ग्रामीण पत्रकारिता: खबर के साथ विज्ञापन, प्रसार और एजेंसी का बोझ, फिर भी असुरक्षित भविष्य
वी के त्रिपाठी सम्वाददाता
बस्ती। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की मजबूती का दावा करने वाले देश में ग्रामीण क्षेत्र के पत्रकार आज भी उपेक्षा, असुरक्षा और शोषण के दुष्चक्र में फंसे हुए हैं। गांवों, कस्बों और दूरदराज क्षेत्रों से खबरें जुटाने वाले संवाददाता वर्षों से अपने अधिकारों, सम्मान और सुरक्षा की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज न तो मीडिया संस्थानों तक प्रभावी ढंग से पहुंच पा रही है और न ही सरकारों तक।ग्रामीण पत्रकारों की स्थिति का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि उनसे केवल समाचार संकलन का कार्य ही नहीं लिया जाता, बल्कि विज्ञापन लाने, अखबार का प्रसार बढ़ाने और कई स्थानों पर एजेंसी संचालन जैसी अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी सौंप दी जाती हैं। इसके बावजूद अधिकांश संवाददाता न तो नियमित मानदेय प्राप्त कर पाते हैं और न ही किसी प्रकार की सामाजिक या आर्थिक सुरक्षा। स्थिति यह है कि बड़े और प्रतिष्ठित अखबारों के नाम से कार्य करने वाले अनेक प्रतिनिधि वर्षों तक संस्थान के लिए काम करते हैं, लेकिन उनका भविष्य पूरी तरह अनिश्चित बना रहता है। किसी भी समय बिना स्पष्ट कारण के उन्हें हटाया जा सकता है। न नियुक्ति पत्र, न सेवा शर्तें और न ही किसी प्रकार की सुनवाई की व्यवस्था—यह ग्रामीण पत्रकारिता का कड़वा यथार्थ बन चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण पत्रकार ही वह कड़ी हैं जो गांवों की समस्याओं, किसानों की पीड़ा, स्थानीय भ्रष्टाचार, विकास योजनाओं की वास्तविक स्थिति और आमजन की आवाज को मुख्यधारा तक पहुंचाते हैं। इसके बावजूद सबसे अधिक उपेक्षा भी इन्हीं की होती है।
वर्षों से पत्रकार संगठनों द्वारा ग्रामीण पत्रकारों के लिए पहचान, सुरक्षा, बीमा, न्यूनतम मानदेय और कार्यस्थल अधिकारों की मांग उठाई जाती रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं देते। ऐसे में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि जब लोकतंत्र की सूचना व्यवस्था का बड़ा हिस्सा ग्रामीण पत्रकारों के कंधों पर टिका है, तो उनके अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए ठोस नीति कब बनेगी?ग्रामीण पत्रकारों का कहना है कि यदि सरकार, मीडिया संस्थान और पत्रकार संगठन मिलकर कोई प्रभावी पहल करें तो लाखों संवाददाताओं को न्याय मिल सकता है। फिलहाल वे खबर, विज्ञापन, प्रसार और एजेंसी के बहुआयामी दबाव के बीच अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, लेकिन उनके भविष्य की सुरक्षा अब भी एक अनुत्तरित प्रश्न बनी हुईl
कौटिल्य उवाच
"जो पत्रकार गांव की धूल फांककर लोकतंत्र को सूचना देता है, यदि वही सबसे अधिक असुरक्षित और उपेक्षित है, तो समस्या पत्रकार की नहीं, व्यवस्था की है। लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करना है तो ग्रामीण पत्रकारिता को सम्मान, सुरक्षा और अधिकार देना ही होगा।"

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