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शनिवार, 30 मई 2026

बस्ती का शर्मनाक सच: 21वीं सदी में भी जुगाड़ के पुल पर चल रही जिंदगी

 “पगारे घाट पर मौत का पुल नहीं चलेगा”  भाजपा नेता यशकांत सिंह का प्रशासन पर तीखा हमलाब



बस्ती वशिष्ठनगर,संवाददाता

रामनगर–गौर संपर्क मार्ग की बदहाली पर फूटा जनाक्रोश, कहा — विकास के दावों के बीच ग्रामीणों को मिला उपेक्षा का उपहार,बस्ती जनपद के विकास खण्ड रामनगर के नरकटहा और विकास खण्ड गौर के धधरिया को जोड़ने वाले पगारे घाट की जर्जर स्थिति को लेकर भाजपा नेता यशकांत सिंह ने प्रशासन और संबंधित विभागों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि जिस संरचना के सहारे हजारों ग्रामीण प्रतिदिन नदी पार करने को मजबूर हैं, उसे पुल कहना भी पुल शब्द का अपमान है।

यशकांत सिंह ने कहा कि पगारे घाट पर बना यह ढांचा किसी भी समय बड़े हादसे का कारण बन सकता है। बरसों से ग्रामीण स्थायी पुल की मांग कर रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग केवल आश्वासन की राजनीति कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव के समय विकास की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले जनप्रतिनिधि और अधिकारी अब ग्रामीणों की जान जोखिम में डालने वाली इस समस्या पर मौन हैं। उनका कहना है कि रामनगर ब्लॉक को जनपद का महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। यह मार्ग केवल दो गांवों को नहीं बल्कि बस्ती और गोंडा के बीच सामाजिक, आर्थिक और ग्रामीण संपर्क का महत्वपूर्ण माध्यम है। किसान अपनी उपज लेकर इसी रास्ते से निकलते हैं, छात्र शिक्षा के लिए आते-जाते हैं और मरीजों को भी इसी रास्ते का सहारा लेना पड़ता है।

“दुर्घटना के बाद नहीं, उससे पहले जागे प्रशासन”यशकांत सिंह ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि किसी दिन यह जर्जर पुल टूट गया और कोई जनहानि हुई तो उसकी नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी संबंधित विभागों की होगी। उन्होंने कहा कि सरकार की योजनाओं का वास्तविक मूल्यांकन शहरों के चमकते मार्गों से नहीं बल्कि ऐसे गांवों की स्थिति से होना चाहिए, जहां आज भी लोग लकड़ियों और मिट्टी के सहारे जीवन का सफर तय कर रहे हैं।

उन्होंने मांग की कि पगारे घाट पर तत्काल तकनीकी सर्वे कराकर स्थायी पुल निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाए। साथ ही बरसात से पहले अस्थायी सुरक्षा व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाए ताकि ग्रामीणों की जान खतरे में न पड़े।ग्रामीणों में बढ़ रहा आक्रोश,स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से इस मार्ग की समस्या उठाई जा रही है, लेकिन हर बार फाइलें आगे बढ़ने के बजाय ठंडे बस्ते में चली जाती हैं। अब लोगों में यह भावना गहराती जा रही है कि ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याएं केवल भाषणों और घोषणाओं तक सीमित रह गई हैं।

“यह पुल नहीं, व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है”यशकांत सिंह ने कहा कि पगारे घाट की तस्वीर केवल एक जर्जर पुल की तस्वीर नहीं है, बल्कि यह उस प्रशासनिक सोच का प्रतिबिंब है जिसमें गांवों की मूलभूत आवश्यकताएं वर्षों तक उपेक्षित पड़ी रहती हैं। उन्होंने कहा कि यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो जनआंदोलन के माध्यम से इस मुद्दे को व्यापक स्तर पर उठाया जाएगा।

पगारे घाट आज ग्रामीण भारत का वह सवाल बन चुका है, जो पूछ रहा है — आखिर विकास की सड़क गांव तक कब पहुंचेगी?

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