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सोमवार, 11 मई 2026

साइकिल का स्टैंड और पत्रकार का कैरियर

साइकिल का स्टैंड और पत्रकार का कैरियरएक व्यंग्य, जो आज की व्यवस्था का दर्पण बन गया

संतकबीरनगर, केदार दूबे, संवाददाता 


कहानी साधारण है, पर उसका संकेत अत्यंत गहरा।एक सामान्य व्यक्ति ने प्रसन्न होकर एक पत्रकार महोदय को नई साइकिल भेंट कर दी। साइकिल चमचमाती हुई थी, मजबूत भी थी, पर उसमें एक कमी थी — कैरियर नहीं था। पत्रकार महोदय ने सोचा कि बिना कैरियर के साइकिल अधूरी है, इसलिए वे तुरंत बाजार पहुँचे।दुकानदार से उन्होंने कुछ गर्व और कुछ प्रभाव के साथ कहा —“मैं बड़ा पत्रकार हूँ, अच्छा सा कैरियर लगा दो।”दुकानदार मुस्कुराया, कैरियर लगा दिया, लेकिन साथ ही साइकिल का स्टैंड खोलकर अलग रख दिया।पत्रकार चौंक पड़े —“यह क्या किया? स्टैंड क्यों हटा दिया?”दुकानदार ने शांत स्वर में उत्तर दिया —“महोदय, पत्रकार का कैरियर और स्टैंड दोनों साथ नहीं चल सकते।यदि स्टैंड रखोगे तो कैरियर रुक जाएगा, और यदि कैरियर बनाना है तो स्टैंड छोड़ना पड़ेगा।”यही एक वाक्य आज के सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक जीवन का सबसे तीखा व्यंग्य बन जाता है।स्टैंड आखिर है क्या? साइकिल का स्टैंड केवल लोहे का टुकड़ा नहीं होता।वह स्थिरता का प्रतीक है। संतुलन का प्रतीक है।स्वाभिमान और स्वतंत्र खड़े रहने की क्षमता का प्रतीक है।
जिस साइकिल में स्टैंड होता है, वह बिना सहारे के भी खड़ी रह सकती है।और जिस मनुष्य के भीतर “स्टैंड” होता है, वह बिना सत्ता, दल, धन और भीड़ के सहारे भी सत्य पर टिक सकता है।परंतु आज की व्यवस्था में सबसे पहले यही “स्टैंड” हटाया जा रहा है। कैरियर की दौड़ और सिद्धांतों का पतन आज समाज में “कैरियर” सबसे बड़ा धर्म बन चुका है।
पत्रकारिता हो, राजनीति हो, शिक्षा हो या सामाजिक नेतृत्व — हर जगह प्रश्न यह नहीं रह गया कि “सत्य क्या है?”, बल्कि यह हो गया है कि “कैरियर कैसे बचेगा?”जो पत्रकार सत्ता से प्रश्न पूछता है, उसका विज्ञापन रुक सकता है।
जो अधिकारी ईमानदारी से खड़ा होता है, उसका स्थानांतरण हो सकता है।जो शिक्षक व्यवस्था पर प्रश्न उठाता है, वह उपेक्षित हो सकता है।और जो बुद्धिजीवी स्वतंत्र विचार रखता है, उसे किसी न किसी खांचे में डाल दिया जाता है।इसलिए बहुतों ने समझौता कर लिया —“स्टैंड हटाओ, कैरियर बचाओ।”
व्यवस्था का मौन संदेश,आज की व्यवस्था खुलकर नहीं कहती, पर संकेत यही देती है —यदि आगे बढ़ना है तो बहुत अधिक स्वतंत्र मत बनो।बहुत स्पष्ट मत बोलो।बहुत सत्यवादी मत बनो।बहुत अलग मत दिखो।क्योंकि व्यवस्था को ऐसे लोग अधिक सहज लगते हैं जो झुक सकें, मुड़ सकें और समय के अनुसार रंग बदल सकें।जो व्यक्ति अपने सिद्धांतों पर दृढ़ खड़ा रहता है, वह अक्सर सत्ता और बाजार दोनों के लिए असुविधाजनक बन जाता है।यही कारण है कि आधुनिक समाज में “स्टैंड वाले लोग” कम और “सिर्फ कैरियर वाले लोग” अधिक दिखाई देते हैं।
पत्रकारिता का संकट केवल पत्रकारों का नहीं यह कथा केवल पत्रकारिता पर व्यंग्य नहीं है।यह पूरे समाज का चित्र है। आज विद्यार्थी अंक बचाने के लिए मौलिकता छोड़ रहा है।नेता वोट बचाने के लिए विचार छोड़ रहा है।अधिकारी पद बचाने के लिए निष्पक्षता छोड़ रहा है।और समाज प्रतिष्ठा बचाने के लिए सत्य छोड़ रहा है।हर जगह कैरियर बड़ा हो गया, स्टैंड छोटा।
लेकिन इतिहास किसे याद रखता है?इतिहास केवल सफल लोगों को नहीं याद रखता।इतिहास उन लोगों को याद रखता है जिन्होंने अपना “स्टैंड” बचाए रखा।महात्मा गांधी के पास सत्ता नहीं थी, पर स्टैंड था।लोकमान्य तिलक के पास संसाधन कम थे, पर स्टैंड था।गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकारों के पास समझौते के अवसर थे, पर उन्होंने स्टैंड नहीं छोड़ा।इसीलिए वे आज भी जीवित हैं — पुस्तकों में नहीं, जनमानस में।

साइकिल का स्टैंड हटाकर दुकानदार ने केवल एक पुर्जा नहीं निकाला था, उसने आधुनिक व्यवस्था का सबसे बड़ा सत्य बता दिया था।आज का युग मनुष्य से पूछता नहीं कि “तुम्हारा चरित्र क्या है?”वह पूछता है — “तुम्हारा कैरियर कितना बड़ा है?”परंतु स्मरण रहे —जिस साइकिल का स्टैंड नहीं होता, वह थोड़ी देर चल तो सकती है, लेकिन रुकते ही गिर जाती है।और जिस मनुष्य का कोई सिद्धांत नहीं होता, उसका कैरियर चाहे जितना चमके, इतिहास के पहले मोड़ पर वह भी गिर जाता है। 
विचार, सोशल मीडिया से साभार 

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