कौटिल्य उवाच /आज की सम्पादकीय
बुद्ध का पुनर्जागरण: आस्था नहीं, आत्मसम्मान की खोज
भारत विविध आस्थाओं, परंपराओं और आध्यात्मिक धाराओं का देश है, जहाँ देवी-देवताओं की असंख्य परिकल्पनाएँ समाज के सांस्कृतिक ताने-बाने को समृद्ध करती रही हैं। किंतु इसी परिदृश्य में 20वीं सदी के मध्य घटित एक घटना ने भारतीय समाज के विमर्श को एक नई दिशा दी। 14 अक्टूबर 1956 को डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा दीक्षाभूमि में अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण करना केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि सामाजिक संरचना पर गहरा प्रश्नचिन्ह भी था।यह प्रश्न आज भी प्रासंगिक है कि जब भारत में पहले से ही अनेक धार्मिक विकल्प उपलब्ध थे, तब एक ऐसे गौतम बुद्ध को क्यों चुना गया, जो सदियों तक मुख्यधारा से लगभग ओझल रहे? इस चयन के पीछे भावनात्मक आवेग से अधिक एक विचारशील सामाजिक रणनीति दिखाई देती है।
बुद्ध का दर्शन मूलतः मानव-केंद्रित है। इसमें जन्माधारित असमानता के लिए कोई स्थान नहीं है। “मनुष्य कर्म से महान होता है”—यह विचार उस समाज के लिए विशेष महत्व रखता था, जो लंबे समय से जातिगत विभाजन और सामाजिक बहिष्कार का सामना कर रहा था। बौद्ध धर्म ने एक ऐसा वैकल्पिक ढाँचा प्रस्तुत किया, जिसमें सम्मान और समानता को सिद्धांत के रूप में स्वीकार किया गया। इसके साथ ही, बौद्ध परंपरा तर्क, अनुभव और नैतिकता पर आधारित है। यह दृष्टिकोण आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक चेतना के साथ सामंजस्य स्थापित करता है। डॉ. अंबेडकर के लिए यह आवश्यक था कि उनका चुना हुआ मार्ग न केवल सामाजिक न्याय की बात करे, बल्कि बौद्धिक रूप से भी संतोषजनक हो। इस संदर्भ में बुद्ध का “अप्प दीपो भव” का संदेश आत्मनिर्भरता और विवेकशीलता को प्रोत्साहित करता है।
एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष इसका सांस्कृतिक आयाम है। बौद्ध धर्म भारतीय भूमि से उत्पन्न परंपरा है। अतः इसे अपनाना एक प्रकार से सांस्कृतिक निरंतरता बनाए रखने का भी प्रयास था। यह चयन न तो पूर्णतः परंपरा का परित्याग था और न ही उसका अंधानुकरण, बल्कि एक संतुलित पुनर्व्याख्या थी। हालाँकि, यह भी समझना आवश्यक है कि इस परिवर्तन को केवल एकतरफा दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। भारतीय समाज में सुधार के अनेक प्रयास समानांतर रूप से चलते रहे हैं—चाहे वह सामाजिक सुधार आंदोलनों के माध्यम से हो या संवैधानिक प्रावधानों के जरिए। इसलिए बौद्ध धर्म ग्रहण करना एक महत्वपूर्ण कदम अवश्य था, परंतु यह व्यापक सामाजिक परिवर्तन की एक कड़ी मात्र भी है।
आज, जब हम इस ऐतिहासिक निर्णय को देखते हैं, तो स्पष्ट होता है कि बुद्ध का पुनर्जागरण केवल अतीत की ओर लौटना नहीं था, बल्कि भविष्य के लिए एक वैकल्पिक मार्ग तलाशने का प्रयास था—ऐसा मार्ग, जिसमें आस्था के साथ-साथ आत्मसम्मान, तर्क और समानता भी समाहित हो। अंततः, बुद्ध का चयन किसी देवता की संख्या में वृद्धि नहीं, बल्कि विचारों की दिशा में परिवर्तन का संकेत था। यह परिवर्तन आज भी भारतीय समाज को यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि सच्ची प्रगति केवल परंपराओं के विस्तार में नहीं, बल्कि उन्हें समयानुकूल और न्यायसंगत बनाने में निहित है।

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