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शुक्रवार, 1 मई 2026

अब नारी क़ो अबला कहोगे तो इतिहास क्षमा नहीं करेगा!

 नारी तुम केवल श्रद्धा नहीं हो, तुम शक्ति, शांति और राष्ट्र चेतना की अजस्र धारा हो!


भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उसने नारी को कभी केवल संवेदना की प्रतिमा बनाकर नहीं देखा। इस भूमि ने नारी को सृष्टि की मूल ऊर्जा, राष्ट्र की आधारशिला और धर्म की जीवंत चेतना के रूप में प्रतिष्ठित किया। इसलिए आज समय की माँग है कि हम यह उद्घोष पूरे आत्मविश्वास से करें—
“नारी तुम केवल श्रद्धा नहीं हो,
तुम शक्ति हो, शांति हो, संस्कृति की अजस्र स्रोतस्विनी हो।”
यह उद्घोष केवल साहित्यिक अलंकार नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद की मूल चेतना है।नारी : करुणा नहीं, क्रांति का शंखनाद,सदियों तक कुछ संकीर्ण दृष्टियों ने नारी को दुर्बलता का पर्याय बनाने का प्रयास किया। उसे आँचल और आँसू की सीमाओं में बाँधने की चेष्टा की गई। परंतु भारत का सत्य इससे भिन्न है।यह वही भूमि है जहाँ दुर्गा सप्तशती उद्घोष करती है—
“या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।”
यहाँ नारी केवल सहनशीलता नहीं, प्रतिकार भी है।वह केवल सृजन नहीं, अन्याय के विनाश का संकल्प भी है।जब अधर्म बढ़ता है, तो वही नारी दुर्गा बनकर महिषासुर का संहार करती है।जब अन्याय सीमा लाँघता है, तो वही काली बनकर समय की दिशा बदल देती है।अतः नारी को “अबला” कहना भारतीय आत्मा का अपमान है।
‘अबला जीवन’ नहीं, ‘सबला संकल्प’ की कहानी,मैथिलीशरण गुप्त की पंक्ति—
“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी…”अपने समय की सामाजिक पीड़ा का चित्रण थी, शाश्वत सत्य नहीं।आज भारत की नई चेतना इस पंक्ति को चुनौती देती है।
आज की वाणी कहती है—“सबला जीवन, यही तुम्हारी नई रवानी,आँचल में है अग्नि और आँखों में कहानी।”आज की भारतीय नारी आँसू की नहीं, आत्मविश्वास की भाषा बोलती है।वह दया की पात्र नहीं, निर्णय की धुरी है।उपनिषदों की गर्जना : नारी विचार की धुरी मेँ  उपनिषद के युग में जब विश्व का बड़ा भाग स्त्री को अधिकार देने की कल्पना भी नहीं कर सकता था, तब भारत की सभाओं में गार्गी ब्रह्म पर प्रश्न कर रही थीं, मैत्रेयी ज्ञान की अंतिम सीमा को चुनौती दे रही थीं।यह बताता है कि भारतीयता में नारी केवल घर की मर्यादा नहीं, ज्ञान की ऊँचाई भी है।
वह केवल संबंधों की रक्षक नहीं, दर्शन की निर्माता भी है।नारी वंदन अधिनियम : संविधान में शास्त्र की प्रतिध्वनि
नारी शक्ति वंदन अधिनियम केवल विधायी संशोधन नहीं, यह भारतीय परंपरा की पुनर्पुष्टि है। यह उस सनातन सत्य का आधुनिक संवैधानिक उद्घोष है कि—
राष्ट्र की प्रगति तब तक अधूरी है जब तक नारी उसकी निर्णय प्रक्रिया की सहभागी न बने। पर सावधान रहना होगा—नारी सशक्तिकरण केवल सीटों की संख्या बढ़ाने से नहीं होगा। वह तब होगा जब नारी नीति की निर्माता, राष्ट्रदृष्टि की वाहक और परिवर्तन की संचालक बनेगी।
राष्ट्रवाद की आत्मा है नारी शक्ति, एक राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी सीमाओं की सुरक्षा से नहीं मापी जाती;उसकी वास्तविक शक्ति उसकी मातृशक्ति से मापी जाती है। जिस राष्ट्र की नारी जागृत होती है, वह राष्ट्र अजेय होता है।जिस राष्ट्र की नारी निर्णयकारी बनती है, वह राष्ट्र इतिहास बदलता है।भारत की हर माँ में लक्ष्मी की समृद्धि है,हर बेटी में सरस्वती का ज्ञान है,और हर संघर्षशील स्त्री में दुर्गा का तेज है।
आज का उद्घोष अब समय आ गया है कि भारत अपनी बेटियों से यह न कहे कि तुम केवल श्रद्धा हो।उन्हें यह कहे—तुम वह ज्वाला हो जिससे राष्ट्र प्रज्वलित होता है।
तुम वह शांति हो जिससे सभ्यता संतुलित रहती है।तुम वह शक्ति हो जिससे इतिहास करवट लेता है।
भारत यदि विश्वगुरु बनेगा, तो नारी के सम्मान से नहीं—नारी के नेतृत्व से बनेगा।
इसलिए आज का राष्ट्रवादी मंत्र यही होना चाहिए—“नारी तुम केवल श्रद्धा नहीं हो,
तुम रणचंडी का संकल्प हो,तुम वेदों की वाणी हो,तुम भारत की अजस्र राष्ट्रधारा हो।” 

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