टिटिहरी बनाम लोकतंत्र: आधी आबादी का हक और विपक्ष की हिचक?
राजेंद्र नाथ तिवारी, 17अप्रेल 26,समय 9.20 संपादकीय
भारतीय राजनीति का यह भी एक विचित्र दृश्य है कि जब इतिहास दरवाज़े पर दस्तक देता है, तो कुछ लोग कान बंद कर लेते हैं। महिला आरक्षण विधेयक ऐसा ही एक ऐतिहासिक क्षण है—जहाँ आधी आबादी अपने अधिकार की ओर बढ़ रही है, और विपक्ष टिटिहरी की तरह अपने छोटे-से तर्कों से पूरे आसमान को थामने का दावा कर रहा है।टिटिहरी की कथा सबने सुनी है—वह पक्षी जो यह मान बैठता है कि यदि वह अपने पैरों को आकाश की ओर कर ले, तो आसमान गिरने से बच जाएगा। आज का विपक्ष भी कुछ वैसा ही प्रतीत होता है। वह यह मानकर चल रहा है कि उसके सवाल, उसकी शंकाएँ, उसके आरोप—इस सामाजिक परिवर्तन की धारा को रोक देंगे।
लेकिन प्रश्न यह है—क्या सचमुच यह विरोध महिलाओं के अधिकार के लिए है, या फिर सत्ता की उस असहजता का परिणाम है, जहाँ नई भागीदारी पुरानी राजनीति के समीकरण बिगाड़ सकती है?संसद में महिलाओं की भागीदारी आज भी प्रतीकात्मक है, प्रभावी नहीं। वर्षों से राजनीतिक दल महिलाओं को टिकट देने में संकोच करते रहे हैं। ऐसे में आरक्षण एक बाध्यता बनकर आया है—एक ऐसा दर्पण, जिसमें राजनीतिक दलों को अपनी वास्तविक प्रतिबद्धता देखनी पड़ेगी।
विपक्ष के कुछ तर्क सतही नहीं हैं—जनगणना, परिसीमन, और कार्यान्वयन की समयसीमा जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं। परंतु जब इन सवालों को समाधान के बजाय अवरोध बनाने का प्रयास होता है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि चिंता प्रक्रिया की नहीं, परिवर्तन की है।सच यह है कि यह विधेयक केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता की परीक्षा है। क्या हम उस स्तर तक पहुँच चुके हैं जहाँ प्रतिनिधित्व केवल संख्या नहीं, बल्कि समानता का प्रतीक बने? या फिर हम अभी भी उसी पुराने ढांचे में कैद हैं, जहाँ शक्ति का वितरण सीमित हाथों में सुरक्षित रखा जाता है?
विपक्ष को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में हर परिवर्तन असुविधाजनक होता है—विशेषकर उन लोगों के लिए, जो पुराने संतुलन के लाभार्थी रहे हैं। लेकिन इतिहास का पहिया सुविधा से नहीं, आवश्यकता से चलता है।यदि आज भी टिटिहरी की तरह आसमान रोकने की जिद जारी रही, तो यह केवल एक विधेयक का विरोध नहीं होगा—यह उस भारत का विरोध होगा, जो अपनी बेटियों को बराबरी का स्थान देने के लिए तैयार खड़ा है।
क्या हम टिटिहरी की मानसिकता में जीते रहेंगे,
भारतीय लोकतंत्र एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। वर्षों से लंबित महिला आरक्षण का प्रश्न अब जब समाधान की ओर बढ़ता दिख रहा है, तब विपक्ष का रवैया अनेक प्रश्न खड़े करता है। क्या यह सचमुच लोकतांत्रिक विमर्श है, या फिर टिटिहरी की उस आशंका जैसा प्रयास—जो अपने छोटे से पंखों से आसमान को गिरने से रोकने का भ्रम पालती है?महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में 33% आरक्षण देने का प्रस्ताव कोई अचानक उपजा विचार नहीं है। यह दशकों की सामाजिक चेतना, संघर्ष और समानता के अधिकार की मांग का परिणाम है। पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं को मिले आरक्षण ने यह सिद्ध किया है कि जब अवसर मिलता है, तो महिलाएं न केवल भागीदारी निभाती हैं, बल्कि नेतृत्व भी करती हैं।
विपक्ष का यह तर्क कि इस आरक्षण के पीछे राजनीतिक लाभ की मंशा छिपी है, कहीं न कहीं उस मूल प्रश्न से ध्यान भटकाने का प्रयास प्रतीत होता है—क्या भारतीय संसद में महिलाओं की पर्याप्त भागीदारी है? आज भी लोकसभा में महिलाओं की संख्या कुल सदस्यों का लगभग 15% के आसपास ही है। क्या यह आंकड़ा उस देश के लिए पर्याप्त है, जो ‘नारी शक्ति’ को अपनी सांस्कृतिक चेतना का आधार मानता है?टिटिहरी की कथा हमें यह सिखाती है कि भ्रम और भय, वास्तविकता को बदल नहीं सकते। यदि समाज में परिवर्तन की लहर उठ चुकी है, तो उसे रोकने के लिए खड़े अवरोध अंततः स्वयं ही अप्रासंगिक हो जाते हैं। महिलाओं का आरक्षण केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।
हाँ, यह भी सत्य है कि किसी भी नीति को लागू करने से पहले उसके क्रियान्वयन की स्पष्टता आवश्यक है। जनगणना, परिसीमन और सीटों के पुनर्गठन जैसे मुद्दों पर पारदर्शिता और समयबद्धता जरूरी है। लेकिन इन प्रक्रियात्मक प्रश्नों को आधार बनाकर पूरे विचार का विरोध करना, कहीं न कहीं नीयत पर प्रश्नचिह्न लगाता है।लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल विरोध करना नहीं, बल्कि सुधार के साथ समर्थन देना भी है। यदि विपक्ष इस ऐतिहासिक पहल में रचनात्मक सहयोग देता है, तो यह भारतीय राजनीति के स्तर को ऊंचा उठाने का कार्य होगा। अन्यथा, इतिहास यह याद रखेगा कि जब आधी आबादी को उसका हक मिलने जा रहा था, तब कुछ लोग टिटिहरी की तरह आसमान थामने की जिद में लगे थे।

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