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गुरुवार, 2 जुलाई 2026

वह बालिका जो राजकुमारी से देवी बन गई


 




वह बालिका जो राजकुमारी से देवी बन गई 


मिथिला की राजकुमारी,बाल्यकाल, शिक्षा, कुलदेवी और शिव-धनुष,वह बालिका जो राजकुमारी से देवी बन गई 



 

जनकात्मजे जगज्जननि जानकि।भूमिजे भवानि भक्तवत्सले,

सीते सत्यरूपे सर्वशक्तिमे।त्वाम् नमामि नित्यम् भक्तिपूर्वकम्॥

 हे जनक-पुत्री, जगत्-जननी जानकी! हे भूमि से जन्मी, भवानी, भक्तों पर करुणा करने वाली! हे सीते, सत्यस्वरूपा, सर्वशक्तिमयी! मैं प्रतिदिन भक्तिपूर्वक तुम्हें नमन करता हूँ।

"मिथिला की वह बालिका केवल जनक की पुत्री नहीं थी . वह उस धरती का स्वाभिमान थी जो आज भी उसे 'जानकी माँ' कहकर पुकारती है।"


 मिथिला वह नगरी जो सीता के बिना अधूरी है::मिथिला। यह नाम सुनते ही एक चित्र उभरता है , हरे-भरे खेत, सरयू-गंडक की जलधाराएँ, मिथिला-चित्रकला की रेखाएँ और एक ऐसी संस्कृति जो वेद जितनी पुरानी और आज भी उतनी ही जीवंत है।

मिथिला केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है। यह एक विचार है, एक परंपरा है, एक जीवन-दर्शन है। यहाँ के राजा जनक केवल शासक नहीं थे वे ब्रह्मज्ञानी थे। उनके दरबार में ऋषि-मुनि शास्त्रार्थ करते थे। याज्ञवल्क्य जैसे महर्षि यहाँ आते थे।और इसी मिथिला में इसी ज्ञान-परंपरा की गोद में सीता का बाल्यकाल बीता।

मिथिलायाम् महाराज्ञि जनकस्य सुता शुभा।

 सीता सर्वगुणोपेता ज्ञानशक्तिस्वरूपिणी॥

 मिथिला की महारानी, राजा जनक की पुत्री, शुभ सीता समस्त गुणों से सम्पन्न और ज्ञान एवं शक्ति की साक्षात् स्वरूपा थीं।यह मिथिला वही भूमि है जहाँ आज भी 'जय सिया राम' में 'सिया' पहले आती है। यह संयोग नहीं , यह मिथिला की सांस्कृतिक समझ है। मिथिला जानती थी कि उसकी बेटी राम से पहले है , राम से बड़ी है।


  शिशु सीता का लालन-पालन — दो माताएँ, दो संसार,सीता की दो माताएँ थीं।एक धरती माँ।जिसने उन्हें अपने गर्भ से प्रकट किया, जो उनकी वास्तविक जननी थी, जिसके पास वे अंत में लौट गईं।दूसरी रानी सुनयना। जनक की पत्नी, जिन्होंने उस नवजात को माँ का दूध और वात्सल्य दिया।इन दो माताओं के बीच सीता का बाल्यकाल बीता एक ओर धरती की ऊर्जा, दूसरी ओर मनुष्य का स्नेह। यही दो शक्तियाँ सीता को असाधारण बनाती हैं।

भूमिर्माता जनकश्च पिता, सुनयना मातृवत्सला।द्विमातृका महाशक्तिः सीता सर्वजगत्प्रिया॥

भूमि माता है, जनक पिता हैं और सुनयना माँ के समान वात्सल्यमयी हैं। दो माताओं की महाशक्ति सीता सम्पूर्ण जगत् की प्रिया हैं।रानी सुनयना ने सीता को वह सब दिया जो एक माँ दे सकती है संस्कार, शिक्षा, स्नेह और वह दृष्टि जो एक बेटी को अपनी शक्ति पहचानने में मदद करती है। इतिहास ने सुनयना को वह स्थान नहीं दिया जिसकी वे अधिकारिणी हैं किन्तु 'सीतायण उनका ऋण स्वीकार करता है।


