वन्दे मातरम् और श्रम एव जयते
राष्ट्र-निर्माण की दो अग्नियाँ — मातृभक्ति और श्रमशक्ति
वन्दे मातरम्। सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्।
शस्यश्यामलां मातरम्। वन्दे मातरम्।।
यह केवल एक गीत नहीं, यह करोड़ों भारतीयों की आत्मा से उठी हुई वह पुकार है जिसने पराधीनता की शृंखलाओं को तोड़ने का संकल्प जगाया था। आज जब हम स्वतंत्र भारत में साँस ले रहे हैं, तब यह प्रश्न और भी मार्मिक हो जाता है—क्या केवल कंठ से 'वन्दे मातरम्' कहना ही पर्याप्त है, या इस भूमि के प्रति हमारा कर्तव्य उससे कहीं अधिक गहरा और ठोस है? उत्तर स्पष्ट है—मातृभूमि की सच्ची वन्दना तभी पूर्ण होती है जब वह श्रम, त्याग और सेवा के रूप में धरातल पर उतरती है। यही कारण है कि भारतीय चिन्तन ने सदा एक दूसरे महावाक्य को साथ-साथ गुँथा है'श्रम एव जयते', अर्थात् श्रम ही की विजय होती है, श्रम ही सत्य की प्रतिष्ठा करता है, श्रम ही राष्ट्र को अमरत्व प्रदान करता है।
मातृभूमि की वन्दना : केवल भावना नहीं, उत्तरदायित्व::बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने जब 'आनन्दमठ' में इस गीत की रचना की, तब उनका उद्देश्य केवल भावुक देशप्रेम जगाना नहीं था, अपितु यह स्मरण कराना भी था कि मातृभूमि किसी कल्पना की वस्तु नहीं, अपितु साक्षात् देवी स्वरूपा है—जिसकी रक्षा, पोषण और समृद्धि का दायित्व उसकी प्रत्येक संतान पर है। हमारे ऋषियों ने भी इसी भाव को अत्यन्त प्राचीन काल में प्रतिपादित किया था—माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।(अथर्ववेद, भूमिसूक्त) अर्थात् यह पृथ्वी मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूँ। यह सम्बन्ध केवल भौगोलिक नहीं, अपितु आत्मिक है। किन्तु पुत्र का धर्म क्या होता है? क्या वह केवल माता की स्तुति गाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ले? नहीं! सच्चा पुत्र वह है जो माता के लिए परिश्रम करता है, उसकी सेवा करता है, उसके सम्मान की रक्षा के लिए अपना पसीना और यदि आवश्यक हो तो रक्त भी बहाने को तत्पर रहता है। आज के भारत में हमें इसी सत्य को पुनः जीवन्त करने की आवश्यकता है—राष्ट्रभक्ति केवल जयघोष में नहीं, श्रम में प्रकट होनी चाहिए।
श्रम की महिमा : भारतीय दर्शन का शाश्वत उद्घोष::भारतीय परम्परा में श्रम को कभी हेय दृष्टि से नहीं देखा गया, अपितु उसे यज्ञ के समकक्ष पवित्र कर्म माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ष्ण अर्जुन को जो उपदेश देते हैं, वह आज भी प्रत्येक श्रमिक, किसान, कारीगर और उद्यमी के लिए मार्गदर्शक प्रकाशस्तम्भ है—कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ४७)इस श्लोक में निहित संदेश केवल आध्यात्मिक नहीं, अत्यन्त व्यावहारिक भी है—तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल की चिन्ता में उलझकर कर्म से विमुख मत होओ। यही वह भावना है जिसने भारत के करोड़ों श्रमिकों, किसानों, बुनकरों, शिल्पियों को सदियों से इस धरती की सेवा में लगाए रखा—बिना यश की कामना के, बिना प्रतिफल की प्रतीक्षा किए। गीता का एक अन्य श्लोक श्रम और यज्ञ की समानता को और स्पष्ट करता है—
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्।।
(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ३, श्लोक १०)अर्थात् सृष्टिकर्ता ने यज्ञ अर्थात् श्रम-सहित ही प्रजा की रचना की और कहा कि इसी के द्वारा तुम समृद्ध होओगे। यह श्रम ही कामधेनु के समान सब इच्छाओं को पूर्ण करने वाला है। ऋग्वेद में भी श्रम और कर्मठता की महिमा अत्यन्त ओजस्वी शब्दों में गाई गई है—चरैवेति चरैवेति।(ऐतरेय ब्राह्मण) चलते रहो, चलते रहो—यह केवल दो शब्द नहीं, यह सम्पूर्ण भारतीय जीवन-दर्शन का सार है। स्थिरता में पतन है, गति में ही जीवन है, और श्रम ही वह गति है जो व्यक्ति को, समाज को और राष्ट्र को आगे ले जाती है। तभी तो कहा गया—
