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बुधवार, 1 अप्रैल 2026

आत्मजागरण की महागाथा ," सिद्दार्थ से तथागत" लोकार्पित

 “सिद्धार्थ से तथागत”: करुणा, चेतना और वैचारिक उत्कर्ष का महाकाव्यात्मक उद्घोष


हरिओम प्रकाश, संवाददाता, 1अप्रेल 26

बस्ती के साहित्यिक आकाश में एक महत्वपूर्ण क्षण तब अंकित हुआ जब वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. वी.के. वर्मा कृत महाकाव्य ‘सिद्धार्थ से तथागत’ का गरिमामय विमोचन प्रेस क्लब सभागार में संपन्न हुआ। यह आयोजन मात्र एक पुस्तक लोकार्पण नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, करुणा-दर्शन और मानवीय उत्कर्ष की पुनर्पुष्टि का सांस्कृतिक उत्सव बन गया।मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित प्रख्यात विदुषी डॉ. रेशमी पाण्डा मुखर्जी (कोलकाता) ने अपने उद्बोधन में महात्मा बुद्ध के जीवन-वृत्त को “अनूठा, अनुकरणीय और विश्व-कल्याणकारी” बताते हुए कहा कि यह महाकाव्य केवल एक साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि आत्म-परिवर्तन की दिशा में एक सशक्त वैचारिक सेतु है। उन्होंने विशेष रूप से बुद्ध के “अप्प दीपो भव” के संदेश को रेखांकित करते हुए कहा कि डॉ. वर्मा की यह कृति करुणा, अहिंसा और आत्मप्रकाश की उस परंपरा को नयी ऊर्जा प्रदान करेगी, जिसकी आज के समय में अत्यंत आवश्यकता है।

महाकाव्य: परंपरा का निर्वाह और नवीन दृष्टि का समन्वय#साहित्य भूषण हरीलाल मिलन ने अपने विचार रखते हुए कहा कि महात्मा बुद्ध का व्यक्तित्व सृजनधर्मिता को स्वाभाविक रूप से आकर्षित करता है। ‘सिद्धार्थ से तथागत’ महाकाव्य इसी आकर्षण का उत्कर्ष है, जो न केवल परंपरा का निर्वाह करता है, बल्कि नये साहित्यिक प्रतिमानों की स्थापना का भी सामर्थ्य रखता है।इसी क्रम में डॉ. सोमेन्द्र पाण्डा ने महाकाव्य के विभिन्न प्रसंगों का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए यह उल्लेख किया कि कपिलवस्तु, जो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बस्ती मंडल से जुड़ा हुआ है, इस रचना में एक जीवंत संदर्भ के रूप में उपस्थित है। उन्होंने यह भी कहा कि डॉ. वर्मा ने पारंपरिक महाकाव्यात्मक संरचना का निर्वहन करते हुए तथागत के जीवन को एक नवीन दार्शनिक दृष्टिकोण प्रदान किया है।


यशोधरा: त्याग, संवेदना और स्त्री-चेतना का उत्कर्ष#कार्यक्रम का संचालन कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामकृष्ण लाल ‘जगमग’ ने अपने वक्तव्य में महाकाव्य के एक अत्यंत मार्मिक पक्ष—यशोधरा के चरित्र—को केंद्र में रखा। उन्होंने कहा कि सिद्धार्थ से तथागत बनने की यात्रा केवल एक पुरुष की आध्यात्मिक यात्रा नहीं, बल्कि उसमें यशोधरा का मौन त्याग और मानसिक उत्सर्ग भी उतना ही ऐतिहासिक और प्रेरणास्पद है।यह दृष्टिकोण इस महाकाव्य को केवल धार्मिक या दार्शनिक कृति नहीं रहने देता, बल्कि इसे समकालीन स्त्री-चेतना और संवेदनशील विमर्श का भी वाहक बना देता है।

विमोचन से विमर्श तक: एक बहुआयामी साहित्यिक आयोजन#प्रदीप चन्द्र पाण्डेय, प्रेस क्लब अध्यक्ष विनोद उपाध्याय तथा डॉ. सत्यव्रत ने भी महाकाव्य के विविध पक्षों पर प्रकाश डालते हुए इसे एक बहुआयामी कृति बताया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. त्रिभुवन प्रसाद मिश्र ने इसे “मील का पत्थर” बताते हुए कहा कि यह महाकाव्य आने वाले समय में हिंदी साहित्य की दिशा को प्रभावित करेगा।स्वयं रचनाकार डॉ. वी.के. वर्मा ने जब महाकाव्य के अंशों का सस्वर पाठ किया, तो वातावरण भाव-विभोर हो उठा। विशेषतः यशोधरा प्रसंग ने श्रोताओं को आत्ममंथन के लिए बाध्य कर दिया—मानो करुणा और त्याग की वह गाथा श्रोताओं के अंतर्मन में उतर गई हो।

काव्य-संध्या: सृजन का जीवंत विस्तार#कार्यक्रम का द्वितीय चरण एक सशक्त कवि सम्मेलन के रूप में आयोजित हुआ, जिसमें डॉ. ओ.पी. वर्मा ‘ओम’, डॉ. वेद प्रकाश मणि, डॉ. प्रतिभा गुप्ता, अर्चना श्रीवास्तव, सागर गोरखपुरी, दीपक सिंह ‘प्रेमी’, डॉ. अफजल हुसैन ‘अफजल’, मकसूद अहमद, अनवार पारसा, सुशील सिंह ‘पथिक’ आदि रचनाकारों ने अपनी काव्य-प्रस्तुतियों से वातावरण को साहित्यिक ऊर्जा से परिपूर्ण कर दिया।

सम्मान और संवेदना का संगम#इस अवसर पर श्याम निर्मम फाउंडेशन द्वारा डॉ. वी.के. वर्मा और डॉ. रामकृष्ण लाल ‘जगमग’ को सम्मानित किया गया। साथ ही डॉ. रेशमी पाण्डा मुखर्जी और हरीलाल मिलन को रचनाकार द्वारा अपने माता-पिता की स्मृति में आर्थिक सम्मान प्रदान करना, इस आयोजन को संवेदना और संस्कार की ऊँचाई पर स्थापित करता है।साहित्यिक संस्था शब्द सुमन द्वारा अनेक विद्वानों, संतों और साहित्यकारों को अंगवस्त्र और सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया गया, जो इस आयोजन की गरिमा और व्यापकता का परिचायक है।

 एक महाकाव्य, एक युग-संवाद‘ सिद्धार्थ से तथागत’ केवल एक काव्य नहीं, बल्कि एक युग-संवाद है—एक ऐसा संवाद, जो अतीत की तपश्चर्या को वर्तमान की संवेदनशीलता से जोड़ता है।यह महाकाव्य हमें स्मरण कराता है कि:मनुष्य का वास्तविक उत्कर्ष बाहरी विजय में नहीं, बल्कि आंतरिक जागरण में निहित है।बस्ती की इस साहित्यिक संध्या ने यह सिद्ध कर दिया कि जब शब्द साधना बनते हैं, तो वे केवल पृष्ठों पर नहीं रहते—वे समाज की चेतना में प्रवाहित होते हैं।

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