मिथिला की कुलदेवी माँ देवली :: सीता की आध्यात्मिक नींवमिथिला राजवंश की कुलदेवी थीं माँ देवली। उनका मंदिर जनकपुर के निकट आज भी विद्यमान है। वे मिथिला की आराध्या शक्ति हैं क्षेत्र की रक्षिका, वंश की पोषक।सीता का प्रातःकाल माँ देवली की वंदना से आरंभ होता था। जनक-महल में यह परंपरा थी कि प्रत्येक कन्या को कुलदेवी की उपासना सिखाई जाए क्योंकि कुलदेवी केवल देवता नहीं, वे वंश की स्मृति हैं, परंपरा की धारा हैं।

देवलि देवि महाशक्ति मिथिलाकुलरक्षिणि।सीतायाः प्रथमं पूज्या त्वमेव जगदम्बिके॥

हे देवली देवी, महाशक्ति, मिथिला-कुल की रक्षिका! हे जगदम्बिके, सीता की प्रथम पूज्या तुम्हीं हो।

माँ देवली की उपासना ने सीता के व्यक्तित्व को वह आधार दिया जो आगे के समस्त संघर्षों में उनकी शक्ति बनी। जब अशोक वाटिका में रावण ने उन्हें भयभीत करने का प्रयास किया वे नहीं डरीं। जब अग्नि में प्रवेश करना पड़ा वे विचलित नहीं हुईं। जब वन में गर्भावस्था में एकाकी जीवन बिताना पड़ा वे टूटी नहीं। यह शक्ति कहाँ से आई? माँ देवली की उपासना से। वह बाल्यकाल की साधना जो अयोध्या में पहुँचते ही छिन गई वही सीता की असली ताकत थी।


सीता की शिक्षा , वह ज्ञान जिसे इतिहास ने भुला दिया,जनक के दरबार में शिक्षा का स्तर उच्चतम था। याज्ञवल्क्य, अष्टावक्र जैसे महर्षि यहाँ आते थे। दार्शनिक वाद-विवाद होते थे। और इस वातावरण में पली-बढ़ी सीता।सीता की शिक्षा में क्या-क्या था?वेदपाठ और मंत्रविद्या राजकुल की परंपरा के अनुसारधनुर्विद्या जनक की पुत्री होने के नाते शस्त्र-शिक्षा भी,आयुर्वेद और वनस्पति-ज्ञान जो वनवास में उनके काम आया,संगीत और कला मिथिला की परंपरा का अंग ,राजनीति और शासन-व्यवस्था ,भावी महारानी की तैयारी

दर्शन और अध्यात्म जनक के घर की विरासत

वेदविद्या धनुर्विद्या नीतिशास्त्रं च पालने।सर्वविद्यासु निपुणा सीता जनकनन्दिनी॥

वेदविद्या, धनुर्विद्या, नीतिशास्त्र और पालन-पोषण , समस्त विद्याओं में निपुण थीं जनक-नंदिनी सीता।वह सीता , जो समस्त विद्याओं में निपुण थी , आगे चलकर समाज की दृष्टि में 'केवल पत्नी' बन गई। यह समाज का दोष था, सीता की कमी नहीं।


माहिथिली महोपनिषद् सीता का सप्त ऋषियों से संवाद,::यह प्रसंग अत्यंत दुर्लभ है और प्रायः अज्ञात है।मिथिला की परंपरा में 'माहिथिली महोपनिषद्' का उल्लेख मिलता है , जिसमें बालिका सीता का सप्त ऋषियों के साथ दार्शनिक संवाद वर्णित है।ऋषियों ने पूछा 'देवि, ब्रह्म क्या है?' सीता ने उत्तर दिया ,यत् सर्वं व्याप्य तिष्ठति निराकारं निरञ्जनम्।सीतारूपेण सा शक्तिः ब्रह्मैव सनातनम्॥ जो सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है, निराकार और निरंजन है सीता के रूप में वही शक्ति ही सनातन ब्रह्म है।ऋषि स्तब्ध रह गए। उन्होंने उस बालिका के चरण स्पर्श किए। यह वह सीता है जिसे हम नहीं जानते। यह वह सीता है जिसे 'सीतायण' सामने लाना चाहता है , एक दार्शनिक, एक ज्ञानी, एक पूर्ण व्यक्तित्व।जो बालिका सप्त ऋषियों को उत्तर दे सकती थी , उसे लोकापवाद के डर से वन में भेजना क्या न्याय था? यह प्रश्न 'सीतायण' पूछता है। वह अद्भुत प्रसंग बालिका सीता और शिव-धनुष,यह प्रसंग रामायण में आता है किन्तु प्रायः उसकी गहराई को नहीं समझा जाता।एक दिन बालिका सीता खेलते-खेलते जनक के शस्त्रागार में पहुँच गईं। वहाँ एक विशाल पेटिका रखी थी जिसमें शिव का धनुष था। वह धनुष जिसे हज़ारों सैनिक मिलकर भी नहीं हिला सकते थे। सीता ने उस पेटिका को उठाकर एक ओर रख दिया जैसे वह कोई साधारण वस्तु हो।