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।
(पञ्चतन्त्र)लक्ष्मी उसी पुरुषसिंह के पास जाती है जो उद्योगशील है, पुरुषार्थी है, परिश्रमी है। यह सूत्र आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सहस्राब्दियों पूर्व था।
इतिहास साक्षी है : मातृभक्ति और श्रमशक्ति का संगम::जब हम भारत के स्वाधीनता संग्राम का अवलोकन करते हैं, तो पाते हैं कि 'वन्दे मातरम्' का घोष सदैव श्रम और त्याग के साथ ही गूँजा। चाहे वह सूत कातती चरखे की मूक ध्वनि हो, चाहे नमक सत्याग्रह में परिश्रम से सिंचित डांडी यात्रा हो, चाहे स्वदेशी आन्दोलन में अपने ही हाथों से उद्योग-धन्धे खड़े करने का संकल्प हो—प्रत्येक क्षण में मातृभक्ति श्रम के रूप में मूर्तिमान हुई। लोकमान्य तिलक का यह कथन इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है कि स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, और इसे प्राप्त करूँगा—यह कथन केवल उद्घोष नहीं था, अपितु अथक परिश्रम, संगठन और संघर्ष का संकल्प था। महात्मा गांधी ने जब चरखे को स्वराज्य का प्रतीक बनाया, तो उन्होंने यही सिद्ध किया कि स्वतन्त्रता वाणी से नहीं, श्रम की साधना से अर्जित होती है।आज जब हम स्वतन्त्र भारत में जीवन-यापन कर रहे हैं, तब यह स्मरण रखना अनिवार्य है कि यह स्वतन्त्रता किसी वरदान के रूप में नहीं मिली, अपितु लाखों श्रमजीवी देशभक्तों के पसीने और रक्त से अर्जित की गई है। काशी और बस्ती की इस पावन भूमि ने भी अनेक ऐसे सपूत दिए जिन्होंने मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। यह भूमि केवल धर्म और संस्कृति की नहीं, अपितु श्रम और संघर्ष की भी साक्षी रही है।
वर्तमान भारत में श्रमिक की गरिमा : चुनौतियाँ और दायित्व:: किन्तु यह कहना अनुचित न होगा कि स्वतन्त्रता के पचहत्तर वर्षों के पश्चात् भी श्रम और श्रमिक को वह सम्मान नहीं मिल पाया जिसके वे अधिकारी हैं। किसान खेतों में रक्त-पसीना बहाकर अन्न उपजाता है, किन्तु बाजार की अनिश्चितताओं में उसका मूल्य नहीं मिलता। कारखानों में काम करने वाला श्रमिक राष्ट्र की उत्पादन-शक्ति की रीढ़ है, किन्तु अनेक स्थानों पर उसे न्यायोचित मजदूरी, सुरक्षा और सम्मान से वंचित रखा जाता है। निर्माण-स्थलों पर श्रम करने वाले मजदूर, सिर पर बोझ उठाने वाले श्रमिक, सड़कों का निर्माण करने वाले हाथ—ये सब वे अनाम नायक हैं जिनके परिश्रम से ही राष्ट्र की प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है, किन्तु जिनका नाम इतिहास के पन्नों में अंकित नहीं होता। यह स्थिति परिवर्तित होनी चाहिए। जिस राष्ट्र में 'श्रमेव जयते' की भावना केवल राजकीय भवनों की दीवारों पर लिखे शिलालेख तक सीमित रह जाए, वह राष्ट्र अपने वास्तविक उत्थान से वंचित रह जाता है। श्रम की प्रतिष्ठा केवल नारों से नहीं, अपितु नीतियों से, न्यायोचित वेतन से, सामाजिक सुरक्षा से और सबसे बढ़कर—समाज की मानसिकता में परिवर्तन से सम्भव होगी। जब तक हम शारीरिक श्रम करने वाले व्यक्ति को नीची दृष्टि से देखने की मानसिकता का त्याग नहीं करेंगे, तब तक 'श्रमेव जयते' का उद्घोष खोखला ही रहेगा।
आत्मनिर्भरता का मार्ग : श्रम से ही राष्ट्र की प्रतिष्ठा:::आत्मनिर्भर भारत का स्वप्न तभी साकार होगा जब प्रत्येक भारतीय यह संकल्प ले कि वह अपने श्रम से राष्ट्र की सेवा करेगा। चाहे वह किसान हो, कारीगर हो, शिक्षक हो, चिकित्सक हो, सैनिक हो अथवा वैज्ञानिक—प्रत्येक के परिश्रम में ही राष्ट्र की आत्मा निवास करती है। हमारे शास्त्रों ने इसी भाव को इस प्रकार व्यक्त किया है—
