत्य को हजारों वर्ष पूर्व पहचान लिया था। उन्होंने स्पष्ट कहा कि राज्य की उत्पत्ति केवल कर वसूलने या सीमाओं की रक्षा के लिए नहीं हुई, बल्कि मत्स्य न्याय की समाप्ति के लिए हुई। जहाँ न्याय नहीं, वहाँ राज्य नहीं; जहाँ दंड का भय नहीं, वहाँ धर्म नहीं; और जहाँ धर्म नहीं, वहाँ सभ्यता अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकती।

राजनीति का उद्देश्य किसी दल, व्यक्ति या वंश को सत्ता तक पहुँचाना नहीं है। राजनीति का सर्वोच्च धर्म न्याय है। सत्ता तभी वैध है, जब वह सबसे कमजोर नागरिक को भी सुरक्षा, सम्मान और न्याय का विश्वास दिला सके। यदि राजनीति स्वयं अन्याय का उपकरण बन जाए, तो लोकतंत्र भी मत्स्य न्याय का नया रूप बन जाता है।जब अपराधी कानून से अधिक शक्तिशाली दिखाई देने लगें, जब धनबल और बाहुबल जनमत पर हावी हो जाएँ, जब प्रशासन निष्पक्षता खो दे, जब न्याय वर्षों तक प्रतीक्षा कराए और जब ईमानदार व्यक्ति स्वयं को असहाय अनुभव करने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि मत्स्य न्याय लौट रहा है। ऐसी स्थिति में संविधान की पुस्तकें तो रहती हैं, पर संविधान की आत्मा घायल हो जाती है।

किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सेना, उसकी अर्थव्यवस्था या उसके संसाधनों से पहले उसकी न्याय-व्यवस्था होती है। जिस राष्ट्र में न्याय बिकने लगे, वहाँ विकास भी अंततः कुछ लोगों की संपत्ति बनकर रह जाता है। असमानता, शोषण और अविश्वास उसी भूमि पर जन्म लेते हैं जहाँ राजनीति अपने धर्म से विमुख हो जाती है।

इसलिए राजनीति का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसने कितने पुल, सड़कें या भवन बनाए; बल्कि इस आधार पर होना चाहिए कि उसने कितने निर्बलों को भयमुक्त जीवन दिया, कितनों को न्याय दिलाया और कितनों के अधिकारों की रक्षा की।राज्य की शक्ति का सर्वोच्च प्रमाण उसका कठोर होना नहीं, बल्कि उसका न्यायपूर्ण होना है। दंड का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं, व्यवस्था की रक्षा है। कानून का उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि नागरिकों में विश्वास स्थापित करना है। यही राजनीति का सनातन दर्शन है।

आज भी यदि भारत को एक सशक्त, समृद्ध और विश्वगुरु राष्ट्र बनना है, तो उसे मत्स्य न्याय की प्रत्येक प्रवृत्ति—चाहे वह भ्रष्टाचार हो, अपराध हो, सत्ता का दुरुपयोग हो या सामाजिक शोषण—का कठोरता से उन्मूलन करना होगा। क्योंकि जहाँ मत्स्य न्याय समाप्त होता है, वहीं से राष्ट्रधर्म प्रारंभ होता है; और जहाँ न्याय जीवित रहता है, वहीं सभ्यता अमर होती है।

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1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही सुन्दर और सराहनीय पहल आदरणीय श्री मान जी।।
    आचार्य
    सूर्य प्रकाश शुक्ल।।

    जवाब देंहटाएं

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