राष्ट्रनीति (मुख्य संपादकीय)
अमेरिका–इज़रायल–ईरान: पूर्वाग्रहों की त्रिकोणीय टकराहट और अनिवार्य विफलता
राजेंद्र नाथ तिवारी
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत,
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।” — श्रीमद्भगवद्गीता
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत,
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।” — श्रीमद्भगवद्गीता
जब-जब धर्म (संतुलन, न्याय, मर्यादा) का पतन होता है और अधर्म (असंतुलन, अहंकार, पूर्वाग्रह) बढ़ता है, तब संघर्ष अवश्य जन्म लेता है।आज मध्य-पूर्व की स्थिति इसी श्लोक की आधुनिक प्रतिध्वनि बन चुकी है।
तीन शक्तियाँ, एक संकट=अमेरिका, इज़रायल और ईरान—ये तीनों केवल देश नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग मानसिकताओं के प्रतिनिधि हैं।
अमेरिका → वैश्विक नियंत्रण और व्यवस्था का दावा,इज़रायल → अस्तित्व और सुरक्षा की अनिवार्यता,ईरान → प्रतिरोध और वैचारिक विस्तार की महत्वाकांक्षा
परंतु जब ये तीनों दृष्टियाँ संवाद के बजाय पूर्वाग्रह पर टिक जाती हैं,
तो संघर्ष केवल युद्ध नहीं रहता—वह एक स्थायी संरचना बन जाता है।
अमेरिका–इज़रायल: शक्ति का केंद्रीकरण=अमेरिका और इज़रायल का गठबंधन प्रारंभ में सुरक्षा और अस्तित्व की आवश्यकता था,परंतु समय के साथ यह वर्चस्ववादी हस्तक्षेप का माध्यम बन गया।इराक युद्ध=फ़िलिस्तीन मुद्दे पर असंतुलित रुख=क्षेत्रीय राजनीति में लगातार हस्तक्षेप, जब शक्ति संतुलन खो देती है, तो वह समाधान नहीं—समस्या बन जाती है। ईरान: प्रतिरोध की आड़ में विस्तार
ईरान स्वयं को अन्याय के विरुद्ध खड़ा बताता है,परंतु उसका व्यवहार कई बार उसी अस्थिरता को बढ़ाता है, जिसका वह विरोध करता है।प्रॉक्सी संगठनों को समर्थन,
वैचारिक कट्टरता का प्रसार,क्षेत्रीय संघर्षों में अप्रत्यक्ष भूमिका, प्रतिरोध, जब संतुलन खो देता है, तो वह भी एक प्रकार का आक्रमण बन जाता है।
मध्य-पूर्व: संघर्ष की प्रयोगशाला=मध्य पूर्व आज एक ऐसा क्षेत्र बन चुका है,जहाँ हर शक्ति अपने-अपने सत्य को स्थापित करना चाहती है।परंतु इतिहास का नियम स्पष्ट है— बाहरी हस्तक्षेप और आंतरिक कट्टरता मिलकर केवल विनाश को जन्म देते हैं, समाधान को नहीं। धर्म का वास्तविक अर्थ: संतुलन, न कि वर्चस्व,गीता का “धर्म” केवल धार्मिक अर्थ में नहीं, बल्कि संतुलन, न्याय और कर्तव्य का प्रतीक है।
आज की त्रासदी यही है कि—अमेरिका “धर्म” को अपने हितों से परिभाषित करता है
इज़रायल “धर्म” को केवल सुरक्षा में देखता है,ईरान “धर्म” को वैचारिक विस्तार में खोजता है
जब धर्म का अर्थ सीमित हो जाता है, तो अधर्म ही उसका परिणाम बनता है।
भारत के लिए मार्ग: संतुलन की संस्कृति,भारत की परंपरा सिखाती है—
वसुधैव कुटुंबकम्। संवाद, संतुलन और सहअस्तित्व—यही स्थायी समाधान हैं। किसी भी पक्ष का अंध समर्थन, केवल संघर्ष को बढ़ाता है।भारत के लिए यही अवसर है—कि वह विश्व को शक्ति नहीं, संतुलन की नीति का मार्ग दिखाए।
तीनों दोषी, समाधान अनुपस्थितअमेरिका, इज़रायल और ईरान—तीनों इस संकट के सहभागी हैं।तीनों अपने-अपने पूर्वाग्रहों में इतने उलझे हैं किसत्य और समाधान दोनों उनसे दूर होते जा रहे हैं। शक्ति जब अहंकार में बदलती है, तो वह स्वयं को ही नष्ट करती है। और प्रतिरोध जब कट्टरता में बदलता है, तो वह शांति को असंभव बना देता है।“जब हर पक्ष स्वयं को धर्म का रक्षक मान ले,तो अधर्म ही सबसे बड़ा विजेता बन जाता है—और इतिहास फिर किसी कृष्ण की प्रतीक्षा करता है।” सम्भावमी युगे युगे!!

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