यथा हि एकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति।।(महाभारत)जैसे एक चक्र से रथ की गति सम्भव नहीं होती, वैसे ही केवल भाग्य के भरोसे बैठे रहने से, बिना पुरुषार्थ अर्थात् श्रम के, कुछ भी सिद्ध नहीं होता। यह सूत्र राष्ट्र-निर्माण के लिए भी उतना ही सत्य है जितना व्यक्तिगत जीवन के लिए। भारत यदि विश्वगुरु के पद को पुनः प्राप्त करना चाहता है, तो उसे शब्दाडम्बर नहीं, श्रमनिष्ठा चाहिए। प्रत्येक खेत, प्रत्येक कारखाना, प्रत्येक विद्यालय, प्रत्येक प्रयोगशाला—ये सब वे यज्ञकुण्ड हैं जहाँ राष्ट्र-निर्माण की आहुति प्रतिदिन दी जा रही है।
मातृभक्ति और श्रमशक्ति : एक ही सिक्के के दो पहलू::'वन्दे मातरम्' और 'श्रमेव जयते'—ये दोनों उद्घोष वस्तुतः एक ही सत्य के दो रूप हैं। एक हृदय की भावना है, दूसरा हाथों का कर्म। जब तक भावना कर्म में परिणत नहीं होती, तब तक वह केवल वायवीय रह जाती है। जिस प्रकार बिना जल के बीज अंकुरित नहीं होता, उसी प्रकार बिना श्रम के मातृभक्ति फलित नहीं होती। प्रत्येक भारतीय को यह संकल्प लेना होगा कि वह अपने कार्यक्षेत्र में, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न प्रतीत हो, पूर्ण निष्ठा और परिश्रम के साथ कार्य करेगा—क्योंकि यही उसकी वास्तविक राष्ट्रभक्ति होगी।
तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में कर्म की महत्ता को इस प्रकार रेखांकित किया है—
कर्म प्रधान विश्व रचि राखा। जो जस करइ सो तस फल चाखा।।(रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड)
इस सृष्टि की रचना ही कर्म-प्रधान हुई है—जो जैसा कर्म करता है, वह वैसा ही फल पाता है। यह सिद्धान्त राष्ट्र-निर्माण के सन्दर्भ में भी अक्षरशः सत्य है। जो राष्ट्र श्रम को प्रतिष्ठा देता है, वह समृद्धि के शिखर पर पहुँचता है; जो राष्ट्र श्रम की उपेक्षा करता है, वह पतन की ओर अग्रसर होता है।
आह्वान : संकल्प से सृजन की ओर::आज आवश्यकता है कि हम प्रत्येक भारतीय के मन में यह भाव जाग्रत करें कि मातृभूमि की सेवा कोई दूर की कल्पना नहीं, अपितु प्रतिदिन के परिश्रम में निहित यथार्थ है। एक किसान जो खेत जोतता है, एक शिक्षक जो भावी पीढ़ी का निर्माण करता है, एक सैनिक जो सीमा पर प्रहरी बनकर खड़ा रहता है, एक श्रमिक जो भवन-निर्माण में अपना पसीना बहाता है—ये सब उसी आरती के दीपक हैं जिनसे मातृभूमि की वन्दना सम्पन्न होती है। हमें अपने समाज से उस मानसिकता का परित्याग करना होगा जो श्रम को हीन और निष्क्रियता को सम्मानजनक मानती है। श्रम ही पूजा है, श्रम ही यज्ञ है, श्रम ही राष्ट्रभक्ति की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।
'कौटिल्य दृष्टि सदैव इस सत्य का उद्घोष करता रहा है कि राष्ट्र का निर्माण न तो केवल भावुक नारों से होता है और न ही केवल सत्ता के गलियारों में बैठकर। राष्ट्र का निर्माण उस प्रत्येक भारतीय के परिश्रम से होता है जो प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व उठकर अपने कर्तव्य-पथ पर अग्रसर होता है। आइए, हम सब संकल्प लें कि हम केवल कण्ठ से नहीं, अपने श्रम से, अपने पसीने से, अपनी निष्ठा से 'वन्दे मातरम्' का उद्घोष करेंगे, और सिद्ध करेंगे कि सत्य ही 'श्रमेव जयते' है।
शुभम करोति कल्याणं आरोग्यं धनसम्पदा।शत्रुबुद्धिविनाशाय श्रमदीपो नमोऽस्तु ते।।
वन्दे मातरम्। वन्दे मातरम्।।
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