मोहन भागवत जी की ट्रेन पर पथराव: यह केवल पत्थर नहीं, राष्ट्र चेतना को चुनौती है
लखनऊ,संवाददाता
जिस ट्रेन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जी यात्रा कर रहे हों, उस पर पथराव की घटना को सामान्य शरारत बताकर टाला नहीं जा सकता। यह केवल एक रेल डिब्बे के शीशे पर पड़ा पत्थर नहीं, बल्कि भारत की वैचारिक चेतना, लोकतांत्रिक मर्यादाओं और कानून के शासन को खुली चुनौती है।मतभेद लोकतंत्र का सौंदर्य हैं, लेकिन हिंसा उसकी सबसे बड़ी शत्रु है। यदि विचार का उत्तर पत्थर से दिया जाएगा, तो यह लोकतंत्र नहीं, अराजकता की ओर बढ़ता समाज होगा। जो लोग वैचारिक संघर्ष में तर्क और संवाद से पराजित होते हैं, वे अक्सर पत्थर और हिंसा का सहारा लेते हैं।यह घटना इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह देश के एक ऐसे व्यक्तित्व से जुड़ी है जिनकी सुरक्षा राष्ट्रीय महत्व का विषय है। यदि ऐसे व्यक्ति की यात्रा भी असामाजिक तत्वों की पहुंच से सुरक्षित नहीं है, तो यह सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।उत्तर प्रदेश पुलिस ने त्वरित कार्रवाई कर आरोपियों को गिरफ्तार किया है, किंतु राष्ट्र यह जानना चाहता है कि यह केवल शरारत थी या इसके पीछे कोई सुनियोजित मानसिकता कार्य कर रही थी। जांच का दायरा व्यापक होना चाहिए और दोषियों को ऐसा दंड मिलना चाहिए जो भविष्य में किसी को भी ऐसी दुस्साहसिक हरकत करने से पहले सौ बार सोचने पर विवश कर दे।
भारत संवाद की भूमि है, पत्थर की नहीं; विचार की भूमि है, हिंसा की नहीं। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, लेकिन राष्ट्रपुरुषों पर हमला करने का अधिकार किसी को नहीं।
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