जली रोटियों ने खोल दी शिक्षा व्यवस्था की पोल
बस्ती, संवाददाताबस्ती जनपद के परिषदीय विद्यालयों में जिलाधिकारी कृत्तिका ज्योत्स्ना के औचक निरीक्षण ने एक बार फिर सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत उजागर कर दी। कागज़ों में “पोषण” और “गुणवत्ता” के बड़े-बड़े दावे करने वाली मिड-डे-मील व्यवस्था बच्चों की थाली तक पहुंचते-पहुंचते किस तरह लापरवाही और उदासीनता की भेंट चढ़ जाती है, इसका उदाहरण जली हुई मोटी रोटियां बनीं, जिन्हें मासूम बच्चों को परोसा जा रहा था।
यह केवल भोजन की खराब गुणवत्ता का मामला नहीं है, बल्कि यह उस संवेदनहीन व्यवस्था का आईना है, जहां गरीब बच्चों के अधिकारों के साथ समझौता सामान्य बात बन चुकी है। जिन बच्चों के लिए मिड-डे-मील योजना पोषण, स्वास्थ्य और विद्यालय से जुड़ाव का माध्यम होनी चाहिए, वहीं उन्हें अधपका, जला और निम्नस्तरीय भोजन परोसा जाना प्रशासनिक विफलता का गंभीर संकेत है।
जिलाधिकारी द्वारा संबंधित प्रधानाध्यापिका और रसोइयों के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी करने के निर्देश निश्चित रूप से स्वागतयोग्य कदम हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल नोटिस से व्यवस्था सुधर जाएगी? वर्षों से विद्यालयों में भोजन की गुणवत्ता, साफ-सफाई और निगरानी को लेकर शिकायतें आती रही हैं। कई जगह भोजन में कीड़े मिलने से लेकर पोषण मानकों की अनदेखी तक के मामले सामने आए, परंतु जिम्मेदारी तय होने के बाद भी सुधार स्थायी नहीं हो सका।
निरीक्षण में केवल भोजन ही नहीं, बल्कि विद्यालय परिसर की गंदगी, छात्रों की अनुपस्थिति और कंप्यूटर लैब के उपकरणों का लंबे समय तक स्थापित न होना भी यह दर्शाता है कि शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही का अभाव गहराता जा रहा है। डिजिटल शिक्षा की बातें तो होती हैं, लेकिन बच्चों तक बुनियादी सुविधाएं भी समय पर नहीं पहुंच पा रहीं।
सकारात्मक पक्ष यह रहा कि जिलाधिकारी ने केवल औपचारिक निरीक्षण तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि बच्चों से संवाद कर उनकी शैक्षणिक स्थिति समझने का प्रयास किया। स्पेशल एजुकेटर श्रीमती प्रतीक्षा के कार्यों की सराहना यह संकेत देती है कि व्यवस्था में अच्छे उदाहरण भी मौजूद हैं। जरूरत ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करने और लापरवाह तत्वों पर कठोर कार्रवाई की है।

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