राहुल गांधी की राजनीति: भविष्यवाणियों का कारोबार और नकारात्मकता का उद्योग
भारतीय राजनीति में भविष्यवक्ताओं की कभी कमी नहीं रही, लेकिन राहुल गांधी ने इस कला को एक नए स्तर पर पहुँचा दिया है। पिछले एक दशक से वे देश को कभी लोकतंत्र के अंत, कभी अर्थव्यवस्था के पतन, कभी संस्थाओं के विनाश और कभी सरकार के आसन्न पतन की चेतावनी देते रहे हैं। अब उन्होंने एक नया उद्घोष किया है— "आर्थिक सुनामी आने वाली है" और "एक वर्ष में मोदी प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे।"
देश पूछ रहा है कि आखिर यह राजनीतिक विश्लेषण है या निराशा का स्थायी चश्मा?राहुल गांधी की समस्या यह नहीं है कि वे सरकार की आलोचना करते हैं। समस्या यह है कि उन्हें भारत में कुछ अच्छा दिखाई ही नहीं देता। सड़क बने तो संकट, रेलवे बढ़े तो संकट, रक्षा उत्पादन बढ़े तो संकट, डिजिटल क्रांति आए तो संकट, विदेश नीति सफल हो तो संकट। मानो भारत की हर उपलब्धि उनके राजनीतिक कथानक के लिए असुविधाजनक तथ्य हो।
विपक्ष का दायित्व सरकार को आईना दिखाना है, लेकिन यदि आईना ही धुंधला हो जाए तो हर चेहरा विकृत दिखाई देता है। राहुल गांधी की राजनीति आज उसी धुंधले आईने की राजनीति बनती जा रही है, जहाँ उपलब्धियाँ अदृश्य हैं और आशंकाएँ ही वास्तविकता हैं। विडंबना यह है कि जिन भविष्यवाणियों का इतिहास लगातार गलत साबित होता रहा हो, वही भविष्यवाणियाँ फिर नए पैकेज में जनता के सामने परोसी जा रही हैं। लोकतंत्र खत्म होने वाला था, नहीं हुआ। अर्थव्यवस्था ढहने वाली थी, नहीं ढही। सरकार गिरने वाली थी, नहीं गिरी। अब फिर वही कथा, वही पात्र और वही भविष्यवाणी।
वस्तुत :समस्या मोदी नहीं हैं। समस्या यह है कि राहुल गांधी आज भी उस भारत को समझने में असफल दिखते हैं जो आत्मविश्वास से भरा हुआ है। 21वीं सदी का भारत निराशा नहीं, संभावना की भाषा बोलता है। वह संकटों को स्वीकार करता है, लेकिन संकटों को ही अपनी पहचान नहीं बनाता।
राजनीति में आलोचना आवश्यक है, लेकिन जब आलोचना का आधार तथ्य नहीं बल्कि निरंतर भय, अविश्वास और विनाश की कल्पनाएँ बन जाएँ, तब वह लोकतांत्रिक विमर्श नहीं रह जाती; वह नकारात्मकता का उद्योग बन जाती है।
भारत की जनता ने बार-बार सिद्ध किया है कि वह भविष्यवाणियों से नहीं, प्रदर्शन से प्रभावित होती है। इसलिए यह संभव है कि आने वाले समय में राहुल गांधी की सबसे बड़ी चुनौती नरेंद्र मोदी नहीं, बल्कि उनकी अपनी नकारात्मक राजनीति ही साबित हो।
राष्ट्र आशा से आगे बढ़ते हैं, भय से नहीं। और जो नेता हर सुबह एक नई आशंका लेकर उठता है, वह अंततः जनता के विश्वास का नहीं, अपनी ही विश्वसनीयता का क्षरण करता है। संभवतः राहुल की सोच में नकारात्मकता ने स्थाई अड्डा बना लिया है ।उनका स्वप्नदर्शी होना बुरा नहीं,बुरा है स्वप्न का फलादेश!
राजेंद्र नाथ तिवारी,272001

शानदार लेख
जवाब देंहटाएंसादर प्रणाम गुरूजी 🙏🙏