बालिका सीता लीलया शिवचापम् उदावहत्।यत् सहस्रैः न शक्यते सा एकाकिनी चकार तत्॥

भावार्थ : बालिका सीता ने खेल-खेल में शिव-धनुष को उठा दिया जो सहस्रों लोगों से न उठता था, वह उसने अकेले कर दिखाया। राजा जनक ने यह देखा। और उसी क्षण उन्होंने निश्चय किया — इस कन्या का विवाह उसी से होगा जो इस धनुष को न केवल उठाए, बल्कि उस पर प्रत्यंचा चढ़ाए।

जनक की यह प्रतिज्ञा केवल एक विवाह-शर्त नहीं थी। यह एक पिता का अपनी पुत्री के प्रति सम्मान था कि इस कन्या के योग्य कोई साधारण मनुष्य नहीं हो सकता।किन्तु प्रश्न यह उठता है ,यदि सीता स्वयं वह धनुष उठा सकती थीं तो उसे तोड़ क्यों नहीं? क्या उन्होंने जानबूझकर केवल उठाया तोड़ा नहीं? क्योंकि वे जानती थीं कि तोड़ने का कार्य किसी और के लिए नियत है?

यह सीता की बुद्धिमत्ता है वे जानती थीं कि कब शक्ति दिखानी है और कब छुपानी है। यह उनकी कमज़ोरी नहीं यह उनकी महानता है।


सीता और प्रकृति ,एक अटूट बंधन

मिथिला के बाल्यकाल में सीता प्रकृति की अत्यंत निकट थीं। वे पशु-पक्षियों की भाषा समझती थीं यह लोककथाओं में वर्णित है। वे वनस्पतियों को पहचानती थीं, उनके गुण जानती थीं।

वृक्षाः पुष्पाणि खगाः पशवश्च।सर्वे सीतायाः सखायः परमप्रियाः।धरित्री-पुत्री सर्वभूतहितैषिणी।प्रकृतिमाता सीतां नित्यम् रक्षति॥ वृक्ष, फूल, पक्षी और पशु सभी सीता के परम प्रिय सखा थे। धरती-पुत्री सीता समस्त प्राणियों की हितैषी थीं। प्रकृति-माता सदा सीता की रक्षा करती थीं।

यह प्रकृति-प्रेम ही वनवास में उनका सबसे बड़ा सहारा बना। जब अयोध्या के महल छूट गए, जब राजसी वैभव छूट गया तब भी प्रकृति उनके साथ थी। पंचवटी के वृक्ष उनके साथी बने, वन की नदियाँ उनकी सहेलियाँ बनीं।धरती ने अपनी पुत्री को कभी अकेला नहीं छोड़ा भले ही मनुष्यों ने उन्हें बार-बार अकेला किया।


सीता का स्वभाव :: निर्भीकता और विनम्रता का संगम,सीता के बाल्यकाल की एक और विशेषता थी जो प्रायः अनदेखी रह जाती है उनकी निर्भीकता।वे विनम्र थीं किन्तु दब्बू नहीं। वे शांत थीं किन्तु मौन नहीं। जब आवश्यक होता, वे अपनी बात कहती थीं स्पष्ट और दृढ़ता से।

विनयेन समायुक्ता धैर्येण परिवेष्टिता।निर्भया सत्यवाक् सीता जगद्वंद्या सनातनी॥

विनय से युक्त, धैर्य से आवृत्त, निर्भय और सत्यवादी सीता जगत् में वंदनीय और सनातन हैं।जब वन में जाने का निर्णय हुआ किसी ने सीता से नहीं पूछा। किन्तु सीता ने स्वयं निर्णय लिया। उन्होंने राम से कहा 'मैं वन आऊँगी।' यह आज्ञापालन नहीं था यह एक स्वतंत्र निर्णय था।

