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मंगलवार, 9 जून 2026

राष्ट्रीय अभियानों का स्थायी श्रमिक: सरकारी शिक्षक


सब कुछ शिक्षक ही?  सरकारी अध्यापक की अनंत जिम्मेदारियों का प्रश्न

राजेंद्र,बस्ती,वशिष्ठनगर,272001




भारतीय लोकतंत्र का एक विचित्र चरित्र है। जब भी कोई राष्ट्रीय अभियान आता है, सरकार को सबसे पहले एक चेहरा दिखाई देता है—सरकारी शिक्षक। चुनाव हो, मतदाता सूची का पुनरीक्षण हो, जनगणना हो, सर्वेक्षण हो, टीकाकरण अभियान हो, आपदा प्रबंधन हो या किसी योजना का सत्यापन, हर बार विद्यालय का शिक्षक ही प्रशासनिक व्यवस्था का सबसे सुलभ मजदूर बन जाता है। विडम्बना यह है कि जिस शिक्षक को राष्ट्रनिर्माता कहा जाता है, उसी को उसके मूल कार्य—शिक्षा—से बार-बार दूर कर दिया जाता है। फिर जब शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्न उठते हैं, परीक्षा परिणाम कमजोर आते हैं, नकल बढ़ती है या छात्रों का स्तर गिरता है, तो सबसे पहले कटघरे में भी वही शिक्षक खड़ा कर दिया जाता है। प्रश्न यह है कि क्या राष्ट्र के प्रत्येक दायित्व का भार केवल शिक्षक के कंधों पर ही डाला जाएगा?जनगणना एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अभियान है। इसके आंकड़ों पर योजनाएँ बनती हैं, संसाधनों का वितरण तय होता है और शासन की दिशा निर्धारित होती है। लेकिन क्या यह कार्य केवल शिक्षकों के बिना संभव नहीं है? देश में करोड़ों शिक्षित बेरोजगार युवा हैं, विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में लाखों विद्यार्थी हैं। यदि उन्हें प्रशिक्षण देकर ऐसे कार्यों में लगाया जाए तो उन्हें अनुभव भी मिलेगा और रोजगार का अवसर भी।इसके विपरीत शिक्षक को विद्यालय से निकालकर घर-घर भेजना शिक्षा व्यवस्था को ही कमजोर करता है। एक शिक्षक की अनुपस्थिति केवल एक कर्मचारी की अनुपस्थिति नहीं होती, बल्कि सैकड़ों विद्यार्थियों के अध्ययन का नुकसान होती है। कोई प्रयोगशाला बंद हो जाती है, कोई पाठ अधूरा रह जाता है, कोई छात्र अपने प्रश्नों का उत्तर नहीं पा पाता। यह क्षति सरकारी फाइलों में दर्ज नहीं होती, लेकिन भविष्य में इसका मूल्य पूरा समाज चुकाता है।सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि शिक्षक से चुनाव भी कराइए, जनगणना भी कराइए, सर्वेक्षण भी कराइए और फिर शिक्षा की गुणवत्ता का पूरा हिसाब भी उसी से मांगिए। यदि परीक्षा में नकल हो जाए तो दोष शिक्षक का, यदि परिणाम कमजोर आए तो दोष शिक्षक का, यदि विद्यालय की स्थिति खराब हो तो दोष शिक्षक का। लेकिन जब उसी शिक्षक का समय प्रशासनिक कार्यों में व्यतीत कराया जाता है, तब उसकी शैक्षिक क्षति का हिसाब कौन देगा? यह केवल शिक्षक का प्रश्न नहीं है, यह विद्यार्थियों और अभिभावकों का भी प्रश्न है। जिस समाज को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए, उसे यह भी समझना होगा कि शिक्षक का समय सबसे मूल्यवान शैक्षिक संसाधन है। उसे फाइलों, सर्वेक्षणों और कागजी अभियानों में खर्च करना अंततः बच्चों के भविष्य को गिरवी रखने जैसा है।सरकारी शिक्षक कोई सर्वकार्यकारी मशीन नहीं है। वह न तो प्रशासन का स्थायी क्लर्क है, न चुनाव विभाग का कर्मचारी और न ही हर सरकारी योजना का फील्ड एजेंट। उसकी पहली और अंतिम पहचान शिक्षक की है। यदि राष्ट्र वास्तव में शिक्षा को प्राथमिकता देना चाहता है, तो उसे शिक्षक को उसके मूल दायित्व में वापस लौटाना होगा।अन्यथा स्थिति यही रहेगी कि विद्यालयों के ब्लैकबोर्ड मौन रहेंगे, कक्षाएँ अधूरी रहेंगी, पाठ्यक्रम पिछड़ते रहेंगे और हर असफलता का दोष एक बार फिर उसी शिक्षक के सिर मढ़ दिया जाएगा।राष्ट्र को यह तय करना होगा—उसे जनगणना चाहिए, चुनाव चाहिए, सर्वेक्षण चाहिए या भविष्य गढ़ने वाला शिक्षक चाहिए। यदि सब कुछ चाहिए, तो सब कुछ केवल शिक्षक से नहीं चाहिए।

आचार्य सूर्यप्रकाश शुक्ल ,अभय सिंह यादव ने कहा है कि प्राथमिक शिक्षक बहुद्देशीय कर्मी है वह जाए तो कहां जाये।राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू होने पर भी शिक्षक को खोज है आत्म सम्मान की।

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सामयिक व प्रामाणिक सद्चिंतन से परिपूर्ण लेख लिखनें के लिए ऐसे उत्कृष्ट हृदय के उद्गार से प्रस्फुटित विचार को अपने शैली में परिमार्जित रूप से लिखनें के लिए हृदय की गहराइयों से मैं आपको सादर प्रणाम व वंदन करता हूं साथ ही वागदेवी मां सरस्वती की असीम कृपा आप पर बनी रहे और इसी तरह से आप अपनी लेखनी के रूप से अपने स्वतंत्र विचारों से हम सभी को लेखनी के माध्यम से अभिसिंचित करते रहें।।
    भवदीय
    आचार्य सूर्य प्रकाश शुक्ल।।

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  2. I salute and salute you from the bottom of my heart for writing such a timely and authentic article filled with good thoughts, for writing such a refined thought from the outpouring of the heart in your own style. May the infinite blessings of Goddess Saraswati remain upon you and may you continue to irrigate us all with your independent thoughts through your writing. Yours sincerely, Acharya Surya Prakash Shukla.

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