5 जून : पर्यावरण दिवस नहीं, राष्ट्र के आत्मपरीक्षण का दिवस
"माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" — अथर्ववेद
बस्ती, विशिष्ठ नगर, 272001
धरती को माँ कहने वाली सभ्यता के उत्तराधिकारी हम लोग आज 5 जून को पर्यावरण दिवस मना रहे हैं। प्रश्न यह नहीं कि कितने पौधे लगाए गए, कितनी रैलियाँ निकलीं या कितने भाषण हुए। प्रश्न यह है कि क्या हमने वास्तव में उस प्रकृति का ऋण चुकाने का प्रयास किया है, जिसके बिना हमारा अस्तित्व ही असंभव है? हर वर्ष 5 जून आता है और चला जाता है। सरकारी फाइलों में पौधारोपण के आँकड़े बढ़ जाते हैं, मंचों पर पर्यावरण की चिंता व्यक्त कर दी जाती है, समाचार पत्रों में हरे-भरे विज्ञापन छप जाते हैं। किंतु अगले ही दिन नदियाँ फिर प्रदूषित होती हैं, तालाब फिर पाटे जाते हैं, जंगल फिर काटे जाते हैं और विकास के नाम पर प्रकृति का गला फिर घोंटा जाता है।
यह कैसी विडम्बना है? जिस देश ने गंगा को माँ कहा, पीपल को देवता माना, नदियों, पर्वतों और वनस्पतियों को पूजा का विषय बनाया, उसी देश में आज नदियाँ नालों में बदल रही हैं। कुएँ इतिहास बन रहे हैं, तालाब भू-माफियाओं के कब्जे में हैं और गाँवों की हरियाली कंक्रीट के जंगलों में खोती जा रही है। सवाल यह नहीं कि पर्यावरण संकट में है। सवाल यह है कि क्या हमारी चेतना संकट में है? प्रकृति का विनाश किसी एक पेड़ या नदी का विनाश नहीं होता। यह राष्ट्र की जीवन-रेखा पर प्रहार होता है। जिस देश का जल समाप्त होता है, उसकी कृषि समाप्त होती है। जिस देश की कृषि समाप्त होती है, उसकी अर्थव्यवस्था कमजोर होती है। और जिसकी अर्थव्यवस्था कमजोर होती है, उसकी स्वतंत्रता भी खतरे में पड़ जाती है।
इसलिए पर्यावरण कोई फैशन नहीं, कोई विदेशी अवधारणा नहीं, कोई एनजीओ का विषय नहीं। यह राष्ट्रधर्म है।आज यदि कुवानो, मनोरमा, सरयू, घाघरा, गोमती, गंगा और यमुना को बचाने के लिए समाज आगे आ रहा है, यदि गाँवों में लोग श्रमदान कर रहे हैं, यदि युवा नदी सफाई अभियान चला रहे हैं, तो वही वास्तविक पर्यावरण दिवस है। बाकी सब केवल शब्द हैं। प्रकृति मनुष्य की अदालत में नहीं जाती, वह अपना फैसला स्वयं सुनाती है। कभी बाढ़ बनकर, कभी सूखा बनकर, कभी तापमान बनकर, कभी प्रदूषण बनकर।
राष्ट्रकवि दिनकर की पंक्तियाँ आज चेतावनी की तरह सुनाई देती हैं—"क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो।"प्रकृति के पास भी गरल है। वह सहन करती है, बार-बार चेतावनी देती है, पर जब संतुलन टूटता है तो उसका प्रतिकार भी उतना ही भयंकर होता है।5 जून केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह वह दिन है जब धरती हमसे प्रश्न पूछती है—
"तुमने मेरे लिए क्या किया?"क्या हमने नदियों को बचाया? क्या हमने जलस्रोतों को पुनर्जीवित किया? क्या हमने वृक्षों को संतानों की तरह संरक्षित किया? क्या हमने विकास और विनाश के अंतर को समझा?यदि उत्तर 'नहीं' है, तो पर्यावरण दिवस एक उत्सव नहीं, हमारे सामूहिक पाखंड का वार्षिक समारोह है।आज आवश्यकता पौधे लगाने से अधिक वृक्ष बचाने की है। भाषण देने से अधिक श्रमदान की है। घोषणाओं से अधिक जनभागीदारी की है।
5 जून का वास्तविक संदेश यही है—"धरती हमारे पूर्वजों की विरासत नहीं, हमारी संतानों से लिया गया ऋण है।"और यदि हम यह ऋण नहीं चुका पाए, तो इतिहास हमें विकासकर्ता नहीं, विनाशकर्ता पीढ़ी के रूप में याद करेगा।आज 5 जून को प्रश्न पर्यावरण का नहीं, राष्ट्र के चरित्र का है।आईना सामने है—अब निर्णय हमें करना है कि हम प्रकृति के संरक्षक बनेंगे या उसके अपराधी।
राजेन्द्र नाथ तिवारी
अत्यंत सामयिक एवं ज्वलंत मुद्दों पर लेखनीय चर्चा किया जाना बहुत ही सुन्दर और सराहनीय पहल है आदरणीय श्री मान जी,, बहुत बहुत आभार।।
जवाब देंहटाएं।।आचार्य सूर्य प्रकाश शुक्ल।।