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शनिवार, 18 अप्रैल 2026

“महिला आरक्षण: नीयति बनाम राजनीति के नील श्रृंगाल”

आधी आबादी का हक देने से भागती संसद 

नील श्रृंगालों के बीच महिला आरक्षण का सच

राजेंद्र नाथ तिवारी संपादकीय 


भारतीय राजनीति का यह भी एक विचित्र दृश्य है कि जहां मुद्दा जितना बड़ा होता है, वहां “नील श्रृंगालों” की भीड़ उतनी ही घनी हो जाती है। महिला आरक्षण विधेयक (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) भी इसी विडंबना का ताजा उदाहरण है—एक ऐतिहासिक पहल, जिसे राजनीति ने उत्सव से अधिक अवसर में बदल दिया।वर्षों तक फाइलों में धूल खाता रहा यह विधेयक अचानक जब संसद की चौखट पार करता है, तो वही चेहरे सबसे आगे दिखाई देते हैं, जिन्होंने इसे कभी प्राथमिकता नहीं दी। यह राजनीति का पुराना खेल है—जब तक लाभ न दिखे, चुप्पी; और जैसे ही माहौल बने, श्रेय की होड़। यही “नील श्रृंगाल” हैं—जो समय के रंग में रंगकर खुद को परिवर्तन का नायक घोषित कर देते हैं।

पर असली प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है—क्या यह आरक्षण तत्काल महिलाओं को सत्ता में समान भागीदारी देगा? या फिर जनगणना और परिसीमन की शर्तों के नाम पर इसे भविष्य के गर्भ में डाल दिया गया है? अगर क्रियान्वयन टलता है, तो यह विधेयक भी राजनीतिक घोषणाओं की लंबी सूची में एक और नाम बनकर रह जाएगा। महिला सशक्तिकरण केवल संसद की सीटों का गणित नहीं है। यह उस सोच को बदलने का प्रश्न है, जो आज भी महिलाओं को “प्रतिनिधि” से ज्यादा “प्रतीक” मानती है। खतरा यही है कि आरक्षण के नाम पर वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति कहीं पर्दे के पीछे ही न रह जाए, और मंच पर केवल चेहरे बदलते रहें। आज जरूरत है साफ नीयत और स्पष्ट रोडमैप की। अगर यह विधेयक ईमानदारी से लागू होता है, तो यह भारतीय लोकतंत्र की दिशा बदल सकता है। लेकिन अगर इसे भी “नील श्रृंगालों” की राजनीति ने जकड़ लिया, तो यह अवसर भी खो जाएगा—और फिर एक पीढ़ी इंतजार करती रह जाएगी।

लोकतंत्र में सबसे बड़ा धोखा वादों का नहीं, बल्कि उम्मीदों का टूटना होता है। महिला आरक्षण उस उम्मीद का नाम है—जिसे अब छल नहीं, सच बनना ही होगा।जो नेता कल तक महिला भागीदारी के प्रश्न पर मौन थे, वे आज इसके सबसे बड़े पैरोकार बन बैठे हैं। जिन दलों ने वर्षों तक इसे टालने की रणनीति अपनाई, वे अब इसे अपनी उपलब्धि बताने में लगे हैं। यह वही प्रवृत्ति है, जहां सिद्धांत नहीं, बल्कि अवसर ही राजनीति की दिशा तय करता है।सवाल यह नहीं है कि विधेयक आया—सवाल यह है कि क्या यह वास्तविक परिवर्तन का माध्यम बनेगा? क्योंकि इसकी क्रियान्वयन प्रक्रिया—जनगणना और परिसीमन से जुड़ी शर्तें—इसे तत्काल प्रभाव से लागू नहीं होने देतीं। यही वह जगह है, जहां “नील श्रृंगाल” अपनी राजनीति साधते हैं: श्रेय लेने में अग्रणी, लेकिन जिम्मेदारी निभाने में पीछे।

महिलाओं को 33% आरक्षण देना केवल सीटों का बंटवारा नहीं है, यह सत्ता संरचना में संतुलन स्थापित करने का प्रयास है। लेकिन क्या केवल आरक्षण से महिलाओं की आवाज़ सशक्त हो जाएगी? या फिर वे भी पुरुष-प्रधान राजनीतिक ढांचे के भीतर प्रतीक मात्र बनकर रह जाएंगी?आज आवश्यकता है कि इस विधेयक को राजनीतिक हथियार नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के साधन के रूप में देखा जाए। अन्यथा “नील श्रृंगाल” इसे भी अपनी छवि चमकाने का माध्यम बना लेंगे, और वास्तविक मुद्दे—शिक्षा, सुरक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता—फिर हाशिये पर चले जाएंगे।

लोकतंत्र का असली अर्थ केवल कानून बनाना नहीं, बल्कि उसे ईमानदारी से लागू करना है। अगर महिला आरक्षण केवल घोषणा बनकर रह गया, तो यह भी राजनीति के उसी रंगमंच का हिस्सा बन जाएगा, जहां सियार शेर बनने का अभिनय करते हैं।


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