राष्ट्रवादी चेतना के प्रखर वाहक: मनमोहन श्रीवास्तव काजू का 42 वर्षों का प्रेरक व्यक्तित्व
बस्ती से हरिओम प्रकाश, संवाददाता कौटिल्य का भारत, 1अप्रेल, 26,समय 5.45
भारतीय समाज में ऐसे व्यक्तित्व विरले ही मिलते हैं जो एक साथ विधि, समाजसेवा, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रवादी चेतना के क्षेत्र में समान रूप से प्रभावशाली योगदान देते हों। मनमोहन श्रीवास्तव ‘काजू’ ऐसा ही एक नाम है, जिनकी पहचान केवल एक कर विशेषज्ञ या विधि के जानकार के रूप में ही नहीं, बल्कि एक सजग समाजसेवी, विचारक और राष्ट्रहित के लिए समर्पित युवा चेतना के प्रेरक के रूप में भी स्थापित है। लगभग 45 वर्षों के सार्वजनिक जीवन में उन्होंने जो कार्य किए हैं, वे केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं बल्कि समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
मनमोहन श्रीवास्तव काजू की सबसे बड़ी विशेषता उनकी बहुआयामी प्रतिभा है। वस्तु एवं सेवा कर (GST) तथा आयकर जैसे जटिल कानूनों की गहरी समझ रखने वाले वे उन चुनिंदा लोगों में हैं जो कानून को केवल पेशा नहीं बल्कि समाज के मार्गदर्शन का माध्यम मानते हैं। कर कानूनों के क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता ने अनेक व्यापारियों, संस्थाओं और आम नागरिकों को सही मार्गदर्शन प्रदान किया है। अक्सर देखा जाता है कि कर संबंधी जटिलताओं में आम व्यक्ति उलझ जाता है, परंतु मनमोहन श्रीवास्तव जैसे विशेषज्ञों के कारण समाज को एक विश्वसनीय मार्गदर्शक मिलता है।
लेकिन उनका व्यक्तित्व केवल कानून तक सीमित नहीं है। वे बौद्धिक सम्पदा के भी धनी हैं। उनके विचारों में राष्ट्र के प्रति समर्पण, सामाजिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक चेतना का गहरा समावेश दिखाई देता है। वे मानते हैं कि किसी भी समाज की उन्नति केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि विचारों की समृद्धि से होती है। इसी कारण वे हमेशा युवा पीढ़ी को जागरूक करने, उन्हें राष्ट्रहित के प्रति प्रेरित करने और सामाजिक जिम्मेदारियों का बोध कराने का कार्य करते रहे हैं।
राष्ट्रवादी चेतना के क्षेत्र में उनका योगदान विशेष उल्लेखनीय है। उन्होंने सदैव यह संदेश दिया कि राष्ट्र केवल एक भौगोलिक सीमा नहीं बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना है। इस चेतना को मजबूत बनाने के लिए समाज के हर वर्ग को अपनी भूमिका निभानी चाहिए। युवाओं में राष्ट्रभक्ति, अनुशासन और सामाजिक समर्पण की भावना जगाने के लिए उन्होंने अनेक मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाई है। उनके भाषणों और विचारों में एक स्पष्टता और दृढ़ता दिखाई देती है जो लोगों को प्रेरित करती है।पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी मनमोहन श्रीवास्तव काजू की सक्रियता उल्लेखनीय रही है। आज जब दुनिया पर्यावरणीय संकटों से जूझ रही है, तब नदी संरक्षण और प्रकृति की रक्षा के लिए उनका प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे मानते हैं कि नदियाँ केवल जल स्रोत नहीं बल्कि हमारी सभ्यता और संस्कृति की जीवनधारा हैं। यदि नदियाँ सुरक्षित रहेंगी तो ही हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा। इसी सोच के साथ उन्होंने नदी संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता के अनेक अभियानों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।स
माजसेवा उनके जीवन का मूल आधार रही है। वे हमेशा समाज के कमजोर और जरूरतमंद वर्ग के लिए संवेदनशील रहे हैं। चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो, सामाजिक जागरूकता हो या जनहित के मुद्दे—उन्होंने हर स्तर पर समाज के साथ खड़े होकर अपनी जिम्मेदारी निभाई है। उनका मानना है कि सच्ची सफलता वही है जो समाज के काम आए और दूसरों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सके।
मनमोहन श्रीवास्तव काजू के व्यक्तित्व का एक और महत्वपूर्ण पक्ष उनकी सरलता और विनम्रता है। इतनी उपलब्धियों के बावजूद उनमें अहंकार का लेश मात्र भी नहीं दिखाई देता। वे सहज, मिलनसार और संवादप्रिय व्यक्ति हैं। यही कारण है कि समाज के विभिन्न वर्गों में उन्हें सम्मान और विश्वास की दृष्टि से देखा जाता है। लोग उन्हें केवल एक विशेषज्ञ के रूप में नहीं बल्कि एक मार्गदर्शक और प्रेरक व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार करते हैं।लगभग 42वर्षों की उनकी यात्रा वास्तव में समर्पण, संघर्ष और सेवा की कहानी है। इस लंबी अवधि में उन्होंने न केवल अपने ज्ञान और अनुभव से समाज को समृद्ध किया बल्कि यह भी सिद्ध किया कि यदि व्यक्ति में दृढ़ इच्छाशक्ति और समाज के प्रति प्रतिबद्धता हो तो वह अनेक क्षेत्रों में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।आज जब समाज में आदर्श व्यक्तित्वों की कमी महसूस की जाती है, तब मनमोहन श्रीवास्तव काजू जैसे लोग आशा की किरण बनकर सामने आते हैं। उनका जीवन यह सिखाता है कि ज्ञान, सेवा और राष्ट्रभक्ति का समन्वय ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है। वे उन लोगों में से हैं जिन्होंने अपने विचारों, कर्मों और दृष्टिकोण से समाज को दिशा देने का प्रयास किया है।
अंततः कहा जा सकता है कि मनमोहन श्रीवास्तव काजू केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक विचारधारा हैं—ऐसी विचारधारा जो राष्ट्रहित, सामाजिक समर्पण और पर्यावरण संरक्षण के मूल्यों पर आधारित है। उनके 42 वर्षों का अनुभव और योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा। समाज को ऐसे ही जागरूक, समर्पित और दूरदर्शी व्यक्तित्वों की आवश्यकता है जो अपने ज्ञान और कर्म से राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते रहें। कौटिल्य का भारत शतायु सुस्वस्थ की कामना करता है.

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