यह वह सीता है जिसे हम भूल जाते हैं।


पुष्पवाटिका , वह क्षण जब दो नियतियाँ मिलीं

विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को लेकर जनकपुर आए। एक दिन राम पुष्पवाटिका में आए पूजा के लिए पुष्प लेने।और उसी समय सीता भी वहाँ आईं माँ पार्वती की पूजा के लिए।दोनों की दृष्टियाँ मिलीं। एक क्षण के लिए समय रुक गया।

पुष्पवाटिकायां तत्र दृष्टिः सम्मिलिता द्वयोः।सीता-रामयोः प्रथमं साक्षात् ब्रह्मसम्भवम्।ना तत् नयनमिलनम् मात्रम् — जगत्सृष्टेः संकेतः॥

पुष्पवाटिका में दोनों की दृष्टियाँ मिलीं। सीता और राम का यह प्रथम साक्षात् ब्रह्म-संयोग था। वह केवल नयन-मिलन नहीं था — वह जगत् की सृष्टि का संकेत था। इस क्षण को तुलसीदास ने अत्यंत सुंदरता से लिखा है 'लोचन जुड़ाने, मन हर लेने।' किन्तु 'सीतायण' इस क्षण को राम की दृष्टि से नहीं सीता की दृष्टि से देखता है। सीता ने उस क्षण क्या सोचा? क्या उन्होंने राम को पहचाना? क्या उनके मन में कोई संकेत हुआ? क्या उनकी माँ देवली ने उन्हें कुछ बताया था?

लोककथाओं में यह वर्णित है कि सीता ने पुष्पवाटिका में माँ पार्वती से वर माँगा था 'हे माँ, मुझे वही पति दो जो तुम्हें योग्य लगे।' और माँ ने मुस्कुराकर राम की ओर संकेत किया। अर्थात् सीता ने राम को नहीं चुना माँ पार्वती ने सीता के लिए राम को चुना। और सीता ने वह चुनाव स्वीकार किया , पूर्ण श्रद्धा से, पूर्ण विश्वास से।


मिथिला की वह बेटी जिसे अयोध्या ने नहीं पहचाना,::मिथिला का बाल्यकाल सीता को वह सब दे गया जो उनके सम्पूर्ण जीवन का आधार बना ,माँ देवली की उपासना ने उन्हें आध्यात्मिक शक्ति दी,जनक के ज्ञान-वातावरण ने उन्हें बौद्धिक तेज दिया,शिव-धनुष प्रसंग ने उनके शारीरिक बल को प्रमाणित किया,प्रकृति-प्रेम ने उन्हें जीवनशक्ति दी,सप्त ऋषियों से संवाद ने उन्हें दार्शनिक गहराई दी ,यह सब लेकर सीता अयोध्या गईं। किन्तु अयोध्या ने उन्हें उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के साथ नहीं देखा ,केवल 'राम की पत्नी' देखा।

यह अयोध्या की सबसे बड़ी भूल थी। और इसी भूल का परिणाम आगे की पूरी कथा है।

मिथिला देयं यत् सीतायै तत् अयोध्या नाशयत्।कुलदेव्याः विस्मरणम् , मूलम् सर्वस्य संकटस्य॥यदा नारी न पूज्यते , तदा वंशः विनश्यति।अयोध्यायाः इतिहासः , एतस्य प्रमाणम् जगति॥

मिथिला ने सीता को जो दिया , अयोध्या ने उसे नष्ट कर दिया। कुलदेवी का विस्मरण , यही समस्त संकट का मूल है। जब नारी का सम्मान नहीं होता , तब वंश का नाश होता है। अयोध्या का इतिहास इसी का जगत् में प्रमाण है।

"मिथिला की वह बेटी ,जो धरती से आई थी, जिसने शिव-धनुष हिलाया था, जिसने ऋषियों को उत्तर दिए थे अयोध्या में पहुँचकर 'बहू' बन गई। यह परिवर्तन ही उनकी त्रासदी का प्रथम बीज था।"






सीतायण| राजेन्द्र नाथ तिवारी

kautilyakabharat.com



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