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जनगणना या सामाजिक विभाजन का नया प्रारूप?
देश में चल रही जातीय एवं सामाजिक गणना को लेकर जनमानस के भीतर अनेक प्रश्न जन्म ले रहे हैं। विशेष रूप से जनगणना प्रपत्रों में जाति संबंधी कॉलम को जिस प्रकार प्रस्तुत किया जा रहा है, उसने व्यापक असंतोष और आशंका को जन्म दिया है।
जहाँ एक ओर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) एवं अन्य श्रेणियों के लिए पृथक उल्लेख दिखाई देता है, वहीं सामान्य वर्ग तथा पिछड़ा वर्ग के संदर्भ में स्पष्ट और समान स्थान का अभाव कई लोगों को विचलित कर रहा है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं प्रतीत होती, बल्कि समाज के भीतर अनावश्यक वैचारिक विभाजन को बढ़ाने वाली मानसिकता का संकेत भी मानी जा रही है।
प्रश्न यह उठता है कि यदि जनगणना वास्तव में निष्पक्ष और समावेशी है, तो फिर प्रत्येक सामाजिक वर्ग के लिए समान एवं स्पष्ट पहचान का अवसर क्यों नहीं दिया गया? क्या यह अनजाने में हुई व्यवस्था है, या फिर समाज को निरंतर खाँचों में बाँटकर राजनीतिक लाभ लेने की पुरानी प्रवृत्ति का विस्तार?
भारत की शक्ति उसकी सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक एकात्मता और राष्ट्रीय चेतना में निहित रही है। किंतु जब सरकारी दस्तावेजों में ही वर्गों के बीच भेद का भाव स्पष्ट दिखने लगे, तब स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में आशंका उत्पन्न होना स्वाभाविक है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि जनगणना केवल आँकड़ों का संग्रह न बनकर राष्ट्र निर्माण का माध्यम बने। किसी भी वर्ग को उपेक्षित अथवा अदृश्य महसूस कराना लोकतांत्रिक भावना के विपरीत है।
सरकार एवं संबंधित संस्थाओं को चाहिए कि वे इस विषय पर स्पष्टता प्रदान करें तथा ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करें जिसमें सभी वर्गों को समान सम्मान और स्पष्ट प्रतिनिधित्व प्राप्त हो।
भारत को जातीय अविश्वास नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता है।
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